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बैंकिंग सेक्टर का हाल: 11 साल में 9.75 लाख करोड़ रुपये के लोन राइट ऑफ किए, जानिए यह कर्ज माफी से कैसे अलग


भारतीय बैंकिंग प्रणाली में ‘नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स’ यानी एनपीए और लोन राइट-ऑफ की स्थिति पर सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि पिछले 11 वित्तीय वर्षों में बैंकों ने कुल 9.75 लाख करोड़ रुपये के ऋण को बट्टे खाते में डाला है। हालांकि, आंकड़ों में यह भारी भरकम राशि कर्जदारों के लिए कोई राहत लेकर नहीं आई है, क्योंकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि राइट-ऑफ का मतलब किसी भी तरह से देनदारियों की माफी नहीं है।

कैसे बढ़ा और घटा राइट-ऑफ का ग्राफ

सोमवार को सदन में दी गई जानकारी के अनुसार, लोन राइट-ऑफ की गई राशि वित्त वर्ष 2020 (FY20) में अपने सर्वोच्च स्तर 1.59 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई थी। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान भी राइट-ऑफ की राशि 1 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। 

    

राहत की बात यह है कि इसके बाद से इस रुझान में लगातार गिरावट देखी जा रही है और मौजूदा वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा घटकर 47,568 करोड़ रुपये रह गया है। 

    

पिछले कुछ वर्षों के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति इस प्रकार रही है:


  • वित्त वर्ष 2015 में बैंकों ने 31,723 करोड़ रुपये के लोन राइट-ऑफ किए।

  • वित्त वर्ष 2016 में यह आंकड़ा 40,416 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

  • वित्त वर्ष 2017 में 68,308 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले गए।

  • वित्त वर्ष 2018 में यह राशि और बढ़कर 99,132 करोड़ रुपये हो गई थी।

क्या राइट-ऑफ का मतलब कर्जदारों को फायदा पहुंचाना है?


इस आम धारणा को पूरी तरह से खारिज करते हुए मंत्री ने स्पष्ट किया है कि राइट-ऑफ की प्रक्रिया से कर्जदारों की देनदारी खत्म नहीं होती है, और न ही इससे कर्जदार को कोई लाभ मिलता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों और संबंधित बैंकों के बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति के अनुसार, बैंक केवल उन एनपीए को बट्टे खाते में डालते हैं जिनके लिए चार साल पूरे होने पर शत-प्रतिशत प्रोविजनिंगकर दी गई हो। 

अब आगे क्या?

कर्ज को बट्टे खाते में डालने के बावजूद, कर्जदारों पर पुनर्भुगतान की जिम्मेदारी पहले की तरह ही लागू रहती है। राइट-ऑफ किए गए इन ऋणों की वसूली एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। बैंक इन खातों में शुरू की गई अपनी रिकवरी की कार्रवाई लगातार जारी रखते हैं। वित्तीय संस्थान उनके पास उपलब्ध विभिन्न रिकवरी तंत्रों के तहत बकायेदारों के खिलाफ अपने प्रयास सक्रिय रूप से आगे बढ़ाते रहते हैं। इससे साफ है कि बहीखातों की सफाई के साथ-साथ बैंकों का जोर कर्ज वसूली पर लगातार बना हुआ है।



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