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राजस्थान में मौत का सौदागर गैंग: पहले करवाते थे बीमा, फिर करंट लगाकर लेते थे जान! भीलवाड़ा पुलिस का बड़ा खुलासा


भीलवाड़ा. क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी गरीबी और बीमारी किसी के लिए कमाई का जरिया बन सकती है? भीलवाड़ा पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो इंसानी लाशों पर नोटों की गद्दी बिछाने का काला कारोबार कर रहा था. गुजरात से एक बीमार शख्स को इलाज के बहाने राजस्थान लाया गया, उसे शराब का आदी बनाया गया और फिर जब उसकी मौत हुई, तो उसे हादसा दिखाने के लिए लाश के साथ जो बर्बरता की गई, उसने खाकी के भी होश उड़ा दिए. यह कहानी केवल एक हत्या की नहीं, बल्कि एक सुनियोजित इंश्योरेंस मर्डर सिंडिकेट की है.

कैसे काम करता था यह ‘डेथ-इंश्योरेंस’ गिरोह?
पुलिसिया पूछताछ और जांच में जो कड़ियां सामने आई हैं, वे किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं हैं. इनका काम करने का तरीका बेहद शातिराना था-

  • टारगेट की तलाश: गिरोह का सबसे पहला कदम उन लोगों को ढूंढना होता था जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हों, गंभीर रूप से बीमार हों या शराब की लत में डूबे हों.
  • बीमा का जाल: टारगेट मिलते ही गिरोह उनके नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये की भारी-भरकम बीमा पॉलिसी लेता था.
  • विश्वास जीतना: परिवार को मदद का झांसा देकर या बेहतर इलाज का लालच देकर पीड़ित को अपने कब्जे में ले लेते थे.
  • साजिश का ठिकाना: पीड़ित को उसके राज्य से दूर किसी दूसरे राज्य के सुनसान इलाके या किराए के कमरे में शिफ्ट किया जाता था.
  • मौत को हादसे का रंग: प्राकृतिक मौत होने पर या हत्या करने के बाद, उसे दुर्घटना साबित करने के लिए शव के साथ छेड़छाड़ की जाती थी.
  • क्लेम की बंदरबांट: फर्जी गवाह और दस्तावेजों के आधार पर बीमा कंपनी से मोटी रकम ऐंठना इनका अंतिम लक्ष्य होता था।

जब दीपक की कर दी गई ‘किराए की मौत’, घटना से समझिए पूरा मामला
भीलवाड़ा के एसपी धर्मेंद्र सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने जिस मामले का खुलासा किया, उसकी परतें सात मई की रात से खुलना शुरू हुईं. अहमदाबाद का रहने वाला 36 वर्षीय दीपक भाई लंबे समय से बीमार था और गरीबी के कारण लाचार था. उसे क्या पता था कि उसकी यही लाचारी विश्वास सूरज सैमुअल, भीखा भाई और डालू गाडरी जैसे गिद्धों के लिए सुनहरा अवसर बन जाएगी.

आरोपियों ने दीपक को शराब का इतना आदी बना दिया कि वह सही-गलत का फर्क भूल गया. उसे इलाज के नाम पर भीलवाड़ा के मालोला गांव के एक किराए के मकान में लाया गया. साजिश के तहत दीपक की मौत हो गई या उसे मार दिया गया. लेकिन गिरोह को डर था कि अगर सामान्य मौत हुई, तो बीमा का क्लेम नहीं मिलेगा.

क्लेम के लिए जला दी उंगलियां
बीमा क्लेम एक्सीडेंटल हो, इसके लिए आरोपियों ने हैवानियत की हदें पार कर दीं. दीपक की मौत के बाद उसके हाथ की उंगलियों और पैर के अंगूठे को माचिस की तीलियों से जलाया गया. मकसद साफ था. पुलिस और डॉक्टर को यह यकीन दिलाना कि उसकी मौत करंट लगने से हुई है.

डॉक्टर को भी चकमा देने की हुई कोशिश
जब आरोपी दीपक की लाश लेकर मांडल अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें लगा कि वे सिस्टम को चकमा दे देंगे। लेकिन वहां मौजूद सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. रोहित सेहरावत की नजरों ने खेल बिगाड़ दिया. डॉक्टर को शरीर पर जलने के निशान करंट जैसे लगे ही नहीं. सबसे अहम सुराग तब मिला जब डॉक्टर ने मृतक के सीने पर ECG इलेक्ट्रोड के निशान देखे, जो यह बता रहे थे कि अस्पताल लाने से पहले भी कोई खेल हुआ था.

पुलिस ने ऐसे दबोचा
डॉक्टर ने तुरंत पुलिस को अलर्ट किया. पुलिस के आने की भनक लगते ही आरोपी अस्पताल से रफूचक्कर हो गए. हालांकि, एसपी धर्मेंद्र सिंह की टीम ने तकनीकी जांच और मुखबिरों के जाल से गंगरार टोल नाके पर घेराबंदी कर तीनों मुख्य आरोपियों को दबोच लिया.

दीपक की मां और मासूम बेटे पर क्या गुजर रही होगी
दीपक की मां चंपाबेन और उनके मासूम बेटे देवांश के लिए यह किसी कयामत से कम नहीं था. जिस शख्स को वे बेहतर इलाज के लिए राजस्थान भेज रहे थे, वह चंद रुपयों के लालच में एक गिरोह की भेंट चढ़ गया. पुलिस अब यह खंगाल रही है कि गुजरात और राजस्थान के इस नेटवर्क ने अब तक कितने परिवारों के चिराग बुझाए हैं.

यह मामला समाज के लिए एक चेतावनी है कि कैसे सफेदपोश दिखने वाले लोग गरीबों की मजबूरी का सौदा करते हैं. भीलवाड़ा पुलिस की इस कार्रवाई ने न केवल एक गिरोह को सलाखों के पीछे भेजा है, बल्कि बीमा क्षेत्र में चल रहे एक बहुत बड़े और घिनौने रैकेट का भंडाफोड़ भी किया है.



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