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अमेरिका में ब्याज बढ़ा, अब भारत की बारी: रुपया, शेयर बाजार और सोने पर असर; आपकी जेब पर भी पड़ेगी मार?


करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत पर बिल्कुल साफ दिखेगा। 

अमेरिकी दरें बढ़ने से डॉलर इंडेक्स मजबूत होकर एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसके दबाव में रुपया कमजोर होकर 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। रुपये की इस कमजोरी से आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा है।

विदेशी निवेशकों की निकासी

अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से वैश्विक निवेशक सुरक्षित अमेरिकी संपत्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली और तेज हो सकती है। इस साल अब तक एफपीआई भारतीय बाजार से 2.41 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाल चुके हैं। इस फैसले से सोने की चमक पर भी अल्पकालिक दबाव के आसार हैं। 

आपकी जेब पर क्या होगा असर?

बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाएगा, जिसके चलते वे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे। जिन लोगों के लोन फ्लोटिंग रेट पर हैं, उनकी मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के पास खर्च करने योग्य आय कम हो जाएगी। कर्ज लेने वालों के लिए जहां यह बुरी खबर होगी, वहीं बचत करने वाले सीनियर सिटीजन और निवेशकों को बैंक एफडी पर पहले से बेहतर ब्याज मिलना शुरू हो जाएगा।

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क्या आरबीआई बढ़ाएगा ब्याज दरें?

जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करता है, तो आरबीआई ब्याज दर के अंतर, पूंजी प्रवाह और मुद्रा बाजारों पर पड़ने वाले प्रभाव पर करीब से नजर रखता है। हालांकि, आरबीआई के नीतिगत फैसले घरेलू महंगाई, विकास और अन्य आर्थिक स्थितियों से भी तय होते हैं। घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है, ऐसे में आरबीआई को पूंजी की निकासी और मुद्रा की स्थिरता को लेकर अतिरिक्त बातों पर विचार करना पड़ सकता है।

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेस का मानना है कि देश में महंगाई के दबाव को देखते हुए अक्तूबर में होने वाली समीक्षा बैठक में आरबीआई 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। एचडीएफसी बैंक का मानना है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार कर सकता है ताकि यह पूरी तरह स्पष्ट हो सके कि महंगाई का दबाव कितना व्यापक और टिकाऊ है।



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