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oi-Sumit Jha
Iran Israel War: ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को एक महीना हो चुका है, लेकिन शांति की कोई किरण नजर नहीं आ रही। इस बीच, भारत में ईरान के प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने एक बड़ा खुलासा किया है।
अब्दुल माजिद हकीम इलाही का कहना है कि यह युद्ध केवल विचारधारा की लड़ाई नहीं, बल्कि इसके पीछे हथियारों का बड़ा कारोबार और कच्चे तेल का खेल छिपा है। इलाही के मुताबिक, अमेरिका और इजराइल जैसे देश इस जंग को जानबूझकर लंबा खींच रहे हैं ताकि वे आर्थिक मुनाफा कमा सकें। आइए समझते हैं इस युद्ध के पीछे का पूरा आर्थिक गणित।

Middle East Crisis: हथियारों की बिक्री से बढ़ती कमाई
हकीम इलाही का दावा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी इस युद्ध को इसलिए जारी रखना चाहते हैं क्योंकि इसमें उनके हथियार बनाने वाली कंपनियों का फायदा है। जब तक मिसाइलें और बम गिरेंगे, तब तक इन हथियारों की मांग बनी रहेगी। उनके अनुसार, शांति स्थापित करने के बजाय इन देशों का ध्यान इस बात पर है कि कैसे नए रक्षा सौदे किए जाएं और युद्ध के मैदान को एक बाजार की तरह इस्तेमाल किया जाए।
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कच्चे तेल की कीमतों का खेल
युद्ध की वजह से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें अस्थिर हो गई हैं। ईरान के प्रतिनिधि का मानना है कि तेल की कीमतों में यह उछाल कुछ बड़े देशों के लिए फायदे का सौदा है। जबकि गरीब और विकासशील देश इस बढ़ती महंगाई से परेशान हैं, युद्ध भड़काने वाले देश इस आर्थिक अस्थिरता का लाभ उठा रहे हैं। उनके लिए यह युद्ध इंसानियत का नहीं, बल्कि डॉलर और मुनाफे का खेल बन चुका है।
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भारत की मध्यस्थता पर बड़ी उम्मीद
इलाही ने पाकिस्तान जैसे देशों की मध्यस्थता की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि ईरान को भारत पर भरोसा है। भारत की छवि दुनिया में एक शांतिप्रिय और निष्पक्ष देश की है। ईरान चाहता है कि भारत अपनी वैश्विक साख का इस्तेमाल कर अमेरिका और इजराइल पर दबाव बनाए। भारत की दखलअंदाजी इस तनाव को खत्म करने में गेम-चेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि भारत के रिश्ते दोनों पक्षों से संतुलित हैं।
गरीब देशों की चरमराती अर्थव्यवस्था
इस आर्थिक खेल का सबसे बुरा असर दुनिया के गरीब और विकासशील देशों पर पड़ रहा है। इलाही ने चिंता जताई कि बड़े देशों को आम जनता की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन टूट रही है और जरूरी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक युद्ध को एक बिज़नेस मॉडल की तरह देखा जाएगा, तब तक शांति की उम्मीद करना बेमानी है।
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