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oi-Siddharth Purohit
Explained: पश्चिमी एशिया इजरायल-अमेरिका और ईरान में चल रही जंग में अब ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी की हत्या ने इस जंग को एक नए और निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। यह घटना ऐसे समय हुई है जब इस्लामिक गणराज्य की राजनीतिक और सैन्य ताकत दोनों ही ही नेतृत्व के अभाव में चल रही है।
सत्ता भी खाली सुरक्षा भी खाली
सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या के लगभग तीन हफ्ते बाद लारीजानी की मौत हुई है। इससे तेहरान की सत्ता व्यवस्था और आने वाले समय की युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ईरानी सरकार ने पुष्टि की कि खामेनेई के बाद लारीजानी सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे जिनकी इस युद्ध में मौत हुई है। इस हमले में उनके बेटे और डिप्टी अलीरेजा बयात भी मारे गए।

कौन थे अली लारीजानी?
अली लारीजानी भले ही सीधे युद्ध में सैनिकों का नेतृत्व नहीं करते थे, लेकिन ईरान की राजनीति में उनका जबरदस्त प्रभाव था। वे सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव रह चुके थे और रणनीतिक फैसलों में उनकी अहम भूमिका थी।
IRGC से सिपाही से, मीडिया मैन और फिर रणनीतिकार तक
लगभग 5 दशकों तक उन्होंने ईरान की सत्ता के अलग-अलग हिस्सों में काम किया। 1980 के दशक में उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के दौरान IRGC में सेवा दी और बाद में मीडिया और सुरक्षा संस्थानों में भी अहम पद संभाले। वे राज्य प्रसारक के प्रमुख और लंबे समय तक संसद के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक गुटों के बीच संतुलन बनाकर अपनी ताकत बढ़ाई।
न्यूक्लियर डिप्लोमेसी में भूमिका
2000 के दशक में वे ईरान के मुख्य परमाणु वार्ताकार बने और पश्चिमी देशों के साथ सीधे बातचीत की। CNN ने उन्हें एक समझदार और कुशल वार्ताकार बताया था। लारीजानी को व्यावहारिक रूढ़िवादी माना जाता था। वे इस्लामिक सिस्टम के वफादार थे, लेकिन फैसलों में तकनीकी और रणनीतिक सोच अपनाते थे।
चीन और रूस के थे करीबी
हाल के सालों में उन्होंने चीन के साथ बड़ेे समझौतों में अहम भूमिका निभाई। साथ ही वे मॉस्को, बेरूत, अबू धाबी और ओमान जैसे देशों के दौरे पर गए और रिश्तों को बैलेंस किया। इस साल जनवरी में उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की और ओमान में हुई बातचीत के बाद ईरान की न्यूक्लियर शर्तें रखीं।
डी फैक्टो नेता बनकर उभरे
28 फरवरी को खामेनेई की मौत के बाद लारीजानी एक तरह से डी फैक्टो लीडर बनकर उभरे। कई एक्सपर्ट्स ने उन्हें युद्ध के शुरुआती दौर का असली नेतृत्वकर्ता माना। उन्होंने साफ कहा था कि ईरान एक लंबे युद्ध के लिए तैयार है। उनकी रणनीति में धैर्य और विस्तार दोनों शामिल थे।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नजर
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी रणनीति में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने जैसे बड़े कदम भी शामिल थे, जो वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित कर सकता है। लारीजानी देश के अंदर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को संभालने में भी अहम थे। इन प्रदर्शनों में हजारों लोगों की मौत हुई थी।
न्यूक्लियर पर लारीजानी ने ही की थी ट्रंप से बात
अमेरिका के साथ चल रही इनडायरेक्ट न्यूक्लियर बातचीत भी उनकी जिम्मेदारी थी, जो युद्ध के चलते रुक गई। उनकी मौत से सिस्टम में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है, जिसे भरना आसान नहीं होगा।
कमांड स्ट्रक्चर पर असर
लगातार वरिष्ठ नेताओं की हत्या से साफ है कि यह ईरान के कमांड स्ट्रक्चर को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। लारीजानी अलग-अलग गुटों को जोड़ने वाले नेता थे। उनकी गैरमौजूदगी में राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक तालमेल कमजोर पड़ सकता है। सेना में भी इस भटकाव को देखे जाने की आशंका है।
सेना का बढ़ सकता है दबदबा
अब संकेत मिल रहे हैं कि सत्ता और ज्यादा सेना के हाथ में जा सकती है। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने भी सशस्त्र बलों को ज्यादा अधिकार देने के संकेत दिए हैं। इससे फैसले तेजी से हो सकते हैं, लेकिन तालमेल की कमी से अस्थिरता भी बढ़ सकती है।
गायब हैं मोजतबा?
नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, मोजतबा ने सीजफायर के प्रस्ताव ठुकरा दिए हैं और कहा है कि अभी शांति का समय नहीं है।
सुलेमानी से तुलना
लारीजानी की तुलना कासिम सुलेमानी से की जा रही है, लेकिन उनका रोल ज्यादा व्यापक था क्योंकि वे राजनीति, सुरक्षा और कूटनीति तीनों संभालते थे। उनकी मौत से किसी भी संभावित शांति वार्ता को बड़ा झटका लगा है क्योंकि वे बातचीत कराने वाले अहम चेहरे थे। साथ ही अलग-अलग गुटों में सहमति बना सकें, लारीजानी ऐसे शख्स थे। कुछ रिपोर्ट्स में, अमेरिका और इजराइल उन्हें एक संभावित ट्रांजिशन लीडर के रूप में बताया था, लेकिन बाद में उनका रुख बदल गया।
लारीजानी की हत्या के बदले तेल अवीव को दहलाया
लारीजानी की मौत के बाद ईरान ने तुरंत जवाब देते हुए तेल अवीव पर मिसाइल हमले किए। इजरायली अधिकारियों के मुताबिक, इन हमलों में क्लस्टर वारहेड का इस्तेमाल हुआ, जो हवा में छोटे-छोटे बम फैलाते हैं और उन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है। जिसमें 2 और लोगों की मौत के साथ कुल 14 लोग अब तक मारे जा चुके हैं।
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