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हरियाणा में नौल्था की डाट होली: कढ़ाहों में पकाया रंग, महिलाओं ने छतों से फेंका, पूरा दिन चली टोलियों की मस्ती; धूमधाम से निकाली झांकी – Panipat News


पानीपत4 घंटे पहलेलेखक: अमन वर्मा

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पानीपत के नौल्था गांव में बुधवार को होली खेलते फाग कमेटी के सदस्य।

हरियाणा के पानीपत में 909वीं ऐतिहासिक डाट होली मनाई गई। नौल्था की होली साल 1288 से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है। इसके लिए कई दिन से तैयारी शुरू हो जाती है। बड़े-बड़े कढ़ाहों में रंग पका लिया गया था।

आज बुधवार को फाग के दिन युवाओं की टोली जैसे ही गलियों से निकली, उन पर महिलाओं ने छतों से रंग फेंका। पूरा दिन इसी तरह मस्ती चली। इस दौरान गांव में झांकी भी निकाली गई।

बता दें कि युवकों की टोलियां हाथ ऊपर कर अपने सीने से एक दूसरे को पीछे धकेलती हैं। इस जोर आजमाइश में जो गिर जाता है या पीछे हट जाता है, उसे हार माननी पड़ती है। 15 दिन पहले ही 6 मोहल्लों के युवक इसकी प्रैक्टिस करना शुरू कर देते हैं। यह प्रैक्टिस भी मोहल्ला बदल-बदलकर की जाती है।

ग्रामीणों के अनुसार, अंग्रेजों के शासनकाल में होली के समय गांव के एक युवक की मौत हो गई थी। इस पुरानी परंपरा को टूटने से बचाने के लिए युवक के पिता ने बाल्टी में रंग भरकर अपनी बेटी की अर्थी पर डाल दिया था।

ढोल की थाप पर डांस करते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य

ढोल की थाप पर डांस करते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य

11 बजे के बाद शुरू हुई डाट होली

नौल्था फाग कमेटी के मेंबर कैलाश चंद ने बताया कि नौल्थ की होली पूरे देश में मशहूर है। 3 मार्च को गांव में फ्लैग मार्च निकाला गया था, ताकि भाईचारा बना रहे। ग्रामीणों को कहा गया है कि वह सुबह 11 बजे से पहले अपने काम निपटा लें, इसके बाद गांव की गलियों में डाट होली खेली जाएगी। आज तय समय पर होली शुरू हुई।

गांव में झांकी निकालते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य।

गांव में झांकी निकालते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य।

अब जानिए क्या है डाट होली, इसकी कैसे शुरुआत हुई….

लाठे वाले बाबा ने शुरू की थी परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार, बाबा लाठे वाले 909 साल पहले फाग के दौरान मथुरा के दाऊजी गांव गए थे। वहां फाग (धुलंडी) उत्सव में लोगों का आपसी प्रेम और भाईचारा देख कर प्रभावित हुए। उन्होंने गांव आकर उत्सव को मनाने का फैसला लिया और तभी से नौल्था में हर साल डाट होली उत्सव मनाया जा रहा है। गांव के लोग इस ऐतिहासिक परंपरा के लिए अंग्रेजों तक से लोहा ले चुके हैं। नौल्था गांव की आबादी करीब 15 हजार है और पूरा गांव जहां रंगों में सराबोर होकर होली खेलता है, यहां की ऐतिहासिक होली को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और इसमें भाग लेते हैं।

गांव में झांकियां निकलती हैं

सुबह सबसे पहले देवर-भाभी के बीच होली खेली जाती है। इसके बाद गांव में विभिन्न तरह की झांकियां निकलती हैं। इसमें बाबा लाठे वाली की झांकी सबसे पहले निकलती है। दूसरे नंबर पर गौमाता की झांकी होती है। एक के बाद एक कुल 12 से 15 धार्मिक झांकियां निकाली जाती हैं।

नौल्था गांव में एक दूसरे को धकेलने की प्रैक्टिस करते युवक। यह रिहर्सल 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है।

नौल्था गांव में एक दूसरे को धकेलने की प्रैक्टिस करते युवक। यह रिहर्सल 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है।

जो टीम गिर गई, वो हारी

झांकियां निकालने के बाद दोपहर को गांव की सभी 6 चौपालों में बड़े-बड़े कढ़ाहों में बाजारों से लाया रंग पकाया जाता है। ये कढ़ाहे गांवों के ही होते हैं। रंगों को पकाने के लिए गर्म किया जाता है। कुछ ही देर बाद रंग पक जाते हैं और फिर गांव में डाट होली का उत्सव शुरू होता है। दो टोलियां एक-दूसरे के सामने हो जाती हैं। महिलाएं छतों गर्म रंग डालती हैं। जो टोली, दूसरी टोली को पीछे धकेल देती है, वो जीत जाती है।

बेटे की मौत पर भी टूटने नहीं दी थी परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार अंग्रेजों के समय में गांव में एक धूमन जैलदार होता था, जिसका एक बेटा सरदारा था। गांव में होली की पूरी तैयारी थी, लेकिन उसी समय धूमन के बेटे की मौत हो गई। गांव में शोक था और किसी ने होली नहीं खेली। धूमन ने गांव की परंपरा टूटती देखी तो चौपाल से एक बाल्टी रंग की भरी और बेटे की अर्थी पर डाल दी। सभी गांव वालों को कहा कि भगवान की मर्जी से आना-जाना होता है। त्योहार भुलाए नहीं जा सकते।

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