देश में बिजली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में दो वर्षों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। 2024 से 2026 की पहली छमाही के बीच भारत का बिजली उत्पादन करीब 4.8% बढ़ा। वित्त वर्ष 23-24 के 1,964 अरब यूनिट से बढ़कर यह वित्त वर्ष 25-26 की पहली छमाही में 2,059 अरब यूनिट पहुंच गया। मांग में 7% की बढ़ोतरी हुई। मांग का बड़ा हिस्सा सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से पूरा हुआ, जिससे बिजली क्षेत्र का कार्बन उत्सर्जन लगभग स्थिर रहा।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान भारत ने 77 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी और बढ़ी हुई बिजली मांग का 60% हिस्सा पूरा किया। पवन, परमाणु और जलविद्युत को मिलाकर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में कुल 70 टेरावाट घंटे की वृद्धि हुई। एजेंसी
उत्पादन और खपत पर एक नजर
| श्रेणी | वृद्धि/मांग |
|---|---|
| देश में अतिरिक्त बिजली की मांग | 63 टेरावाट घंटे |
| स्वच्छ ऊर्जा से पूरी हुई अतिरिक्त मांग | 63 टेरावाट घंटे |
| सौर ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि | 44 टेरावाट घंटे |
| पवन ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि | 13 टेरावाट घंटे |
| परमाणु ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि | 7 टेरावाट घंटे |
| जलविद्युत उत्पादन में वृद्धि | 8 टेरावाट घंटे |
| स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में कुल वृद्धि | 70 टेरावाट घंटे |
अन्य वजहों से 3.7% बढ़ा उत्सर्जन
बिजली क्षेत्र की तस्वीर कुल उत्सर्जन की कहानी से अलग है। 2026 की पहली छमाही में भारत का कुल सीओ2 उत्सर्जन साल-दर-साल 3.7% बढ़ा। इसकी प्रमुख वजह स्टील, सीमेंट और दूसरे क्षेत्रों से बढ़ता उत्सर्जन रहा। अकेले स्टील और सीमेंट क्षेत्र का उत्सर्जन आठ फीसदी बढ़ा और दोनों की कुल हिस्सेदारी भारत के सीओ उत्सर्जन में 23 फीसदी तक पहुंच गई।
गुजरात में जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी कमी और स्वच्छ बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी वृद्धि दर्ज हुई। महाराष्ट्र और तेलंगाना, जहां बिजली मांग में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। यहां स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन ने इस बढ़ोतरी को लगभग पूरा किया। स्वच्छ ऊर्जा की इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए देश के सामने ग्रिड को अपग्रेड करने, ऊर्जा भंडारण बढ़ाने की चुनौती है।



