इन्हें लाने का मुख्य मकसद क्या है?
आरबीआई का मानना है कि पॉलिमर नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक चलते हैं। विशेष रूप से छोटे मूल्यवर्ग के नोट, जिनका उपयोग सबसे अधिक होता है और जो जल्दी खराब हो जाते हैं, उनके लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। इससे नोटों की बार-बार छपाई और प्रतिस्थापन पर आने वाली लागत में भी कमी आने की संभावना है।
पॉलिमर नोटों में उन्नत सुरक्षा तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें पारदर्शी विंडो सहित कई आधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों की पहचान आसान होगी और जालसाजी पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
क्या पहले भी हुई थी प्लास्टिक के नोटों को लाने की कोशिश?
भारत में पॉलिमर नोट का विचार नया नहीं है। 2009 में इस दिशा में काम शुरू हुआ था। इसके बाद 2012 में 10 रुपये के एक अरब पॉलिमर नोटों का क्षेत्रीय परीक्षण करने की योजना बनाई गई। इसके लिए अलग-अलग भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों वाले पांच शहर चुने गए थे जिनमें कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर शामिल थे। उस समय भी मकसद कम मूल्यवर्ग के नोटों की उम्र बढ़ाना था।
2012 का परीक्षण क्यों आगे नहीं बढ़ पाया?
उस समय पॉलिमर नोटों को तेज गति से चलने वाली मशीनों में इस्तेमाल करने पर घर्षण और स्थैतिक बिजली की समस्या सामने आई। इससे नोट आपस में चिपकने लगे और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने की परेशानी हुई।
इसके अलावा उस समय पॉलिमर सामग्री का इस्तेमाल, उसकी स्याही के घिसने, अलग-अलग मौसम में प्रदर्शन और मशीनों के साथ अनुकूलता जैसी चुनौतियां भी सामने आईं।
पुरानी योजना के सामने और क्या दिक्कतें थीं?
उस समय पॉलिमर नोट बनाने की सामग्री चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से आयात की जाती थी। आयात से जुड़ी प्रक्रियाएं और सामग्री की कीमत भी चुनौती थीं। इसके अलावा कई वाणिज्यिक बैंकों ने अपने मौजूदा ढांचे को पॉलिमर नोटों के अनुरूप बदलने के लिए होने वाली अतिरिक्त पूंजीगत लागत को लेकर चिंता जताई थी।
2016 की नोटबंदी के बाद इस योजना की रफ्तार और प्रभावित हुई। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 में मुद्रा छपाई की लागत 7,965 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। इसके बाद पॉलिमर नोट से जुड़े प्रयोग आगे नहीं बढ़ सके।
इस बार पिछली समस्या से कैसे निपटा जा रहा है?
इस बार पॉलिमर सामग्री में एंटी-स्टैटिक कोटिंग का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य स्थैतिक बिजली की समस्या को कम करना है, ताकि नोट आपस में चिपकें नहीं और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने या मशीन के अटकने जैसी समस्या कम हो।
भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी टेंडर के अनुसार, ऐसी सामग्री मांगी गई है जिस पर आवश्यक अपारदर्शी परत के साथ एंटी-स्टैटिक कोटिंग हो और जो छपाई व स्याही के चिपकने के लिए उपयुक्त हो।



