बीएमआई के अनुमान के मुताबिक, रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण ऊर्जा की ऊंची कीमतें और वैश्विक अनिश्चितता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का करीब 90 फीसदी हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है। अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब चार फीसदी कमजोर हो चुका है।
महंगा कच्चा तेल रुपये का खेल कैसे बिगाड़ रहा?
अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत होगी। इससे घरेलू बाजार में डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये की कीमत घट सकती है। बीएमआई का मानना है कि ब्रेंट क्रूड में तेजी जारी रहने पर भारतीय मुद्रा पर दबाव और बढ़ सकता है।
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अल-नीनो और अमेरिकी टैरिफ से कितना बढ़ सकता है जोखिम?
मौसम से जुड़ा जोखिम भी रुपये के लिए चिंता बढ़ा सकता है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, सुपर अल-नीनो की संभावना करीब दो-तिहाई है। इससे कृषि निर्यात प्रभावित हो सकता है और खाद्य आयात की जरूरत बढ़ सकती है। हालांकि, भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार है। दूसरी ओर, रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका की ओर से 100 फीसदी तक टैरिफ लगाए जाने का खतरा भी बताया गया है। इससे भारतीय निर्यात और निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ सकता है।
सरकार के कदम रुपये को कितना संभाल सकते हैं?
बीएमआई के अनुसार, विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए सरकार की ओर से हाल में उठाए गए कदम रुपये की गिरावट को कुछ हद तक सीमित कर सकते हैं। हालांकि, वैश्विक बाजार में जोखिम बढ़ने और ऊर्जा कीमतों में तेजी की स्थिति बनी रही तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है। भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। रुपये की कमजोरी का असर आयात लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
सोमवार को रुपये की स्थिति क्या रही?
घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच रुपया सोमवार को 19 पैसे टूटकर 95.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.50 प्रति डॉलर पर खुला और कारोबार के दौरान 95.49 से 95.62 के दायरे में रहा। पिछले शुक्रवार को रुपया तीन पैसे मजबूत होकर 95.42 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। ऐसे में मौजूदा स्तर से 97 और फिर 99 तक जाने का अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आगे की चुनौती को दिखाता है।



