पहले घोड़े और खच्चरों पर सामान लाद चीन पहुंचाया जाता था लेकिन इस बार ये व्यापार ट्रकों से होगा।
भारत-चीन सीमा पर 2020 के गलवान संघर्ष के बाद बंद हुआ लिपुलेख व्यापार मार्ग अब फिर खुलने जा रहा है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से 300 व्यापारियों की सूची विदेश मंत्रालय को भेजी गई है। बिना वीजा-पासपोर्ट के ट्रेड पास के जरिए व्यापारी तिब्बत के तकलाकोट बाजा
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सदियों पुराने इस व्यापारिक रास्ते का इतिहास सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि हिमालयी सभ्यताओं के रिश्तों से भी जुड़ा है। कभी तिब्बती व्यापारी याक और भेड़ों के काफिलों के साथ नमक, ऊन और बोरेक्स लेकर भारत आते थे, जबकि भारतीय व्यापारी कपड़ा, अनाज और मसाले तिब्बत ले जाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह सिलसिला लंबे समय तक बंद रहा, फिर 1991 में दोबारा शुरू हुआ और अब गलवान तनाव के बाद फिर पटरी पर लौट रहा है।
इस बार व्यापार खुलने का असर सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं माना जा रहा। आदि कैलाश यात्रा से पहले ही सीमांत इलाकों की अर्थव्यवस्था में हलचल बढ़ी है, अब व्यापार शुरू होने से ब्यास, दारमा और चौंदास घाटी के लोगों को रोजगार और आय की नई उम्मीद दिख रही है। भारत और चीन के बीच रिश्तों में हाल के कूटनीतिक प्रयासों के बीच इसे भरोसे और संवाद बहाली के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि लिपुलेख क्षेत्र को लेकर नेपाल की आपत्तियां और पुराना सीमा विवाद अब भी इस पूरे इलाके को रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बनाए हुए हैं।
चीन का तकलाकोट शहर जिसे बुरंग टाउन भी कहा जाता है, हमेशा से भारतीय व्यापारी चीन में पहुंचकर इसी शहर में अपनी दुकाने लगाते रहे हैं।
जून के पहले हफ्ते में शुरू हो सकता है व्यापार
विदेश मंत्रालय और चीनी प्रशासन की सहमति के बाद व्यापारियों का पहला काफिला जून के पहले या दूसरे सप्ताह में रवाना हो सकता है। परंपरागत तौर पर यह व्यापार हर साल जून से सितंबर तक सीमित अवधि के लिए संचालित होता रहा है।
विदेश मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद पंजीकरण प्रक्रिया शुरू होगी। व्यापारियों को निवास प्रमाण पत्र और पहचान संबंधी दस्तावेज जमा करने होंगे। हर व्यापारी के साथ एक सहायक को भी जाने की अनुमति मिलेगी, जिसके लिए अलग बॉर्डर ट्रेड पास जारी किया जाएगा।
व्यापार संचालन के लिए गुंजी में अस्थायी ट्रेड कार्यालय, कस्टम चौकी और बैंकिंग सुविधा विकसित की जा रही है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, संचार, परिवहन और चिकित्सा सेवाओं की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन का कहना है कि सीमा व्यापार शुरू होने से पहले सभी जरूरी व्यवस्थाएं पूरी कर ली जाएंगी।

पहली बार सड़क आधारित मॉडल में बदलेगा व्यापार
अब तक लिपुलेख दर्रे से होने वाला कारोबार पूरी तरह पारंपरिक ढुलाई व्यवस्था पर निर्भर था। व्यापारी धारचूला से गुंजी, कालापानी और नाभीढांग होते हुए कई दिन की कठिन यात्रा कर दर्रे तक पहुंचते थे। सामान घोड़े-खच्चरों, याक और पोर्टरों के जरिए ढोया जाता था। खराब मौसम और भूस्खलन कई बार व्यापार रोक देते थे।
कुमाऊं यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता सुमन जोशी के मुताबिक पहले सीमांत समुदाय नेपाल से चावल, जौ और गेहूं लेकर तिब्बत की ग्यानिमा और गरहाटोक मंडियों तक पहुंचते थे, जहां बदले में नमक और बोरेक्स लिया जाता था। कई जगह एक नाली चावल के बदले पांच नाली नमक तक का विनिमय होता था।
अब सड़क बनने के बाद करीब 100 किलोमीटर तक वाहन सीधे सीमा के करीब पहुंच सकेंगे। सिर्फ अंतिम करीब 200 मीटर तक ही सामान पारंपरिक तरीके से ले जाया जाएगा। इसके बाद चीन क्षेत्र में सड़क मार्ग उपलब्ध रहेगा, जहां से व्यापारी करीब 18 किलोमीटर दूर तकलाकोट मंडी पहुंचेंगे।

