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Finance Ministry: ‘ग्राउंड जीरो’ पर जाएंगे अधिकारी, पश्चिम एशिया संकट के बीच देश में उद्योगों की टटोलेंगे नब्ज


देश के इतिहास में पहली बार, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने आर्थिक नीतियां बनाने और आगामी बजट की तैयारियों के लिए एक देशव्यापी अभियान शुरू किया है। इसके तहत मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी अब सीधे विनिर्माण इकाइयों (मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स) और इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स (औद्योगिक क्षेत्रों) का दौरा करेंगे। इसका मुख्य मकसद उद्योग जगत से सीधे फीडबैक लेना और पश्चिम एशिया संकट के कारण पैदा हो रही चुनौतियों से निपटने के लिए जमीनी हकीकत को समझना है। 

वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) की ओर से शुरू की गई इस पहल के तहत अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव या निदेशक स्तर के अधिकारियों के नेतृत्व में अधिकतम पांच सदस्यों वाली टीमें बनाई जाएंगी। ये टीमें अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में दो से तीन दिन का दौरा करेंगी। इन दौरों में बड़े, मझोले और छोटे कारखानों के अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार और रिसर्च से जुड़े क्षेत्रों को भी कवर किया जाएगा। इसके साथ ही दिशा-निर्देशों के अनुसार हर दौरे में कम से कम दो स्टार्टअप्स से मुलाकात करना भी अनिवार्य होगा। उद्योग संस्था ‘भारतीय उद्योग परिसंघ’ (सीआईआई) को इन मुलाकातों को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि कंपनियां बेझिझक अधिकारियों से अपनी नीतियां और समस्याएं साझा कर सकें।

पश्चिम एशिया संकट के बीच बढ़ी हैं उद्योग जगत की चिंताएं

इस कदम की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा संकट ने उद्योगों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कमजोर होता रुपया, बढ़ता चालू खाता घाटा (सीएडी) और सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों ने आयात पर निर्भर कारोबारों की लागत को काफी बढ़ा दिया है। इसके अलावा, मजबूत सार्वजनिक पूंजीगत व्यय के बावजूद, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत में निजी निवेश की स्थिति अभी भी असमान बनी हुई है। ऐसे में सरकार केवल व्यापक (मैक्रो-लेवल) विश्लेषण पर निर्भर रहने के बजाय सीधे फील्ड से एकदम सटीक और बारीक जानकारी जुटाना चाहती है।

17 अप्रैल 2026 को जारी एक आधिकारिक आदेश के मुताबिक, इन यात्राओं का मुख्य फोकस उन दिक्कतों को समझना होगा जिनका सामना व्यवसाय रोजमर्रा के काम में कर रहे हैं। इन समस्याओं में बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) की कमी, नियमों की अड़चनें, लोन या फाइनेंस मिलने की समस्या, कुशल कर्मचारियों (स्किलिंग) की कमी और नई तकनीक अपनाने में आने वाली चुनौतियां प्रमुख रूप से शामिल हैं। 

10 दिनों के भीतर अधिकारियों को सौंपनी होगी रिपोर्ट

दौरा खत्म होने के ठीक 10 दिनों के भीतर इन अधिकारियों को आर्थिक मामलों के सचिव को अपनी विस्तृत सेक्टोरल रिपोर्ट सौंपनी होगी। यह पूरी कवायद इसलिए की जा रही है ताकि जमीनी हकीकत और नीति-निर्माण के बीच एक सीधा और मजबूत संपर्क (फीडबैक लूप) स्थापित हो सके। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य के नीतिगत फैसले और आने वाले केंद्रीय बजट के प्रस्ताव ज्यादा सटीक हों और वे सीधे तौर पर उद्योगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सकें।



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