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ICRA Report: भारत के यूरिया क्षेत्र में 90,000 करोड़ रुपये का निवेश, आयात पर निर्भरता होगी कम


देश के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव दिख सकता है। कृषि में इस्तेमाल होने वाले   यूरिया से जुड़े सेक्टर में भारत निवेश के एक नए दौर के लिए तैयार है। इक्रा ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात कही है। रिपोर्ट के अनुसार, उर्वरक कंपनियां अगले छह महीनों में 80,000 से 90,000 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय कर सकती है है। ICRA ने कहा है कि निवेश की नई नीति क्षेत्र में क्षमता वृद्धि को बढ़ावा देगी। इससे 2030-31 तक यूरिया आयात पर देश की निर्भरता कम हो सकती है। 

रिपोर्ट के अनुसार, यूरिया-2026 के लिए नई निवेश नीति (NIPU-2026) के तहत आने वाले संयंत्रों को लगभग साढ़ तीन से चार वर्षों में चालू किए जाने की उम्मीद है। इन निवेशों से 2030-31 से घरेलू यूरिया आत्मनिर्भरता में काफी सुधार होगा। रेटिंग एजेंसी ने बताया कि भारत ने 2025-26 में अपनी यूरिया आवश्यकता का लगभग 27 फीसदी आयात किया था। घरेलू क्षमता 30.6 दस लाख टन प्रति वर्ष थी, जबकि मांग लगभग 39.9 दस लाख टन थी। 

नई नीति ने अधिसूचित प्राप्तियों को कम करके और वापसी सीमा को घटाकर परियोजना अर्थशास्त्र को सख्त कर दिया है। NIPU-2026 के तहत इक्विटी पर वापसी की सीमा 12-16 फीसदी तक सीमित कर दी गई है। यह पहले की NIP-2012 के तहत 12-20 फीसदी थी। ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख गिरीशकुमार कदम ने कहा कि इसके बावजूद, ऋण कवरेज और वापसी मेट्रिक्स परियोजना के प्रस्तावकों के लिए आरामदायक रहने की उम्मीद है।

क्या नई नीति से परियोजना अर्थशास्त्र प्रभावित होगा?

ICRA का अनुमान है कि निचली और ऊपरी प्राप्तियां NIP-2012 की तुलना में एक मानक 1.27-MMTPA इकाई के लिए EBITDA को 250-280 करोड़ रुपये तक कम कर सकती हैं। हालांकि, आठ साल की नीति अवधि में एक ग्रीनफील्ड परियोजना के लिए संचयी ऋण सेवा कवरेज अनुपात 1.26 गुना रहने की उम्मीद है। कदम ने बताया कि परियोजना लागत को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, संयंत्रों को 95 फीसदी से अधिक क्षमता उपयोग पर लगातार संचालित करना भी परियोजना के प्रस्तावकों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

किन संबद्ध क्षेत्रों को लाभ मिलेगा?

यह निवेश चक्र संबद्ध क्षेत्रों के लिए भी अवसर पैदा करेगा। प्रत्येक नया 1.27-MMTPA यूरिया संयंत्र लगभग 2.2 दस लाख मानक घन मीटर प्रति दिन गैस मांग बढ़ाएगा। इससे लगभग 0.6 दस लाख टन एलएनजी खपत भी बढ़ेगी। गैस पारेषण कंपनियां, गैस व्यापारी और एलएनजी टर्मिनल अधिक गतिविधि देख सकते हैं। ईपीसी ठेकेदार और महत्वपूर्ण उपकरण निर्माता भी लाभान्वित होंगे। इनमें उच्च दबाव प्रक्रिया पात्र, हीट एक्सचेंजर, रिएक्टर और अमोनिया कनवर्टर शामिल हैं।

क्या कोई प्रमुख जोखिम भी है?

ICRA ने आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता को एक प्रमुख जोखिम बताया है। उर्वरक क्षेत्र की खपत में आयातित एलएनजी की हिस्सेदारी 2020-21 में 64 फीसदी से बढ़कर 2025-26 में लगभग 85 फीसदी हो गई है। जैसे-जैसे नई यूरिया क्षमता चालू होगी, गैस सोर्सिंग अनुबंधों का विविधीकरण महत्वपूर्ण हो जाएगा।



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