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US-Iran युद्ध की मार से हिला जूता-कपड़ा उद्योग! नोएडा में मजदूरों का पलायन, महंगा हुआ कच्चा माल


Uttar Pradesh

oi-Sohit Kumar

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष (अब युद्धविराम) का असर अब भारत के उद्योगों पर भी दिखने लगा है। खासकर नोएडा के जूता और कपड़ा निर्माण सेक्टर को इससे बड़ी चुनौती झेलनी पड़ रही है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ गई हैं, आपूर्ति (supply) में रुकावट आ रही है और मजदूरों की कमी से फैक्ट्रियां आधी क्षमता पर काम कर रही हैं। हालात ऐसे हैं कि कई यूनिट्स को उत्पादन कम करना पड़ा है और कारोबार पर सीधा असर पड़ा है।

नोएडा की एक जूता बनाने वाली कंपनी, जो रोजाना करीब 3,000 से 4,000 जूतों के तलिये बनाती थी, अब आधी क्षमता पर काम कर रही है। पहले यहां 24 घंटे उत्पादन होता था, लेकिन अब काम घटकर सिर्फ 8.5 घंटे रह गया है। इसकी बड़ी वजह कच्चे माल की कमी और मजदूरों की घटती संख्या है। खाना पकाने वाली गैस की कमी के कारण कई मजदूर अपने गृहनगर लौट गए, जिससे फैक्ट्री के संचालन (operations) में मुश्किलें बढ़ गई हैं।

West Asia conflict impact

कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल

जूता निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। पॉलीयूरेथेन (PU) रबर की कीमत लगभग 50% तक बढ़ गई है। मोनो-एथिलीन ग्लाइकोल (MEG), जो कुवैत से आयात होता है, उसकी आपूर्ति प्रभावित हुई है। इन वजहों से जूते के तलिये बनाने की कुल लागत लगभग 15% बढ़ गई है। इसी का असर कंपनी के कारोबार पर पड़ा और पिछले महीने टर्नओवर करीब 25% गिर गया।

भारत के फुटवियर उद्योग पर असर

भारत का फुटवियर उद्योग चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है और इसमें करीब 44.2 लाख लोग काम करते हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष से पेट्रोकेमिकल (petrochemical) सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके कारण

  • सिंथेटिक रबर
  • पॉलीयूरेथेन (PU)
  • ईवीए (EVA)

जैसे कच्चे माल महंगे हो गए हैं। कुछ मामलों में इनकी कीमतें दोगुनी तक पहुंच गई हैं।

कपड़ा उद्योग भी दबाव में

केवल फुटवियर सेक्टर ही नहीं, नोएडा का कपड़ा उद्योग भी इस संकट से प्रभावित है। यूरोप के ब्रांडों को कपड़े सप्लाई करने वाली एक यूनिट में करीब 10-12% मजदूर वापस अपने गांव लौट चुके हैं। गैस की कमी और बढ़ती जीवन लागत (cost of living) इसकी बड़ी वजह है। इससे फैक्ट्री को कम क्षमता पर उत्पादन करना पड़ रहा है।

पॉलिएस्टर उद्योग पर भी असर

पॉली-एथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) की कीमतों और उपलब्धता पर भी असर पड़ा है। PET पॉलिएस्टर फाइबर का मुख्य कच्चा माल है और इसका इस्तेमाल भारत के लगभग 40% परिधान उत्पादन में होता है।

कीमतें बढ़ने से कपड़ा निर्माताओं पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

निर्यात को लेकर भी चिंता
भारत के परिधान निर्यात का करीब 11% हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इज़राइल जैसे देशों में जाता है। ये क्षेत्र फिलहाल संघर्ष से प्रभावित हैं। इस वजह से नए ऑर्डर मिलने में देरी हो रही है। भुगतान प्रक्रिया (payment cycle) भी लंबी होने की आशंका है।

गैस सप्लाई में कटौती से बढ़ी परेशानी
ऊर्जा आपूर्ति में आई रुकावट ने उद्योगों की मुश्किल और बढ़ा दी है। नोएडा की कई औद्योगिक इकाइयों को अनुबंधित गैस सप्लाई का केवल 80% ही मिल रहा है। खाना पकाने की गैस की कमी से मजदूरों का खर्च बढ़ा है और कई लोग अपने घर लौटने लगे हैं। इससे फैक्ट्रियों में कामगारों की कमी और बढ़ गई है।

युद्धविराम के बाद भी अनिश्चितता
हाल ही में 15 दिन के युद्धविराम की घोषणा जरूर हुई है, लेकिन उद्योग जगत का मानना है कि इससे तुरंत राहत मिलने की उम्मीद कम है। एक्सपर्ट के मुताबिक यह देखना अभी बाकी है कि कच्चे माल की कीमतें कब स्थिर होंगी। सप्लाई चेन (supply chain) कब सामान्य होगी। और मजदूरों की वापसी कब तक संभव होगी। फिलहाल उद्योगों के सामने उत्पादन और लागत दोनों को संभालना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।



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