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नैनीताल-मसूरी नहीं, इस बार घूमें देवलसारी, जहां घने देवदारों के बीच विराजते हैं महादेव


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Dehradun Tourist Spot: उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा देवलसरी प्रकृति और आस्था का ऐसा संगम है, जहां पहुंचकर आपको शहर की भागदौड़ काफी दूर लगने लगती है. यहां देवदार के घने जंगल, चहचहाते पक्षी और रंग-बिरंगी तितलियां इस जगह की खूबसूरती को और खास बना देते हैं. बर्ड वॉचिंग और बटरफ्लाई लवर्स के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है, वहीं एडवेंचर पसंद करने वाले लोग यहां से नाग टिब्बा की ट्रैकिंग भी शुरू करते हैं.

देवलसारी पक्षी प्रेमियों और तितली प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. यहां पक्षियों और तितलियों की 70 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती है. यह जगह प्रसिद्ध नाग टिब्बा ट्रेक के बेस कैंप के रूप में जानी जाती है.

देवलसरी को प्रकृति प्रेमियों, बर्ड वॉचर्स और बटरफ्लाई लवर्स के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं माना जाता है. इस सुरम्य घाटी में पक्षियों और तितलियों की सैकड़ों दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं. यहां साल भर देश-विदेश से पर्यावरण प्रेमी और शोधकर्ता तितलियों और पक्षियों की विविधता को देखने पहुंचते हैं. भोर के समय यहां गूंजती पक्षियों की चहचहाहट और देवदार के पेड़ों के बीच उड़ती रंग-बिरंगी तितलियां किसी का भी मन मोह लेने के लिए काफी हैं.

प्राकृतिक छटा के साथ-साथ देवलसरी एडवेंचर और ट्रैकिंग का भी एक प्रमुख केंद्र है. साहसिक पर्यटन के शौकीन ट्रेकर्स यहाँ से अपनी चढ़ाई शुरू करते हैं और जंगलों और मखमली बुग्यालों से होकर नाग टिब्बा की चोटी तक का सफर तय करते हैं. शांत माहौल के कारण कई लोग यहाँ कैंपिंग का आनंद लेने भी आते हैं.

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प्रकृति के इस अनूठे नजारे के साथ-साथ देवलसरी का पौराणिक और धार्मिक महत्व भी बहुत खास है. स्थानीय मान्यताओं और इतिहास के अनुसार, देवलसरी का नाम ही “देवल” यानी देवताओं के वास या मंदिर से जुड़ा है. इस घाटी के केंद्र में प्राचीन भगवान शिव का कोनेश्वर मंदिर स्थित है, जो यहां की अपार आस्था का केंद्र माना जाता ह यह मंदिर घने देवदार के जंगलों के बीचों-बीच स्थित है, जो इसके वातावरण को और भी रहस्यमयी और दिव्य बनाता है.

देलवसरी के निवासी दीपक पंवार ने बताया कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से इस मंदिर और क्षेत्र के बारे में कहानियां सुनी हैं. उन्होंने बताया कि जब भगवान शिव यहां आए थे तो उन्हें यह जगह काफी पसंद आई थी. इस जगह जौ के खेत हुआ करते थे. महादेव ने साधु का रूप धारण किया और यहां ग्रामीणों की परीक्षा लेने के लिए आ गए.

भगवान शिव ने साधु के रूप में एक किसान से गांव में थोड़ी सी जगह रहने के लिए मांगी. उसने मना कर दिया. इसके बाद उन्होंने कई लोगों से यहां रहने के लिए थोड़ी सी जगह मांगी तो ग्रामीणों की तरफ से उन्हें इनकार ही सुनने के लिए मिला. ग्रामीणों ने कहा कि यहां हमारे खेत है इसलिए हम आपके यहां रहने के लिए स्थान नहीं दे सकते हैं. इसके बाद भगवान शिव बहुत नाराज हुए और रातों-रात जहां जौ के खेत हुआ करते थे वहां देवदार के बड़े -बड़े पेड़ उग गए.

इसके बाद ग्रामीणों को पता चला तो उन्होंने यहां भगवान शिव का मंदिर स्थापित किया. इस कोणेश्वर मंदिर की स्थापत्य शैली और वातावरण भी अनूठा है.मंदिर के चारों ओर देवदार के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष इस तरह खड़े हैं मानो वे महादेव के प्रहरी हों.महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां भव्य धार्मिक मेलों और पूजा-अर्चना का आयोजन होता है जिसमें आसपास के गांवों से हजारों श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने आते हैं. यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है.

देहरादून से मसूरी होकर या सुवाखोली-धनौल्टी मार्ग से आसानी से देवलसरी पहुंचा जा सकता है. आप निजी वाहन, टैक्सी या बाइक से जा रहे हैं, तो सुवाखोली-थत्यूड़ मार्ग सबसे आसान और सुंदर नजारे देने वाला रास्ता है. देहरादून से थत्यूड़ के लिए सीधी उत्तराखंड परिवहन की स्थानीय बसें और टैक्स भी आसानी से मिल जाती हैं. थत्यूड़ पहुंचकर आप देवलसरी के लिए स्थानीय टैक्सी बुक कर सकते हैं. एक बार यहां की वादियों और महादेव के दर पर कदम रखने के बाद, यकीनन आपका दिल वापस लौटने का नहीं करेगा.

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