तकलाकोट की नई मंडी में मिलेंगी दुकानें
करीब 7 साल तक व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट की पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई थीं। अब भारतीय और नेपाली व्यापारियों के लिए नई ट्रेड मंडी विकसित की गई है। इसी नई मंडी में भारतीय व्यापारियों को दुकानें दी जाएंगी।
व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए और बेहतर लॉजिस्टिक सुविधा की भी मांग की गई है। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि सड़क और आधुनिक सुविधाओं के कारण आने वाले वर्षों में कारोबार का दायरा और बढ़ सकता है।

तिब्बत में बनी यही वो नई मंडी है जो भारतीय और नेपाली कारोबारियों के लिए बनाई गई है।
2019 में करोड़ों का कारोबार, अब बढ़ने की उम्मीद
2019 में इस मार्ग से करीब तीन करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था, जिसमें लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और 1.90 करोड़ रुपये का आयात शामिल था।
अब सड़क और आधुनिक सुविधाओं के साथ व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, ऐसे में इस आंकड़े के काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। व्यापार बंद होने के कारण कई भारतीय व्यापारी अपना सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़ आए थे। पिछले छह साल से करीब 45 व्यापारियों का एक करोड़ रुपये से ज्यादा का सामान वहां फंसा हुआ है।
अब व्यापार शुरू होने से इन व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अपना सामान वापस ला सकेंगे या उसे बेच सकेंगे।
सदियों से व्यापार, संस्कृति और भरोसे का रास्ता रहा लिपुलेख
लिपुलेख दर्रा सिर्फ सीमा कारोबार का रास्ता नहीं, बल्कि सदियों से भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है। सीमांत क्षेत्रों में लंबे समय तक वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित व्यापार चलता था।
ब्रिटिश अधिकारी और लेखक सर फ्रांसिस एडवर्ड यंगहसबैंड ने अपनी किताब ‘इंडिया एंड तिब्बत’ में हिमालयी व्यापारिक रास्तों को भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क का माध्यम बताया था। इन रास्तों से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि परंपराएं, भाषाएं और सीमांत समाजों के रिश्ते भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते थे।
तिब्बत के साथ यह संपर्क सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं था। सीमांत इलाकों के मेले, धार्मिक यात्राएं और कारोबारी काफिले भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक संबंधों का भी आधार बने हुए थे। जौलजीबी जैसे मेले लंबे समय तक त्रिपक्षीय व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचाने जाते रहे।

भौटिया या रं समुदाय के पुरुष तिब्बत से व्यापर के लिए पहले साल में दो बार यात्रा करते थे जबकि महिलाएं घरों में रहकर ऊनी वस्त्र बनाती थीं।
कौन हैं रं समुदाय, जिन्होंने जिंदा रखा हिमालयी व्यापार
लिपुलेख दर्रे से होने वाले पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है। यह समुदाय मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की ब्यास, दारमा और चौंदास घाटियों में निवास करता है। रं समाज को भोटिया या शौका समुदाय का हिस्सा भी माना जाता है।
सदियों तक यही समुदाय दुर्गम हिमालयी रास्तों में भारत-तिब्बत व्यापार को जिंदा रखे हुए था। इनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में तिब्बती संस्कृति की झलक दिखाई देती है। यह समुदाय अपनी ऊनी बुनाई, लोक संस्कृति और सीमांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में भोटिया जनजाति की आबादी 39 हजार से ज्यादा थी।

