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oi-Sumit Jha
Jharkhand American Bomb: झारखंड के पूर्वी सिंहभूम में सुवर्णरेखा नदी के किनारे मिले 227 किलो के अमेरिकी बम ने सनसनी फैला दी है। ‘AN-M64’ मॉडल का यह शक्तिशाली विस्फोटक दूसरे विश्व युद्ध के दौर का बताया जा रहा है, जिस पर ‘मेड इन अमेरिका’ साफ लिखा है। स्थानीय पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने इसकी संहारक क्षमता को देखते हुए इसे छूने से मना कर दिया है और अब सेना की मदद ली जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया जब ईरान-इजराइल के बीच आधुनिक मिसाइल युद्ध देख रही है, तब जमीन के नीचे से निकले इस पुराने बम ने अतीत की भयावहता को फिर से जिंदा कर दिया है।

500 pound bomb Baharagora: आधुनिक युद्ध के बीच अतीत की आहट
आज दुनिया का ध्यान ईरान और इजराइल के बीच चल रहे आधुनिक मिसाइल और ड्रोन युद्ध पर टिका है, जहां पलक झपकते ही विनाश की खबरें आती हैं। ऐसे माहौल में झारखंड की सुवर्णरेखा नदी से दूसरे विश्व युद्ध का बम निकलना एक चौंकाने वाली घटना है। यह याद दिलाता है कि युद्ध चाहे आज का हो या 80 साल पुराना, उसके पीछे छूटे हथियार दशकों बाद भी मौत का सामान बनकर जमीन में दफन रहते हैं और कभी भी तबाही मचा सकते हैं।
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Iran War Update: क्या था AN-M64 बम का मकसद?
ईरान-इजराइल युद्ध में आज जिस तरह ‘सटीक हमलों’ (Precision Strikes) की बात होती है, दूसरे विश्व युद्ध में यह 500 पाउंड का ‘AN-M64’ बम भारी तबाही के लिए इस्तेमाल होता था। इसे अमेरिकी सेना पुलों, कारखानों और सैन्य ठिकानों को जमींदोज करने के लिए विमानों से गिराती थी। सुवर्णरेखा के पास मिला यह बम शायद उस वक्त किसी तकनीकी खराबी या नरम मिट्टी के कारण नहीं फट पाया, लेकिन इसकी मारक क्षमता आज भी किसी आधुनिक मिसाइल के वारहेड से कम नहीं है।
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इतिहास और वर्तमान का खतरनाक मेल
माना जा रहा है कि यह बम दशकों पहले महुलडांगरी के पास क्रैश हुए एक लड़ाकू विमान का हिस्सा है। एक तरफ दुनिया परमाणु युद्ध और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की चर्चा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत के एक शांत इलाके में खुदाई के दौरान निकला यह बम बताता है कि इतिहास के घाव कितनी गहराई तक दबे हो सकते हैं। यह खोज वैज्ञानिकों और सेना के लिए एक पहेली बन गई है कि इतने सालों बाद भी यह विस्फोटक कितना सक्रिय है।
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इजराइल-ईरान संघर्ष और बम का खौफ
सोशल मीडिया पर लोग इस बम की तुलना वर्तमान के वैश्विक तनाव से कर रहे हैं। जिस तरह इजराइल और ईरान के बीच हथियारों की होड़ मची है, झारखंड में मिला यह बम यह सबक देता है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी उसका खतरा खत्म नहीं होता। प्रशासन ने इलाके को सील कर दिया है क्योंकि 227 किलो का यह ‘अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस’ फटने पर कई सौ मीटर तक सब कुछ राख करने की ताकत रखता है, ठीक वैसे ही जैसे आज के आधुनिक बम।
सेना का ऑपरेशन और सुरक्षा की चुनौती
इस ‘अमेरिकी टाइम बम’ को निष्क्रिय करना बेहद जोखिम भरा है। स्थानीय प्रशासन ने कलाईकुंडा एयरबेस और सेना के विशेषज्ञों को पत्र लिखा है। जब दुनिया के एक कोने में नई मिसाइलें चल रही हैं, यहां हमारी सेना एक पुराने लेकिन जानलेवा दुश्मन (बम) को खत्म करने की तैयारी कर रही है। ग्रामीणों को सख्त हिदायत दी गई है कि वे इस ‘सोते हुए राक्षस’ से दूर रहें, क्योंकि इसमें भरी बारूद आज भी उतनी ही घातक हो सकती है जितनी 1940 के दशक में थी।
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