Delhi
pti-Pallavi Kumari
Delhi Transplanted Trees: दिल्ली में पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों के बीच अब सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। कम सर्वाइवल रेट की शिकायतों के बाद दिल्ली सरकार ने वैज्ञानिक तरीके से पूरे प्रोसेस की जांच कराने का फैसला किया है। इसके साथ ही विदेशों से नई और आधुनिक मशीनें लाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है, ताकि पेड़ों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया को ज्यादा सुरक्षित और असरदार बनाया जा सके।
वैज्ञानिक स्टडी से खुलेगा पूरा सच
सरकार ने देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (Forest Research Institute) को इस पूरे मामले पर विस्तृत अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी है। इस स्टडी को तीन महीने के भीतर पूरा करने के लिए कहा गया है, ताकि जल्द से जल्द रिपोर्ट के आधार पर नीतियों में बदलाव किए जा सकें।

असल में पहले की रिपोर्ट में यह सामने आया था कि ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ों का औसत सर्वाइवल रेट सिर्फ 35.45 प्रतिशत रहा है। वहीं 2019 से 2022 के बीच ट्रांसप्लांट किए गए 1357 पेड़ों में से केवल 578 ही जीवित रह पाए, यानी करीब 42.5 प्रतिशत सफलता दर।
क्यों मर रहे हैं ट्रांसप्लांटेड पेड़?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा तकनीक इस समस्या की बड़ी वजह है। अभी ज्यादातर मामलों में बैकहो लोडर जैसी मशीनों का इस्तेमाल होता है, जिससे पेड़ों की जड़ों को नुकसान पहुंचता है और ‘ट्रांसप्लांट शॉक’ के कारण पेड़ सूख जाते हैं।
इसके अलावा यह भी पाया गया कि कई एजेंसियां तय नियमों और टाइमलाइन का पालन नहीं कर रही हैं। ट्री प्रिजर्वेशन प्लान का सही तरीके से पालन न करना भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया है।
अब आएंगी नई हाईटेक मशीनें
दिल्ली सरकार अब इस समस्या का हल तकनीक में देख रही है। इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया गया है, जिससे विदेशों से अत्याधुनिक ट्री ट्रांसप्लांटर मशीनें लाई जाएंगी।
इन मशीनों का इस्तेमाल पहले गुजरात में किया जा चुका है और ये मध्यम आकार के पेड़ों को बिना ज्यादा नुकसान पहुंचाए उखाड़ने में सक्षम हैं। अब यह देखा जाएगा कि दिल्ली की परिस्थितियों में ये मशीनें कितनी प्रभावी साबित होती हैं।
कौन से पेड़ बचते हैं ज्यादा, कौन से नहीं?
अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर पेड़ ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त नहीं होता। पीपल, बरगद, गूलर, अर्जुन, अमलतास, सहजन, गुलमोहर और अल्स्टोनिया जैसे पेड़ों का सर्वाइवल रेट बेहतर पाया गया है और इन्हें 350 सेमी तक के आकार में भी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।
वहीं आम, जामुन, इमली, नीम और कटहल जैसे पेड़ों का सर्वाइवल रेट कम रहा है, खासकर जब उनका आकार बड़ा होता है। कुछ पेड़ जैसे शीशम, कीकर, खेजड़ी और अशोक 200 सेमी से ज्यादा आकार में ट्रांसप्लांट करने पर बहुत कम बच पाते हैं, इसलिए इन्हें आमतौर पर ट्रांसप्लांट से बचाने की सलाह दी गई है।
नियमों में बदलाव की तैयारी
दिल्ली सरकार अब ट्री ट्रांसप्लांटेशन पॉलिसी 2020 में बदलाव की तैयारी कर रही है। इस पॉलिसी के तहत विकास परियोजनाओं में पेड़ों को काटने के बजाय ट्रांसप्लांट करना जरूरी होता है।
फिलहाल नियम है कि कम से कम 80 प्रतिशत पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया जाए, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि जमीनी परिस्थितियों में यह लक्ष्य हर बार संभव नहीं होता। इसके अलावा एजेंसियों को अब 2 से 3 साल तक पेड़ों की देखभाल की जिम्मेदारी देने की बात भी सामने आई है, ताकि सर्वाइवल रेट बेहतर हो सके।
डेटा और निगरानी पर जोर
बैठक में यह भी तय किया गया कि हर ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ का पूरा डेटा तैयार किया जाएगा, जिसमें उसकी प्रजाति, आकार और सर्वाइवल रेट शामिल होगा। इसके साथ ही ट्री ऑफिसर्स द्वारा साइट का नियमित निरीक्षण और सख्त निगरानी भी सुनिश्चित की जाएगी।
दिल्ली में पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन को लेकर अब तक जो सवाल उठते रहे हैं, उनका जवाब अब वैज्ञानिक अध्ययन और नई तकनीक के जरिए खोजा जाएगा। अगर सरकार की यह पहल सफल रहती है, तो आने वाले समय में विकास और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि नई मशीनें और बदले हुए नियम दिल्ली की हरियाली को बचाने में कितनी कारगर साबित होते हैं।
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