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oi-Ankur Sharma
Varuthini Ekadashi 2026: हर साल वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं। यह व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सौभाग्य, समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी का पुण्य हजारों वर्षों की तपस्या के बराबर होता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति चाहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यह व्रत व्यक्ति को दुर्भाग्य से बचाता है।

वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 13 अप्रैल 2026 को 1: 17 AM पर हुई थी और इसका समापन 14 अप्रैल 2026, रात 01:08 बजे होगा ,उदयातिथि मान्य होने के कारण व्रत आज रखा गया है, व्रत का पारण 14 अप्रैल को सुबह 06:54 बजे से 08:31 बजे के बीच का है।
वरुथिनी एकादशी की पूजा विधि क्या है?
प्रातः स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करें।घर के मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।फिर तुलसी पत्ते, फल, फूल, धूप, दीप, पीला वस्त्र और पंचामृत अर्पित करें।मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। दिनभर उपवास रखें, फलाहार या निर्जला व्रत कर सकते हैं। वरुथिनी एकादशी की कथा सुनें या पढ़ें। अगले दिन द्वादशी तिथि पर विधि अनुसार व्रत खोलें।
वरुथिनी एकादशी की कथा क्या है?
प्राचीन समय में राजा मान्धाता नामक एक महान और धर्मात्मा राजा थे। वे सत्यवादी, दानी और प्रजा के हित में कार्य करने वाले शासक थे। एक बार राजा मान्धाता जंगल में तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान एक भालू (रीछ) ने उन पर हमला कर दिया और उनके पैर को काटने लगा। राजा अत्यंत पीड़ा में थे, लेकिन उन्होंने अपने धर्म और तप को नहीं छोड़ा और भगवान से प्रार्थना करते रहे। राजा की इस स्थिति को देखकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस भालू का वध कर दिया। इसके बाद भगवान विष्णु ने राजा को वरुथिनी एकादशी का व्रत करने को कहा।
राजा ने श्रद्धा और नियम के साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत किया
भगवान विष्णु ने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से राजा अपने खोए हुए अंग को पुनः प्राप्त कर लेंगे और उनके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। राजा मान्धाता ने श्रद्धा और नियम के साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनका शरीर पुनः स्वस्थ हो गया और उन्हें पूर्व की तरह संपूर्ण अंग प्राप्त हो गए। यह व्रत मनुष्य को दुर्भाग्य, दुख और पापों से बचाता है।
DISCLAIMER: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी बात को अमल में लाने से पहले किसी पंडित या ज्योतिषी से जरूर बातें करें।



