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नक्सलवाद की ढहती दीवारें और मध्यप्रदेश की रणनीतिक जीत


Opinion

oi-Pallavi Kumari

भारत में नक्सलवाद लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा है। जंगलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला यह लाल आतंक केवल हिंसा तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने विकास, लोकतंत्र और जनविश्वास को भी प्रभावित किया।

मध्यप्रदेश का बालाघाट क्षेत्र भी वर्षों तक इस चुनौती से जूझता रहा। लेकिन अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। मध्यप्रदेश ने नक्सलवाद के खिलाफ जिस प्रभावी रणनीति और दृढ़ संकल्प के साथ अभियान चलाया है, वह आज पूरे देश के लिए एक मॉडल बनता दिखाई दे रहा है।

Naxalism in Madhya Pradesh

इस परिवर्तन के पीछे मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्पष्ट नेतृत्व और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी गंभीर सोच महत्वपूर्ण रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लगातार यह संदेश दिया कि प्रदेश में विकास और सुरक्षा साथ-साथ चलेंगे तथा नक्सलवाद जैसी चुनौती को किसी भी स्थिति में बढ़ने नहीं दिया जाएगा। उनके मार्गदर्शन में सुरक्षा एजेंसियों को बेहतर समन्वय, संसाधन और आधुनिक रणनीति के साथ कार्य करने का अवसर मिला।

इसी के साथ पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना के नेतृत्व ने नक्सल विरोधी अभियान को नई दिशा दी। उन्होंने केवल ऑपरेशन आधारित दृष्टिकोण तक सीमित न रहकर इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत करने, सीमावर्ती राज्यों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करने और हॉक फोर्स को अत्याधुनिक प्रशिक्षण एवं संसाधनों से सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया। परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश पुलिस ने नक्सली गतिविधियों पर लगातार प्रभावी प्रहार किए और उनके नेटवर्क को कमजोर करने में सफलता प्राप्त की।

मध्यप्रदेश पुलिस की इसी उपलब्धि को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बस्तर में आयोजित “उद्घोष बस्तर” कार्यक्रम में डीजीपी कैलाश मकवाणा, वरिष्ठ अधिकारियों और हॉक फोर्स के जवानों को सम्मानित किया। यह सम्मान नक्सल उन्मूलन अभियान में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया।

पिछले दो वर्षों की उपलब्धियां बताती हैं कि नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। दिसंबर 2023 से दिसंबर 2024 के बीच सात बड़ी मुठभेड़ें हुईं, जिनमें कई इनामी नक्सली मारे गए और बड़ी मात्रा में हथियार जब्त किए गए। वर्ष 2025 में यह अभियान और अधिक प्रभावी हुआ, जब दस बड़ी मुठभेड़ों में दस माओवादी ढेर किए गए। यह किसी एक वर्ष में मारे गए माओवादियों की सर्वाधिक संख्या मानी जा रही है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब नक्सली संगठनों का मनोबल टूटता दिखाई दे रहा है। कई बड़े माओवादी कमांडरों ने आत्मसमर्पण किया है। यह केवल सुरक्षा बलों की सामरिक सफलता नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी नक्सलवाद की पराजय का संकेत है।

हालांकि यह सफलता आसान नहीं थी। 1991 से लेकर अब तक नक्सलियों ने कई हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया, जिनमें अनेक पुलिसकर्मी शहीद हुए। लैंडमाइन ब्लास्ट, घात लगाकर किए गए हमले और राजनीतिक हत्याओं ने प्रदेश को लंबे समय तक प्रभावित किया। लेकिन सुरक्षा बलों के साहस और नेतृत्व की दृढ़ता ने परिस्थितियों को बदल दिया।

आज मध्यप्रदेश में नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है। जिन क्षेत्रों में कभी भय और बारूद का वातावरण था, वहां अब विकास, शिक्षा और विश्वास की नई रोशनी दिखाई दे रही है। यह उपलब्धि केवल पुलिस या सरकार की सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र और जनविश्वास की विजय है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन, डीजीपी कैलाश मकवाणा के कुशल नेतृत्व और हॉक फोर्स के जवानों के अदम्य साहस ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक सोच और जमीनी कार्रवाई एक साथ हों, तो सबसे कठिन आंतरिक चुनौती पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)



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