आयकर विभाग ने बैंक और पोस्ट ऑफिस की जमा राशियों पर मिलने वाले ब्याज पर टैक्स कटौती (टीडीएस) के नियमों को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है। सोमवार को जारी एक आधिकारिक बयान में विभाग ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 के तहत शासित होने वाली सभी “बैंकिंग कंपनियों” को निर्धारित सीमा से अधिक ब्याज आय होने पर ही टीडीएस काटना होगा। यह कदम नए आयकर अधिनियम, 2025 के लागू होने के बाद बैंकिंग संस्थानों की परिभाषा और उनके अनुपालन को लेकर उत्पन्न हुए तकनीकी भ्रम को दूर करने के लिए उठाया गया है।
आम और वरिष्ठ नागरिकों के लिए क्या है टीडीएस की सीमा?
आयकर कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत जमाकर्ताओं के लिए टीडीएस कटौती की सीमाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई हैं। नियमों के अनुसार:
- यदि किसी सामान्य नागरिक को एक वित्तीय वर्ष में बैंक या पोस्ट ऑफिस जमा से 50,000 रुपये से अधिक का ब्याज मिलता है, तो उस पर स्रोत पर कर कटौती की जाएगी।
- वरिष्ठ नागरिकों को राहत देते हुए यह सीमा एक लाख रुपये प्रति वित्तीय वर्ष तय की गई है।
- आयकर विभाग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि धारा 393 (1) में दी गई इस तय सीमा से कम राशि होने पर ऐसे किसी भी बैंक या बैंकिंग संस्थान को आयकर काटने की आवश्यकता नहीं होगी।
नए आयकर कानून 2025 में बैंकिंग कंपनी की परिभाषा
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक आधिकारिक पोस्ट में, आयकर विभाग ने नए कर कानूनों के तहत टीडीएस कटौती से जुड़े तकनीकी पहलुओं को विस्तार से समझाया। नए आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 402 के तहत, एक बैंकिंग कंपनी वह है जिस पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 के प्रावधान लागू होते हैं।
पुराने आयकर अधिनियम, 1961 में बैंकिंग कंपनी के दायरे में न केवल वे कंपनियां शामिल थीं जिन पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 लागू होता था, बल्कि उस अधिनियम की धारा 51 के तहत आने वाले बैंक या बैंकिंग संस्थान भी साफ तौर पर शामिल थे। नए कानून में धारा 51 का सीधा उल्लेख न होने से जो असमंजस बना था, उस पर विभाग ने साफ किया है कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की मौजूदा धारा 51 के प्रभाव से, ऐसे सभी बैंक और संस्थान बिना किसी स्पष्ट उल्लेख के भी नए आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 402 के तहत बैंकिंग कंपनी ही माने जाएंगे।
अब आगे क्या?
इस तकनीकी स्पष्टीकरण से देश के लाखों जमाकर्ताओं के बीच टीडीएस कटौती को लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित होगी और उन्हें अकारण टैक्स कटने की चिंता नहीं सताएगी। साथ ही, देश के सभी बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के लिए भी अनुपालन का रास्ता साफ हो गया है। इससे वित्तीय वर्ष के अंत में कर कटौती की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलेगी और किसी भी प्रकार के विधिक या तकनीकी विवाद की गुंजाइश नहीं रहेगी।



