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नई दिल्ली2 घंटे पहले
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दिल्ली पुलिस ने आशुतोष-सौरव को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर से हिरासत में लिया था। बुधवार को उन्हें रिहा कर दिया गया।
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को 7 दिन बाद दिल्ली की स्पेशल कोर्ट (SEM) से जमानत मिल गई है। उन्हें ₹50 हजार के बॉन्ड पर छोड़ा गया है।
दोनों को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। 8-10 CJP समर्थकों के साथ दोनों नेता तिरंगा लेकर वहां पहुंचे थे।
दरअसल, 12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी। इसके बावजूद 13 अक्टूबर को दोनों नेता तिरंगा लेकर वहां पहुंच गए। शांति नियम तोड़ने के आरोप में उन्हें 5 दिन के लिए जेल भेजा गया था।
फिर 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत 2 दिन और बढ़ा दी गई थी। इससे पहले बुधवार को ही दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि नेता पहले मजिस्ट्रेट का फैसला आने दें, फिर जरूरत पड़ने पर ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाएं।
हाईकोर्ट ने रिवीजन पिटीशन लगाने के लिए क्यों कहा?
कोर्ट ने कहा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का विकल्प है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आने की जरूरत क्यों पड़ी?
जब किसी आदेश को चुनौती देने के लिए कानून में अलग रास्ता है तो पहले उस रास्ते का इस्तेमाल करना चाहिए।
इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से मौजूदा याचिका वापस लेकर रिवीजन पिटीशन लगाने को कहा। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी याचिकाएं वापस ले लीं।
अनुच्छेद 226 और रिवीजन पिटीशन में फर्क
अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या किसी सरकारी अथॉरिटी ने गलत कानूनी कार्रवाई की है तो वह हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत याचिका लगा सकता है।
जबकि रिवीजन में निचली अदालत के आदेश को कानूनी आधार पर चुनौती देने का विकल्प होता है। इस मामले में निचली अदालत ने फैसला दिया था, इसलिए उसके रिवीजन की ही पिटीशन पहले दायर की जानी थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की 4 बातें
1. बॉन्ड तोड़ने पर सवाल उठाए: दोनों नेताओं (सौरव-आशुतोष) ने पहले शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया था, इसके बाद फिर ऐसी घटना हुई। अगर बॉन्ड तोड़ने की आशंका सच साबित हुई है, तो अधिकारियों का सख्त नियमों के तहत कार्रवाई करना गलत कैसे है?
2. बैरिकेड तोड़ने से शांति भंग होने का खतरा था: प्रदर्शनकारियों के साथ दूसरे लोग भी जुड़ सकते थे और माहौल बिगाड़ सकते थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति ली जा सकती थी, ताकि उपद्रव करने वालों को रोका जा सके।
3. ये जेन-जी नहीं हैं: कोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि एक की उम्र 27 साल और दूसरे की 31 साल है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की- ‘जेन-जी नहीं हैं।’ कोर्ट ने आगे पूछा कि वे कौन हैं, क्या करते हैं और जिस संगठन से जुड़े हैं, उसका उद्देश्य क्या है।
4. जंतर-मंतर पर क्यों गए: अगर जंतर-मंतर पर रोक थी तो वहां गए क्यों? आपने पहले बॉन्ड भरा था, लेकिन अब आप दोबारा उस जगह जाने की बात कर रहे हैं, जबकि जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए तय सूची से हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
यह सुनवाई जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद की अदालत में हुई। सौरव-आशुतोष की तरफ से एडवोकेट अभिक चिमनी ने दलीलें रखीं। दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और CGSC आशीष दीक्षित पेश हुए।

CJP फाउंडर अभिजीत दीपके ने आशुतोष रांका और सौरव दास के पेशी में जाने का वीडियो शेयर किया था।
सौरव-आशुतोष के खिलाफ दोनों केस क्राइम ब्रांच ट्रांसफर
दिल्ली पुलिस ने दोनों नेताओं से जुड़े जंतर-मंतर मामले को भी क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया है। इससे पहले कनॉट प्लेस में दर्ज केस क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था। अब दोनों मामलों की जांच क्राइम ब्रांच करेगी।
नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर 22 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। नेहा ने दिल्ली पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया है।
नेहा ने कोर्ट से नोटिस रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करने का निर्देश देने की मांग की है। उनके वकील के अनुरोध पर जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने सुनवाई टाल दी।
कॉकरोच पार्टी ने जंतर-मंतर पर 36 दिन प्रदर्शन किया था
कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जून से 25 जुलाई तक NEET पेपर लीक मामले में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए प्रदर्शन किया था। 36 दिन तक चले इस प्रदर्शन के दौरान एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे थे।
20 जुलाई को CJP ने संसद तक का मार्च भी किया था। 25 जुलाई को प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदर्शन खत्म हो गया था।
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