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Business Updates: कोल इंडिया ने उठाया बढ़ती लागत का बोझ; ग्राहकों को कीमतों में उछाल से बचाने की कोशिश


सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) ने फैसला किया है कि वह बढ़ती लागत का बोझ खुद उठाएगी और कोयले की कीमतें नहीं बढ़ाएगी। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण विस्फोटकों और औद्योगिक डीजल के दाम काफी बढ़ गए हैं। विस्फोटकों में इस्तेमाल होने वाले अमोनियम नाइट्रेट की कीमत 44 प्रतिशत बढ़कर 72,750 रुपये प्रति टन हो गई है। इससे विस्फोटकों की औसत लागत में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं, डीजल की कीमत भी करीब 54 प्रतिशत बढ़कर 142 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है।

कोल इंडिया का कहना है कि अगर वह इन बढ़ी हुई कीमतों का बोझ ग्राहकों पर डालती है, तो इससे बिजली और अन्य क्षेत्रों में महंगाई बढ़ सकती है। कंपनी अपनी खदानों में काम करने वाले ठेकेदारों को भी डीजल की बढ़ी हुई कीमतों का मुआवजा दे रही है। लागत के दबाव के बावजूद, कोल इंडिया ने कोयले की आपूर्ति को सस्ता रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। कंपनी ने ई-नीलामी में कोयले की आरक्षित कीमतों को कम किया है और नीलामी की संख्या बढ़ा दी है। इसका उद्देश्य आम नागरिकों को किफायती दरों पर ईंधन उपलब्ध कराना और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना है।

पश्चिम एशिया युद्ध ऊर्जा सुधारों का बड़ा अवसर

एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद के सदस्य नीलकंठ मिश्रा ने कहा है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष भारत के लिए ऊर्जा क्षेत्र में सुधार करने का एक अच्छा मौका है। उन्होंने कहा कि भारत में घरों और किसानों के लिए बिजली दुनिया में सबसे सस्ती है, लेकिन उद्योगों और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए यह सबसे महंगी है। मिश्रा के अनुसार, भविष्य के विकास के लिए ऊर्जा का सही दाम तय करना और उसका सावधानी से इस्तेमाल करना बहुत जरूरी है।

उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि उद्योगों को सस्ती बिजली मिलनी चाहिए। इससे देश में रोजगार पैदा होंगे और लोग खुद अपना बिजली बिल भरने में सक्षम बनेंगे, जिससे हर जगह मुफ्त बिजली देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने 1970 के दशक के तेल संकट के बाद जापान के सुधारों का उदाहरण दिया। जापान ने अपनी ऊर्जा दक्षता को इतना बेहतर किया कि वह अब प्रति यूनिट ऊर्जा से भारत के मुकाबले चार गुना अधिक जीडीपी पैदा करता है। मिश्रा ने चेतावनी भी दी कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं और लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक गिर सकता है।



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