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राजनांदगांव जिले की आखिरी सक्रिय नक्सली सदस्य उर्मिला उर्फ टेटकी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. 13 सालों तक दहशत का पर्याय रही उर्मिला ने हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है, जिससे नक्सली संगठन को बड़ा झटका लगा है.
15 साल की उम्र में बंदूक उठाने वाली उर्मिला ने कहा कि उसे बहला-फुसलाकर नक्सली बनाया गया.
छत्तीसगढ़ के बस्तर और राजनांदगांव के जंगलों में सालों तक लाल आतंक का झंडा बुलंद करने वाले नक्सलियों के पैर अब उखड़ने लगे हैं. सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और शासन की बेहतर पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर अब बड़े-बड़े नक्सली कैडर मुख्यधारा में लौटने को मजबूर हो रहे हैं. इसी कड़ी में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है, जब रावघाट एरिया कमेटी की सक्रिय सदस्य उर्मिला ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए. बस्तर की रावघाट एरिया कमेटी की सदस्य रही महिला माओवादी उर्मिला उर्फ टेटकी (28) ने मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला मुख्यालय पहुंचकर पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया है. उर्मिला बुधवार शाम को अचानक पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंची, जिससे वहां हड़कंप मच गया. इसके बाद गुरुवार को पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में आत्मसमर्पण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी कराई गई.
एसपी यशपाल सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि उर्मिला ने बिना किसी दबाव के अपनी स्वेच्छा से आत्मसमर्पण की इच्छा जताई है. उसे शासन की पुनर्वास नीति के तहत वे तमाम सुविधाएं और आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी जो एक आत्मसमर्पित नक्सली को दी जाती है. अधिकारियों के अनुसार, उर्मिला नांदगांव जिले में सक्रिय माओवादी कैडर की आखिरी सदस्य बताई जा रही है. उसके सरेंडर के साथ ही इस क्षेत्र में सक्रिय नक्सली दस्ते का लगभग सफाया हो गया है. उर्मिला मूलतः मानपुर ब्लॉक के मुंजाल गांव की रहने वाली है. वह पिछले 13 वर्षों से सशस्त्र माओवादी संगठन के साथ जुड़ी हुई थी और बस्तर के घने जंगलों में सक्रिय रही. पूछताछ के दौरान उर्मिला ने अपनी जो कहानी सुनाई, वह बेहद चौंकाने वाली है.
उसने बताया कि जब वह मात्र 15 वर्ष की थी, तब डीवीसीएम जंगू उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ कोयलीबेड़ा क्षेत्र ले गया था. वहां उसे जबरन संगठन में शामिल किया गया और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई. उर्मिला ने पुलिस को बताया कि नक्सली संगठन के भीतर अब भेदभाव और शोषण बढ़ गया है, जिससे तंग आकर उसने यह रास्ता चुना. करीब डेढ़ माह पहले उसकी मुलाकात डीवीसीएम हार्डकोर माओवादी चंदर और एसीएम रुपी से कांकेर के जंगलों में हुई थी. संगठन की खोखली विचारधारा से परेशान होकर उर्मिला कुछ दिन पहले बिना किसी हथियार के ही जंगल के रास्ते बस्तर से मोहला की ओर निकल पड़ी थी. वह कई दिनों तक पैदल चलती रही और अंततः पुलिस के पास पहुंचने में सफल रही. पुलिस का मानना है कि उर्मिला के सरेंडर करने से नक्सली संगठन के सूचना तंत्र को भारी क्षति पहुंची है.
उर्मिला को संगठन की कई आंतरिक रणनीतियों और ठिकानों की जानकारी है, जो आने वाले समय में सुरक्षा बलों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती है. छत्तीसगढ़ सरकार की ‘नई राह’ जैसी योजनाओं ने नक्सलियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर किनके लिए लड़ रहे हैं. उर्मिला ने अन्य नक्सलियों से भी अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन जीने के लिए आगे आएं. इस आत्मसमर्पण को पुलिस विभाग अपनी एक बड़ी उपलब्धि मान रहा है, क्योंकि उर्मिला जैसे पुराने और अनुभवी कैडर का जाना नक्सलियों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ देगा. अब पुलिस उर्मिला से मिली जानकारी के आधार पर बस्तर के अन्य इलाकों में भी सर्च ऑपरेशन तेज करने की योजना बना रही है.
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