फिल्म धुरंधर: द रिवेंज के कारण अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम एक बार फिर सुर्खियों में है। इस फिल्म में 1993 के धमाकों के आरोपी दाऊद को बिस्तर पर पड़े हुए एक बीमार व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। यह उसकी उन पुरानी तस्वीरों के बिल्कुल विपरीत है जिनमें वह एक युवा के रूप में नजर आता था। दाऊद के इसी गिरते स्वास्थ्य के कारण उसके सिंडिकेट के भीतर उत्तराधिकार को लेकर गहरा विवाद पैदा हो गया था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए दाऊद का गिरोह एक बहुत बड़ी संपत्ति है, क्योंकि वह नशीले पदार्थों और जाली मुद्रा के नेटवर्क को नियंत्रित करता है। यही कारण है कि आईएसआई को सिंडिकेट को दो हिस्सों में बंटने से रोकने के लिए इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा।
क्या दाऊद के गिरोह में चल रहा उत्तराधिकार का संघर्ष?
आईएएनएस ने अपनी एक रिपोर्ट में खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों के हवाले से बताया है कि 70 वर्षीय दाऊद पिछले कई वर्षों से बीमार है और गंभीर मधुमेह व हृदय रोग से पीड़ित है। स्वास्थ्य कारणों से दाऊद मुख्य रूप से घर के अंदर ही रहता है और सदस्यों के साथ उसकी बातचीत न के बराबर होती है, जिसके कारण वह व्यवसाय की देखरेख करने में असमर्थ है। आईएसआई और सिंडिकेट ने इन स्वास्थ्य समस्याओं को लंबे समय तक छिपा कर रखा ताकि गिरोह के सदस्यों का मनोबल न गिरे।
चूंकि दाऊद रोजाना के कामकाज से बाहर है, इसलिए उत्तराधिकार की लड़ाई उसके बेहद करीबी सहयोगी छोटा शकील और परिवार के सदस्यों के बीच छिड़ गई थी। दाऊद के परिवार में उसका भाई, बेटा, पत्नी और दामाद शामिल हैं, जो चाहते थे कि सिंडिकेट का प्रमुख उनके बीच से ही कोई हो। दूसरी ओर, उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि एक टूटा हुआ सिंडिकेट कभी उस तरह काम नहीं कर पाता जैसे वह आज कर रहा है।
आईएसआई और दाऊद के गिरोह का क्या कनेक्शन?
आईएसआई यह अच्छी तरह से जानती थी कि सिंडिकेट में बंटवारा उसके लिए नुकसानदायक होगा। जब दाऊद ने भारत से भागकर पाकिस्तान में शरण ली थी, तब उसे पाकिस्तानी एजेंसियों के साथ एक सौदा करना पड़ा था। इस सौदे के तहत तय हुआ था कि दाऊद नशीले पदार्थों के व्यापार और जाली भारतीय मुद्रा से होने वाली अपनी आय का 40 प्रतिशत हिस्सा आईएसआई को देगा। यह व्यवस्था आज भी जारी है और आईएसआई इन निधियों का पूरा उपयोग भारतीय धरती पर हमला करने वाले अपने आतंकी संगठनों को चलाने के लिए करती है। सिंडिकेट के टूटने का सीधा अर्थ था कि आईएसआई को यह भारी फंड मिलना बंद हो जाता।
दाऊद के गिरोह को आईएसआई किस रूप में ढाल रही?
आईएसआई ने उत्तराधिकार के मुद्दे को सुलझाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया और गिरोह को एक कॉरपोरेट फर्म की तर्ज पर पुनर्गठित कर दिया। इस पुनर्गठन में प्रमुख लोगों को व्यक्तिगत भूमिकाएं सौंपी गई हैं:
- भारत में कौन देख रहा डी-कंपनी का काम?: कहा जाता है कि छोटा शकील सिंडिकेट का सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी है, क्योंकि वह अकेले ही भारत में ऑपरेशंस की देखरेख करता है। भारत के सभी सिंडिकेट सदस्य उसे अपना बॉस मानते हैं, इसलिए शकील को खोने का मतलब भारतीय बाजार को खोना था। इसे देखते हुए कॉरपोरेट ढांचे में शकील को भारत में डी-कंपनी के संचालन का प्रमुख बनाया गया है।
- विदेशी कारोबार: दाऊद के भाई अनीस इब्राहीम को गिरोह के विदेशी कारोबार की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
- वित्तीय प्रबंधन: दाऊद के दामाद जुनैद मियांदाद जो अपनी व्यावसायिक सूझबूझ के लिए जाने जाते हैं, को गिरोह का वित्त विभाग संभालने का जिम्मा दिया गया है।
दाऊद की पत्नी महजबीन अपने बेटे मोईन को साम्राज्य का प्रमुख बनाना चाहती थी, लेकिन उसे काफी नरम माना जाता है और उसका ध्यान धार्मिक कार्यों पर अधिक रहता है। इस उत्तराधिकार योजना पर बातचीत के दौरान भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों के कई सहयोगियों से परामर्श किया गया था। सभी का मानना था कि गिरोह का कोई एक बॉस नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे अहम का टकराव हो सकता है और ऑपरेशंस प्रभावित हो सकते हैं। यह तय किया गया है कि दाऊद की मृत्यु के बाद भी सिंडिकेट उसी तरीके से काम करेगा जैसा आईएसआई ने तय किया है।
आईएसआई के लिए दाऊद का गिरोह कितना जरूरी?
आईएसआई के लिए दाऊद आज भी फंड जुटाने वाली सबसे बड़ी मशीन बना हुआ है। इसी पैसे का उपयोग इंडियन मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को चलाने के लिए किया जाता है। इसके बदले में आईएसआई सिंडिकेट को सुरक्षा और नशीले पदार्थों को ले जाने की अनुमति देती है, और साथ ही लॉजिस्टिक्स (रसद) एवं तस्करी के मार्गों को सुरक्षित रखने में मदद करती है। इस नई रणनीति से आईएसआई ने न केवल दाऊद सिंडिकेट को बिखरने से बचाया है, बल्कि अपने नापाक इरादों के लिए फंडिंग की लगातार आपूर्ति भी सुनिश्चित कर ली है।



