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महंगाई की मार: यूरोप में गर्मी से 90 लाख टन अनाज का नुकसान, वैश्विक FPI 3.5 साल के उच्चतम स्तर पर; आगे क्या?


दुनिया में खाद्य कीमतों पर अब युद्ध के साथ मौसम का संकट भी भारी पड़ रहा है। यूरोप में जून की रिकॉर्ड गर्मी से गेहूं, जौ, मक्का और जई समेत करीब 90 लाख टन अनाज उत्पादन प्रभावित हुआ है।संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार जुलाई में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 131.1 अंक पर पहुंच गया, जो जनवरी 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। इसी बीच विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) ने चेताया है कि मजबूत होता अल नीनो 2027 के अंत तक कम से कम 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोगों को तीव्र खाद्य असुरक्षा की स्थिति में धकेल सकता है। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का आकलन है कि अगले साल यूरोप में खाद्य महंगाई पर मौसम का असर युद्ध से भी बड़ा हो सकता है।

जून 2026 पश्चिमी यूरोप का अब तक का सबसे गर्म जून रहा। फ्रांस में रिकॉर्ड तापमान दर्ज हुआ। जबकि जर्मनी, डेनमार्क और चेक गणराज्य में भी नए तापमान रिकॉर्ड बने। लगातार कई सप्ताह 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान ने फसलों को गंभीर नुकसान पहुंचाया। यूरोपीय अनाज व्यापारियों के संगठन कोसेराल ने यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के अनाज उत्पादन का अनुमान घटाकर 28.66 करोड़ टन कर दिया, जो उसके पिछले अनुमान से करीब 90 लाख टन कम है। ऊर्जा एवं जलवायु खुफिया इकाई के अनुसार गर्मी से करीब एक करोड़ टन की सकल फसल क्षति और लगभग दो अरब यूरो की कृषि आय का नुकसान हुआ है।


गेहूं-मक्का से चीनी तक सब महंगा

एफएओ के जुलाई सूचकांक में अनाज की कीमतें एक महीने में 3.4 प्रतिशत बढ़ीं। गेहूं की वैश्विक कीमत 5.8 प्रतिशत और मक्का की 3.6 प्रतिशत बढ़ी। रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण काला सागर से अनाज निर्यात में व्यवधान और निर्यात ढांचे पर हमलों ने गेहूं को महंगा किया। अमेरिका के कॉर्न बेल्ट में गर्म और शुष्क मौसम की आशंका ने मक्का की कीमत बढ़ाई। चीनी की कीमत में 5.6 प्रतिशत और वनस्पति तेल में दो प्रतिशत की वृद्धि हुई। एफएओ ने यूरोप में गर्म और शुष्क मौसम, ब्राजील में इथेनॉल नीति और मजबूत होते अल नीनो को कीमतों पर दबाव बढ़ाने वाले कारणों में शामिल किया है।

महंगे उर्वरक से संकट

ईरान संघर्ष ने खाद्य बाजार के दूसरे मोर्चे पर दबाव बढ़ाया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब एक चौथाई हिस्सा गुजरता है। वैश्विक उर्वरक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी इस मार्ग और आसपास के क्षेत्र से जुड़ा है। एफएओ के अनुसार संघर्ष के दौरान यूरिया की कीमत करीब 400 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 850 डॉलर से अधिक हो गई थी। बाद में इसमें गिरावट आई, लेकिन उर्वरक कीमतों का असर तत्काल नहीं बल्कि अगली बुआई और फसल में दिखाई देता है। महंगा उर्वरक 2027 के उत्पादन और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ा सकता है।



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