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बदलती यील्ड का खेल: डेट फंड की गिरती एनएवी का सच जानिए, बाजार के इस चक्रव्यूह में छुपा है कमाई का मौका!


नोएडा के आरजी रेजीडेंसी में रहने वाले दिव्यांशु ने जब अपनी गाढ़ी कमाई को पूरी तरह सुरक्षित मानकर लंबी अवधि के डेट फंड में लगाया, तो उन्हें उम्मीद थी कि फिक्स्ड डिपॉजिट से थोड़ा बेहतर और स्थिर रिटर्न मिलेगा। पिछले हफ्ते जब उन्होंने अपना पोर्टफोलियो स्टेटमेंट खोला, तो उनकी आंखें फटी रह गईं- फंड की एनएवी बढ़ने के बजाय नीचे गिर रही थी। जिस निवेश को उन्होंने पूंजी की सुरक्षा का सबसे मजबूत किला माना था, वहां नुकसान दिखाई दे रहा था।

आखिर इस सुरक्षित किले में यह सेंध कैसे लगी? इस नुकसान के पीछे आपके म्यूचुअल फंड या स्कीम की कोई खराबी नहीं है, बल्कि इसके पीछे काम कर रहा है बॉन्ड बाजार का वह चक्रव्यूह, जिसे हम बदलती ब्याज दरों का माहौल कहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यही माहौल जहां कुछ निवेशकों के लिए थोड़ी चिंता लेकर आया है, वहीं समझदार और दूरदर्शी निवेशकों के लिए यह आने वाले भविष्य की मजबूत और संतुलित संपत्ति निर्माण की एक बड़ी नींव भी बन सकता है।

क्या है एनएवी गिरने की वजह?

ब्याज दरों और पुराने बॉन्ड की कीमतों में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा होता है। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बाजार में मौजूद पुराने बॉन्ड की कीमतें नीचे गिर जाती हैं। इसका सीधा कारण है कि नए निवेशकों को बाजार में अधिक ब्याज देने वाले नए बॉन्ड आसानी से उपलब्ध होते हैं। ऐसे में कम ब्याज देने वाले पुराने बॉन्ड कोई क्यों खरीदेगा?

इसी वजह से, पुराने बॉन्ड की मांग कम हो जाती है और वे कम आकर्षक लगने लगते हैं। चूंकि सभी डेट म्यूचुअल फंड अपने पोर्टफोलियो में मौजूद इन बॉन्डों का रोजाना के बाजार भाव पर मूल्यांकन करते हैं, इसलिए बॉन्ड की कीमतों में आने वाली इस गिरावट का सीधा असर फंड की एनएवी पर पड़ता है। वित्तीय भाषा में इसे मार्क-टू-मार्केट प्रभाव कहते हैं।

पिछले कुछ महीनों में रुपये की कमजोरी, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार निकासी ने वित्तीय बाजारों पर दबाव बहुत बढ़ा दिया है। इसी का नतीजा है कि भारत में 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड अब 7 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुकी है, जिससे लंबी अवधि वाले डेट फंडों की एनएवी पर दबाव साफ दिख रहा है।

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तो अब क्या हो रणनीति?

अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि आपको डेट फंड में निवेश करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि आपको कहां और किस रणनीति के साथ अपना पैसा लगाना चाहिए। अगर आप अपनी समय सीमा और लक्ष्यों को बांट लेते हैं, तो यह बाजार आपके लिए बेहद सहज हो जाएगा।

अगर निवेश लक्ष्य बहुत छोटा है, तो इस समय लंबी अवधि वाले डेट फंडों से दूरी बना लेना ही समझदारी है। आपको शॉर्ट ड्यूरेशन श्रेणी, जैसे-मनी मार्केट फंड, अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फंड और लो ड्यूरेशन फंड्स पर ध्यान देना चाहिए। ये फंड बहुत ही कम अवधि की मैच्योरिटी वाली सरकारी और कॉरपोरेट  बॉन्ड में निवेश करते हैं। कम मैच्योरिटी के कारण इन पर ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव का असर न के बराबर पड़ता है। 

 

लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यहां एक बड़ा अवसर छिपा हुआ है। अगर लक्ष्य 15-20 साल का है, तो लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड या राज्य सरकारों के बॉन्ड आपके लिए बेहतर हैं। आज आपको बाजार में उपलब्ध इस ऊंची यील्ड को अगले दो दशकों के लिए हमेशा के लिए लॉक करने का एक ऐतिहासिक मौका मिल रहा है। भविष्य में जब भी आर्थिक चक्र बदलेगा और ब्याज दरों में गिरावट आएगी, तब इन बॉन्डों की कीमतों में भारी उछाल आएगा।



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