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बिहार के गया शहर की पहचान सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत से नहीं, बल्कि यहां मौजूद ऐतिहासिक हवेलियों और पुरानी इमारतों से भी होती है. तेल बिगहा रंग बहादुर रोड स्थित करीब 100 साल पुरानी बबुआ जी की हवेली आज भी अपने भव्य वास्तुशिल्प और इतिहास की कहानी बयां करती है. कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह उर्फ बबुआ जी के नाम से प्रसिद्ध इस हवेली का निर्माण करीब 1930 में हुआ था और इसे तैयार होने में लगभग 5 साल लगे थे. कभी सामाजिक, वैचारिक और सांगठनिक गतिविधियों का केंद्र रही यह हवेली आज भी गया की समृद्ध विरासत और बीते दौर की स्थापत्य कला की याद दिलाती है.
बिहार के ऐतिहासिक शहर गयाजी की पहचान केवल धार्मिक और आध्यात्मिक नगरी के रूप में ही नहीं है, बल्कि यहां अनेक पुरानी हवेलियां, भवन और सांस्कृतिक धरोहरें भी मौजूद हैं. इन्हीं में से एक चर्चित नाम बबुआ जी की हवेली का है. यह हवेली गया शहर के तेल बिगहा रंग बहादुर रोड में स्थित है. यह हवेली वर्षों से अपनी भव्य वास्तुकला, पुराने वैभव और उससे जुड़ी लोककथाओं के कारण चर्चा का विषय रही है.
बबुआ जी की हवेली का निर्माण उस समय हुआ था, जब गया में बड़े जमींदार और प्रतिष्ठित परिवारों का सामाजिक प्रभाव काफी अधिक था. उस दौर में हवेली केवल रहने का स्थान नहीं होती थीं, बल्कि वह परिवार की प्रतिष्ठा, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती थी. कहा जाता है कि बबूआ जी (कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह) अपने समय के प्रभावशाली और सम्मानित व्यक्ति थे, जिनके नाम पर यह हवेली प्रसिद्ध हुई. माना जाता है बबूआ जी हवेली का निर्माण 1930 के आसपास पूरी हुई थी.
हवेली की वास्तुकला उस समय की पारंपरिक शैली को दर्शाती है. इसमें ऊंचे और मजबूत दरवाजे, विशाल आंगन, चौड़े बरामदे, मोटी दीवारें, सुंदर नक्काशी और बड़े-बड़े कमरे बनाए गए थे. गर्मी के मौसम में भी हवेली का वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा रहता था, जो उस समय की उत्कृष्ट निर्माण कला का उदाहरण माना जाता है. उन दिनों इस हवेली को लगभग 5 वर्षो में बनाया गया था और लगभग 1 लाख रुपये खर्च आए थे.
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बबुआ जी हवेली आज भी गया शहर में विरासत के रुप में खडा है. लगभग 100 वर्ष पूराने इस हवेली की देखरेख करने वाले राजेन्द्र सिंह बताते हैं कि बबुआ जी के दो पुत्र थे, वह भी गुजर गये हैं और उनके पोते हैं, लेकिन सभी अलग-अलग जगहो पर रहते हैं. हालांकि उनके पोते हर महीने यहां आते रहते है. संघ के लोगों की इस हवेली से पूराना नाता रहा है. संघ प्रमुख डाॅ. हेडगेवार, मोहन भागवत समेत कई संघ प्रमुख इस हवेली में आ चुके हैं.
उन्होंने बताया कि गया के लोकल कारीगरों द्वारा इस हवेली का निर्माण किया गया था. हवेली को बनाने में लगभग 5 साल लगे थे. उन दिनों मजदूरों को 4 आना और राजमिस्त्री को 8 आना मजदूरी दिया जाता था. 1930 में इस हवेली का गृह प्रवेश हुआ था. 1940 के बाद से यह हवेली गया की वैचारिक और सांगठनिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बन गई. 6 कट्ठा में बने इस विशाल कोठी में स्वतंत्रता संग्राम की रणनीतियां बनती थीं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता रहे कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह जिन्हें प्यार से बबुआ जी कहा जाता था. उनका गया के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जब बिहार आए थे, तब उनका संपर्क बबुआ जी से हुआ था. उन्हें डॉक्टर हेडगेवार साहब द्वारा ही गया का संघचालक नियुक्त किया गया था. 24 वर्ष की युवावस्था में वे संघ से जुड़े और फिर जीवन भर काम करते रहे. 2007 में बबुआ जी का निधन हो गया, लेकिन उनकी हवेली आज भी गया शहर में मौजूद है.