भौटिया जनजाती एक समय पर अपने व्यापार के कारण इतनी समृद्ध हो गई थी 11वीं से 19वीं सदी के बीच चंद राजाओं ने उनसे कर वसूलना शुरू कर दिया जिसे ‘कुकरेलू कर’ कहा गया।
व्यापार से पहले पी जाती थी शराब
सुमन जोशी की एक सोध के अनुसार ऊंचे इलाकों में बर्फबारी होने पर कई भोटिया परिवार सर्दियों में नेपाल के निचले इलाकों में अस्थायी घर बनाकर रहते थे, जबकि गर्मियों में व्यापारिक काफिलों के साथ तिब्बत की मंडियों तक पहुंचते थे। नेपाल और तिब्बत के बीच यही सीमांत समुदाय कारोबारी पुल की तरह काम करता था।
व्यापार शुरू करने से पहले भारतीय व्यापारियों और तिब्बती कारोबारियों के बीच ‘Share Chu-Dul Chyu’ नाम की मित्रता रस्म निभाई जाती थी। दोनों पक्ष चांदी के पात्र में शराब पीते, घी, सत्तू, ऊन और सोने को छूकर भरोसे का प्रतीक मानते थे। दोस्ती के प्रमाण के तौर पर पत्थर के टुकड़े तक संभालकर रखे जाते थे।
सीमांत बाजारों से मैदानों तक पहुंचता था सामान
ब्रिटिश दौर में जौलजीबी, झूलाघाट और धारचूला जैसे सीमांत कस्बे भारत-नेपाल-तिब्बत व्यापार के प्रमुख केंद्र माने जाते थे। व्यापारी घी, शहद, गुड़, नमक, ऊन, कालीन, जड़ी-बूटियां और पशु उत्पाद लेकर इन मंडियों तक पहुंचते थे। कई व्यापारी यहां से सामान लेकर टनकपुर, हल्द्वानी और काठगोदाम की मंडियों तक जाते थे।
नेपाल से आने वाले लोग 10 से 15 दिन तक पैदल सफर कर झूलाघाट पहुंचते थे। उस दौर में नेपाल से घी, शहद और खुकरी आती थी, जबकि भारत से कपड़ा, नमक, चीनी और दूसरी जरूरी वस्तुएं वहां भेजी जाती थीं। जौलजीबी मेला लंबे समय तक भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच पारंपरिक व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता रहा।

उत्तराखंड में सिर्फ भोटिया समाज ही तिब्बत से व्यापार करता था, कई इतिहासकार मानते हैं कि भोटिया किसी दूसरे समाज को इस रूट पर व्यापार नहीं करने देते थे।
व्यापार खुलने से सीमांत इलाकों में बढ़ी नई उम्मीद
लंबे समय तक सीमा कारोबार बंद रहने से धारचूला, गुंजी और आसपास के सीमांत इलाकों की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। स्थानीय दुकानदारों, ट्रांसपोर्ट कारोबारियों, पोर्टरों और घोड़े-खच्चर संचालकों पर इसका सीधा असर पड़ा था। अब व्यापार फिर शुरू होने की खबर के बाद सीमांत क्षेत्रों में हलचल बढ़ने लगी है।
स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि आदि कैलाश यात्रा और सीमा व्यापार के साथ रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। व्यापार समिति का कहना है कि सड़क और आधुनिक परिवहन व्यवस्था के कारण युवा व्यापारी भी अब इस कारोबार में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यदि बैंकिंग, मुद्रा विनिमय और परिवहन व्यवस्था मजबूत हुई तो यह कारोबार सीमांत अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सहारा बन सकता है।
नेपाल की आपत्ति से फिर चर्चा में आया सीमा विवाद
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर नेपाल पहले भी आपत्ति जता चुका है। 2019 में भारत सरकार के नए नक्शे के बाद नेपाल ने भी नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें उसने इस पूरे क्षेत्र पर दावा किया था। बाद में नेपाल संसद ने भी इसे मंजूरी दे दी थी।
नेपाल का दावा है कि यह इलाका उसका हिस्सा है, जबकि भारत सिगौली संधि के आधार पर इसे अपना क्षेत्र मानता है। यही वजह है कि भारत-चीन व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ा यह पूरा इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

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4 जुलाई से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होने वाली है, तय रूट के अनुसार उत्तराखंड से जो यात्री कैलाश की तरफ जाएंगे वो लिपुलेख दर्रे से गुजरेंगे, लेकिन नेपाल सरकार ने हाल में ही एक बार फिर लिपुलेख दर्रे पर अपना दावा कर यात्रियों से अपील करते हुए कहा है कि इस रास्ते यात्रा ना करें। (पढ़ें पूरी खबर)



