Homeट्रैवलराजस्थान में भी है केदारनाथ-बद्रीनाथ, मानसून में नजारा देख रह जाएंगे दंग

राजस्थान में भी है केदारनाथ-बद्रीनाथ, मानसून में नजारा देख रह जाएंगे दंग


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Mount Abu Monsoon Tourism: माउंट आबू सिर्फ ठंडी हवाओं और पर्यटन स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि मानसून में पहाड़ों के बीच छिपे प्राचीन मंदिरों, झरनों और प्राकृतिक कुंडों के लिए भी खास पहचान रखता है. आबूराज की अरावली पहाड़ियों में चंद्रकुंड, केदारनाथ-बद्रीनाथ मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर, गौमुख मंदिर और पांडव गुफा जैसे कई धार्मिक स्थल हैं. बारिश के दौरान यहां हरियाली, बादल और झरनों का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है. इनमें कई स्थानों तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग नहीं है और लंबी पहाड़ी पगडंडियों से पैदल ट्रैकिंग करनी पड़ती है.

हिल स्टेशन माउंट आबू के पहाड़ों के बीच बना प्राकृतिक कुंड चंद्रकुंड, मानसून में यहां की खास माहौल की वजह से पहचाना जाता है. झरनों, पहाड़ों और पगडंडियों के बीच होकर ट्रैकिंग करते हुए लोग इस जगह तक पहुंचते हैं. इस स्थान पर एक छोटा शिवलिंग भी विराजमान है, जो काफी पुराना माना जाता है. यहां कई भक्त शिवलिंग पर जल चढ़कर पूजा -अर्चना करते हैं. श्रावण में खास तौर पर भक्त यहां पहुंचते हैं. यहां पहुंचने के लिए गूगल मैप का सहारा नहीं लिया जा सकता है. इस वजह से जंगल में ट्रेकिंग के लिए गाइड साथ होना जरूरी है.

उत्तराखंड में बने केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर की तरह राजस्थान के आबूराज में दुर्गम पहाड़ी इलाके में बसे उतरज गांव के पास ही केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर है. श्रावण मास में यहां सबसे ज्यादा भक्त दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं. यहां पहुंचने के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं होने से गुरुशिखर से करीब 5 किलोमीटर पहाड़ी पगडंडी से पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है.

पैदल यात्रा के दौरान सबसे पहले केदारनाथ मंदिर आता है. इसके पास से ही गहरी खाई में विशाल झरना गिरता है. इसके बाद एक उतरज नाम का गांव आता है. यहां आज भी लोग पुराने जमाने की तरह कच्चे मकानों और शहरी शोर शराबे से दूर रहते हैं. इस गांव से होते हुए करीब 2 किलोमीटर पैदल चलकर आप बद्रीनारायण मंदिर यानी बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन कर सकते हैं. यहां रास्ते में कई झरने और बादलों के बीच पहाड़ों के सुंदर नजारे देखने को मिलते हैं.

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माउंट आबू की तलहटी में इसरा गांव के पास ही एक प्राचीन शिव मंदिर है. श्रावण मास और मानसून में यहां सबसे ज्यादा लोग दर्शन करने पहुंचते हैं, क्योंकि ये मंदिर अरावली की गोद में बना हुआ है. चारों तरफ हरियाली, पहाड़ और झरने के नजारे देखने को मिलते हैं. मान्यता है कि यहां 33 कोटि देवी देवताओं ने आबूराज की परिक्रमा के दौरान रात्रि विश्राम किया था.

आबूराज में महर्षि गुरू वशिष्ठ के आश्रम को वर्तमान में गौमुख मंदिर के नाम से पहचाना जाता है. ये एक मात्र मंदिर है, जहां पहुंचने के लिए आपको 750 सीढियां उतरना पड़ता है. यहां आने का सबसे सही समय बारिश का समय होता है. इस समय आसपास बादलों और झरनों के नजारे देखने को मिलते हैं. वहीं यहां की लंबी यात्रा करने के लिए बारिश का समय सही माना जाता है. मंदिर परिसर में बने एक प्राचीन कुंड में गाय के मार्बल के बने मुख से निरंतर जलधारा बहती है. मान्यता है कि ये स्थान सरस्वती नदी का उद्गम स्थान है.

आबुराज में देलवाड़ा क्षेत्र में जंगल और अरावली की पहाड़ियों के बीच बनी एक प्राचीन गुफा को पांडव गुफा के नाम से पहचाना जाता है. यहां ही मंदिर में 5 शिवलिंग विराजमान है. मान्यता है कि अज्ञातवास के से पांडवों ने यहां समय बिताया था और पांडव इन पांच शिवलिंग की एक साथ पूजा करते थे. बारिश के समय में यहां मंदिर परिसर से ही झरने बहते हैं. ये नजारा देखते ही बनता है.

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