देश में कामकाज से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या आठ साल में दोगुनी होकर 20 करोड़ के पार पहुंच गई है। लेकिन उनकी जिंदगी आसान होने के बजाय और व्यस्त हो गई है। बाहर नौकरी और आजीविका की जिम्मेदारी तो बढ़ी, मगर घर और बच्चों की देखभाल में पुरुषों का हाथ बंटाने का दायरा नहीं बढ़ सका। नतीजा यह है कि महिलाओं पर दोहरा बोझ आ गया है। घर और बाहर के काम निपटाने के फेर में अब उन्हें आराम, नींद और खुद के लिए पुरुषों के मुकाबले हर दिन 70 मिनट कम समय मिल पा रहा है। खेती में महिलाओं के ज्यादा भागीदारी शहरी इलाकों के मुकाबले गांवों में कामकाजी महिलाओं की संख्या में बड़ा उछाल आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कामगारों की भागीदारी 23.7% से बढ़कर 44.9% हो गई है, जबकि शहरों में यह 18.2% से 25.9% पहुंची। गांवों में काम करने वाली 73.3% महिलाएं खेती-किसानी से जुड़ी हैं, जबकि इस क्षेत्र में पुरुषों की हिस्सेदारी 47.2% ही है। बिना वेतन वाले कामों में उछाल काम से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या तो बढ़ी, लेकिन इसमें बड़ा हिस्सा बिना वेतन या पारिवारिक कामकाज का है। बिना पगार वाले कामों में महिलाओं की संख्या 1.39 करोड़ से बढ़कर 5.60 करोड़ और परिवार के कामों में 2.88 करोड़ से 4.93 करोड़ पहुंच गई। वहीं, नियमित और सुरक्षित नौकरी के दायरे में महिलाओं का अनुपात 10.5% से घटकर 9.3% रह गया है। कमाई में बड़ा अंतर, पुरुषों से काफी कम मिलता है मेहनताना कामकाज में बराबरी की कोशिशों के बावजूद महिलाओं की कमाई पुरुषों के मुकाबले काफी कम है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 45% और शहरी क्षेत्रों में 61% वेतन ही मिल पाता है। इसके अलावा, 60% महिलाओं ने माना कि घर और बच्चों की जिम्मेदारी के चलते वे नियमित रोजगार से बाहर रहने को मजबूर हैं, जबकि पुरुषों में ऐसा कहने वाले महज 1% हैं।
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महिलाओं का रोजगार 8 साल में दोगुना हुआ: पर घरेलू काम नहीं बंटा; आराम के लिए पुरुषों से 70 मिनट कम मिले
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