आईडीबीआई बैंक का विनिवेश अब अंतिम चरण में है। सरकार और एलआईसी बैंक में 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेच रहे हैं। कनाडाई निवेश कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंसियल होल्डिंग्स यह सौदा कर रही है।
द बोनस की एक रिपोर्ट के अनुसार यह सौदा लगभग 53,000 करोड़ रुपये का है। प्रति शेयर कीमत करीब 81 रुपये तय की गई है। यह भारतीय बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े विदेशी निवेशों में से एक है। आईडीबीआई बैंक की शुरुआत 1964 में एक विकास वित्तीय संस्था के रूप में हुई थी। यह 2004 में एक वाणिज्यिक बैंक बना, पर 2010 के बाद खराब ऋण संकट में फंसा। वर्ष 2018 में इसका सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) 28 फीसदी तक पहुंच गया था।
एलआईसी ने 2019 में 51 फीसदी नियंत्रक हिस्सेदारी लेकर बैंक को बचाया। बैंक की वित्तीय स्थिति में अब बड़ा सुधार हुआ है। वित्तीय वर्ष 2026 में शुद्ध लाभ 9513 करोड़ रुपये रहा, जो 2025 से 27 फीसदी अधिक है। सकल एनपीए घटकर 2.32 फीसदी और शुद्ध एनपीए 0.15 फीसदी पर आ गया है।
विनिवेश की प्रक्रिया कब शुरू हुई और कब अटकी?
मंत्रिमंडल ने मई 2021 में विनिवेश को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी। अक्तूबर 2022 में सरकार और एलआईसी ने रुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित की। मार्च 2026 में कम बोलियों के कारण यह सौदा अटक गया था। जुलाई 2026 में फेयरफैक्स के संशोधित प्रस्ताव के बाद सौदा फिर सक्रिय हुआ।
सरकार और निवेशक के लिए यह सौदा क्यों महत्वपूर्ण है?
सरकार को इस विनिवेश से करीब 26,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा। यह बैंकिंग क्षेत्र में सुधार का संकेत भी देता है। सरकार अब स्थायी मालिक नहीं रहना चाहती है। फेयरफैक्स को एक बड़ा बैंकिंग मंच, स्वच्छ परिसंपत्ति गुणवत्ता और मजबूत पूंजी आधार मिलेगा। बाजार अभी भी सौदे के अंतिम समापन और नई प्रबंधन योजनाओं पर नजर रखेगा।



