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Apple की नौकरी छोड़, बेंगलुरू में ऑटो ड्राइवर बने राकेश बी. पाल, इनकी ‘कहानी’ सुन आप भी हो जाएंगे ‘फैन’


Motivational Stories

oi-Bhavna Pandey

Bangalore Auto driver Inspirational story: एआई (Artificial Intelligence) आने के बाद कॉर्पोरेट कंपनियों में नौकरी करने वालों का भविष्य अब असुरक्षित नहीं लग रहा है। AI के बाद लाखों लोग पहले ही बेरोजगार हो चुके हैं और जो अभी नौकरी में हैं, उन्हें हमेशा नौकरी खोने का खतरा सताता रहता है। ऐसे में बेंगलुरु के राकेश बी. पाल की कहानी से ऐसे लाखों के लोगों के लिए प्रेरणा देने वाली है।

जिस कॉर्पोरेट दुनिया की चमक-धमक, मोटी तनख्वाह और ग्लोबल कंपनियों में नाम कमाने का सपना लाखों युवा देखते हैं वहीं बेंगलुरू निवासी राकेश बी. पाल ने इस सबको ठुकराकर एक अलग राह चुनी। ऐपल जैसी कंपनी के पूर्व कर्मचारी राकेश अब बेंगलुरू में इलेक्ट्रिक ऑटो चला रहे हैं। राकेश बी पाल ने ये रास्‍ता क्‍यों चुना उसे जानकर आप भी इनके फैन हो जाएंगे?

Bangalore Auto driver Rakesh B Pal

राकेश पाल ने क्‍यों छोड़ा कॉर्पोरेट वर्ल्‍ड?

बेंगलुरू के राकेश बी पाल ने अपने करियर की शुरूआत Apple Inc. जैसी दिग्गज कंपनी ने की और बाद में प्रमुख बैंकों और कंप्यूटर निर्माता कंपनियों के साथ भी काम किया। इंस्‍टाग्राम पर शेयर किए गए वीडियो में राकेश ने बताते हैं शुरुआत में सब अच्छा लगा, लेकिन जल्द ही मुझे महसूस हुआ कि कॉर्पोरेट दुनिया में लोग अक्सर ‘मैनिपुलेशन’ और निजी स्वार्थ के जाल में फंस जाते हैं। राकेश बताते हैं, “मैं एक पीपल प्लीजर बन गया था, जो दूसरों को खुश करने में खुद को भूल गया था। पास सुविधाएं थीं, लेकिन मन की खुशी नहीं।”

सब-कुछ था लेकिन खुशी नहीं थी! मिला डिप्रेशन

कॉर्पोरेट चुनौतियों के साथ-साथ राकेश की पर्सनल लाइफ में काफी उथल-पुथल रही। बचपन में पिता से मिले अनुभव और मैरिड लाइफ में निराशा ने उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर दिया। स्थिति इतनी बिगड़ी कि उन्हें NIMHANS और विक्टोरिया अस्पताल में इलाज कराना पड़ा, जहां उन्होंने लंबे समय तक एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयों का सहारा लिया। राकेश कहते हैं, “मैं घंटों एक ही ख्याल में फंस जाता था और खुद को घर में कैद कर लिया था।”

उबरने के लिए राकेश बी पाल ने चुना ये रास्‍ता

दवाइयों पर निर्भर न रहते हुए, राकेश ने मानसिक मुक्ति का रास्ता चुना। उन्होंने मनोविज्ञान और ‘डार्क ट्रायड’ की अवधारणा (नार्सिसिज्म, मैकियावेलियनवाद और साइकोपैथी) का अध्ययन किया और स्वयं पर काम शुरू किया। इंटरमिटेंट फास्टिंग के जरिए उन्होंने 15 किलो वजन घटाया और बचपन के शौक जैसे मुवा थाई और जू-जित्सू में लौट आए। इस सफर में उन्होंने स्टेट लेवल चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल भी जीता।

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने के बाद किए ये काम

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने के बाद राकेश ने जीवनयापन के लिए फूड डिलीवरी, बाइक टैक्सी और जिम सहायक जैसे काम किए। कोई काम छोटा नहीं था-हर काम उन्हें असली पहचान के करीब लाता। आज, चार साल के संघर्ष के बाद, वे बेंगलुरु की सड़कों पर गर्व से इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं। इसके साथ ही, डांस क्लासेस पढ़ाते हैं और पेंटिंग जैसी शौक पूरी कर रहे हैं, एक ऐसा जीवन जिसमें स्वतंत्रता और संतोष का मेल है।



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