पश्चिम एशिया में जारी ईरान संघर्ष का असर अब वैश्विक कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने से उर्वरकों की कमी गहराने लगी है, जिससे दुनियाभर के किसानों की लागत बढ़ रही है और आने वाले समय में खाद्य कीमतों में तेजी की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान की ओर से जलडमरूमध्य से गुजरने वाली शिपमेंट को सीमित करने के कारण वैश्विक उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई है। यह जलमार्ग दुनिया के करीब 20% तेल और लगभग एक-तिहाई उर्वरक व्यापार के लिए अहम है।
सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ रहा है?
सबसे ज्यादा असर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, खासकर यूरिया पर पड़ा है, जिसकी वैश्विक आपूर्ति का करीब 30% हिस्सा इस संकट से प्रभावित बताया जा रहा है। यूरिया की आपूर्ति में देरी और एलएनजी की बढ़ती कीमतों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि एलएनजी इसका प्रमुख कच्चा माल है।
विकासशील देशों के किसानों के लिए गंभीर खतरा
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर कार्ल स्काउ ने चेतावनी दी है कि यह संकट खासकर विकासशील देशों के किसानों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। उन्होंने कहा कि सबसे खराब स्थिति में फसल उत्पादन घट सकता है या फसलें खराब हो सकती हैं, जबकि बेहतर स्थिति में भी बढ़ी लागत का असर खाद्य कीमतों पर दिखेगा।
अफ्रीका और एशियाई देश खाड़ी पर उर्वरक के लिए निर्भर
फॉस्फेट उर्वरक की आपूर्ति भी दबाव में है। सऊदी अरब वैश्विक फॉस्फेट उत्पादन का बड़ा हिस्सा करता है, वहीं सल्फर, जो उर्वरक का अहम घटक है। इनकी सप्लाई भी प्रभावित हो रही है।
अफ्रीका और एशिया के कई देश, जो खाड़ी क्षेत्र से उर्वरक आयात पर निर्भर हैं, पहले से ही संकट का सामना कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, इथियोपिया अपनी 90% से अधिक नाइट्रोजन उर्वरक जरूरत खाड़ी क्षेत्र से पूरी करता है, जहां आपूर्ति पहले से ही प्रभावित है।
उर्वरक न मिलने से क्या होगा?
यह संकट ऐसे समय आया है जब उत्तरी गोलार्ध में बुआई का मौसम शुरू हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर उर्वरक न मिलने से फसलों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह स्थिति बनी रहती है तो किसान कम उर्वरक का उपयोग करेंगे या कम लागत वाली फसलों की ओर रुख करेंगे, जिससे उत्पादन घटेगा और उपभोक्ताओं के लिए खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
चीन और रूस जैसे बड़े उत्पादक देशों से भी तत्काल राहत की उम्मीद कम है, क्योंकि चीन घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि रूस की उत्पादन क्षमता पहले से ही उच्च स्तर पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों को इस संकट से निपटने के लिए सब्सिडी, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और निर्यात नियंत्रण जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। कुल मिलाकर, यह संकट वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती बनता जा रहा है।



