आयकर विभाग ने क्रिप्टो परिसंपत्तियों की निगरानी के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य डिजिटल एसेट्स से जुड़े लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ाना और टैक्स चोरी पर रोक लगाना है। अब एक्सचेंजों को हर वित्त वर्ष के बाद फॉर्म 167 के माध्यम से ग्राहकों के क्रिप्टो लेनदेन की रिपोर्ट आयकर विभाग को देनी होगी। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, क्रिप्टो एक्सचेंजों को अब वित्तीय संस्थानों की तरह सख्त नियमों का पालन करना होगा। उनके लिए ग्राहकों का केवाईसी सत्यापन, उनके टैक्स रेजीडेंसी की जानकारी और सभी लेनदेन का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। आयकर विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि क्रिप्टो पर टैक्स नियम लागू होने का अर्थ यह नहीं है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी को पूरी तरह कानूनी मान्यता मिल गई है।
विदेशी लेनदेन पर भी नजर
नए दिशा-निर्देशों के तहत केवल क्रिप्टोकरेंसी ही नहीं, बल्कि ब्लॉकचेन एनएफटी व कई अन्य डिजिटल एसेट्स भी रिपोर्टिंग के दायरे में शामिल होंगे। सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को इन नियमों से बाहर रखा गया है। सरकार ने यह व्यवस्था ओईसीडी के क्रिप्टो-एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क के अनुरूप तैयार की है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच क्रिप्टो निवेश से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान बनाना है।
जीई फसलों को अपनाने में तेजी लाने की मांग, गोलमेज सम्मेलन में उठा मुद्दा
कृषि मंत्रालय की तरफ से आयोजित एक उच्च स्तरीय गोलमेज सम्मेलन में भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) और जीनोम-संपादित (जीई) फसलों को सुरक्षित रूप से अपनाने में तेजी लाने के लिए विज्ञान-आधारित नियामक सुधारों की मांग की गई है। रविवार को जारी बयान के अनुसार, दिल्ली में विशेषज्ञों के बीच मंथन हुआ। ‘जीएम और जीई फसल पौधों के नियमों और अनुमोदन में सुधार’ विषय पर कृषि विज्ञान संवर्धन ट्रस्ट (टीएएएस) ने गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया था। इसका मकसद राष्ट्रीय जरूरतों के लिए लक्षित आनुवंशिक रूप से विकसित फसलों (जीएम और जीई) के कुशल अनुमोदन के लिए रोडमैप तैयार करना है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान विज्ञान-आधारित, पारदर्शी, कुशल और जोखिम-अनुरूप नियामक ढांचे की मांग की गई, जिसमें सुव्यवस्थित और समयबद्ध अनुमोदन प्रक्रियाएं हों और जो सार्वजनिक और निजी दोनों नवोन्मेषकों के लिए सुलभ हों। बयान में इस बात पर भी जोर दिया गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन, उत्पादकता, पोषण सुरक्षा, किसानों की आय और भारतीय कृषि की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए सुरक्षित जीएम और जीई फसलों को समय पर अपनाना महत्वपूर्ण है। प्रतिभागियों ने कहा कि यद्यपि भारत ने जैव सुरक्षा विनियमन में तीन दशकों से अधिक का अनुभव और मजबूत वैज्ञानिक क्षमताएं विकसित कर ली हैं, फिर भी जैव प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से जीनोम संपादन में हो रही प्रगति के साथ तालमेल बिठाने के लिए नियामक ढांचे को विकसित करना आवश्यक है। साथ ही जैव सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के उच्चतम मानकों को बनाए रखना भी जरूरी है। इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, कृषि वैज्ञानिकों, नियामकों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों सहित 80 से अधिक प्रतिभागियों ने भारत के कृषि जैव प्रौद्योगिकी नियामक ढांचे के आधुनिकीकरण पर विचार-विमर्श करने के लिए भाग लिया।



