International
oi-Siddharth Purohit
Explained: अमेरिका, इजरायल और ईरान में जंग रही है। जिसकी वजह से कई देशों में महंगाई बढ़ गई है तो कई जगहों पर संसाधन कम होते जा रहे हैं। इसका असर अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत में कपड़ा, खनन और लोहे जैसे कई महत्वपूर्ण उद्योगों तक पहुंच गया है। ईंधन की बढ़ती कीमत, पेट्रोकेमिकल उत्पादों की महंगाई, कच्चे माल की लागत और Strait of Hormuz से गुजरने वाले शिपों पर हमले की वजह से इनका असर अब लेवल-2 और लेवल-3 तक की चीजों पर पड़ना शुरू हो चुका है।
पूरी दुनिया के मार्केट में हाहाकार
पश्चिम एशिया में संघर्ष ने ग्लोबल कैमिकल मार्केट में एक तरह का बदलाव शुरू कर दिया है। जिसमें, स्ट्रेट ऑफ होर्मूज में पैदा की गई अड़चन की वजह से नेफ्था फीडस्टॉक (नेफ्था फीडस्टॉक का इस्तेमाल एथलीन, प्रॉपलीन सिंथेटिक फाइबर और रबर बनाने में होता है) की कमी हो रही है, जिस पर एशिया के स्टीम क्रैकर्स अपनी 60-80% आपूर्ति के लिए निर्भर रहते हैं।

एक हफ्ते में 73 चीजों के दाम बढ़े
स्ट्रेट ऑफ होर्मूज में कार्गो शिप रुकने के कारण महज एक सप्ताह में रोजमर्रा की 73 अलग-अलग चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। जिनमें से कुछ की कीमतें 60% से भी ज्यादा बढ़ गईं। वहीं, भारत उन देशों में शामिल है जिस पर महंगाई का सीधा असर पड़ सकता है। भारत कच्चे तेल के लिए 50% से ज्यादा, LNG के लिए 50-55%, और एथिलीन ग्लाइकॉल, पॉलिमर, मेथनॉल और खेतों में इस्तेमाल होने वाली खाद के लिए भी काफी हद तक पश्चिम एशिया से इम्पोर्ट पर निर्भर है।
कमजोर रुपया भी बढ़ा रहा बोझ
इस इम्पोर्ट डिपेंडेंसी की वजह से भारत को बढ़ती लागत का बोझ झेलना पड़ रहा है। स्थिति इसलिए और मुश्किल हो रही है क्योंकि भारतीय रुपया पहले से ही 92 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर के आसपास कमजोर चल रहा है। ऐसे में स्ट्रेट ऑफ होर्मूज का ठप पड़ना भारत के लिए बहुत मुश्किल साबित हो सकता है।
इंडस्ट्रीज पर क्या-क्या होगा असर?
सभी उद्योगों को एक औसत मानकर चलें तो इन पर अमूमन तीन तरह के बड़े असर पड़ सकते हैं-
1. कच्चे माल की आपूर्ति में कमी
2. इम्पोर्ट किए कच्चे माल और शिपिंग कंटेनरों की लागत में बढ़ोतरी
3. बाजार में डिमांड और सप्लाई चैन पर गंभीर असर
क्या भारत खो देगा अपनी प्राथमिकता?
पहले कई उद्योग European Union द्वारा लागू किए गए CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) जैसे नियमों के कारण पश्चिम एशिया को एक वैकल्पिक बाजार के रूप में देख रहे थे। साथ ही भारत भी इसमें एक बड़ा खरीददार और विक्रेता दोनों की भूमिका में है। लेकिन अब वहां भी जंग के कारण व्यापारिक परिस्थितियां बदल रही हैं। क्योंकि जहां माल नहीं पहुंचेगा वहां दूसरे ऑप्शन तलाशे जाएंगे। ऐसे में अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो यही ऑप्शन परमानेंट भी हो सकते हैं। इसके अलावा ईंधन और फीडस्टॉक (कच्चे माल का स्टोर) की आपूर्ति पर भी असर पड़ रहा है, जो नैचुरल गैस और एलपीजी से सीधा जुड़ा है।
मैलिक एनहाइड्राइड की कीमत 61% बढ़ी
संघर्ष शुरू होने के बाद से मैलिक एनहाइड्राइड की कीमत में लगभग 61% बढ़ गई है। इस कैमिकल का उपयोग ऑटोमोबाइल और पुर्जों के निर्माण में और फाइबरग्लास प्लास्टिक बनाने के लिए किया जाता है। इसके जरिए अनसैचुरेटेड पॉलिएस्टर रेजिन (UPR) तैयार होता है, जो स्विच बोर्ड से लेकर कई उद्योगों में इस्तेमाल होता है।
जूते-बेल्ट होंगे महंगे?
एथिलीन, जिसका उपयोग पॉलीइथिलीन (PE), पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) और पॉलीस्टाइनिन जैसे प्लास्टिक में होता है, उसकी कीमत 35% से अधिक बढ़ गई है। इसी तरह एक्रिलिक एसिड, जो चिपकने वाले पदार्थ, पेंट, कोटिंग्स, डायपर, सैनिटरी पैड, कपड़ा, वॉटर ट्रीटमेंट कैमिकल और चमड़ा उद्योग में उपयोग होता है, उसकी कीमत भी 30% से अधिक बढ़ चुकी है। जिसका असर आपके जूतों, बेल्ट और दूसरे लैदर आइटम पर पड़ेगा।
कपड़ा उद्योग में आएगी महंगाई?
कपड़ा उद्योग भी इस संकट के कारण अपनी सप्लाई चेन में कई लेवल पर लागत में हुई बढ़ोतरी को कम करना चाहता है। लेकिन पहले अमेरिकी टैरिफ ने इसकी कमर तोड़ दी और अब कैमिकल महंगे होने से संकट में है। इसमें रंगाई, ब्लीचिंग और फिनिशिंग जैसे काम होते हैं, इसलिए ईंधन और बिजली महंगी होने से लागत और कीमत दोनों बढ़ सकती हैं।
कपड़े भी होंगे महंगे?
इंडस्ट्रियल एक्सपर्ट का कहना है कि कपड़ा क्षेत्र पर सबसे बड़ा असर पेट्रोकेमिकल के जरिए पड़ रहा है। अधिकतर कपड़ा कैमिकल और रंग पेट्रोकेमिकल कच्चे माल से बनते हैं और उनकी कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। गुजरात में एक बड़े कपड़ा कारखाने के मालिक ने बताया कि हाल के हफ्तों में ऐसे कई सामानों की कीमतों में करीब 50% तक बढ़ोतरी हुई जिनके बिना कपड़ा उद्योग चल ही नहीं सकता। कपड़ा उद्योग में पॉलिएस्टर का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है और उसकी कीमत ही 15% बढ़ गई हैं।
कपड़ा उद्योग के लिए पैकेजिंग भी अब एक बड़ा खर्च बनकर उभर रही है। कपड़ा पैकेजिंग का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक के मटेरियल पर निर्भर करता है और अब इनकी कीमतें कम समय में दोगुनी हो चुकी हैं। वहीं सप्लाई चेन में उतार-चढ़ाव के कारण सप्लायर अब नकद पेमेंट की मांग कर रहे हैं।
खनन भी होगा कम?
खनन उद्योग में भी ईंधन की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ने लगी है। खनन गतिविधियां काफी हद तक ईंधन से चलने वाली मशीनों पर निर्भर होती हैं। इसमें पोकलेन मशीनें, ड्रिलिंग मशीनें और खनिज को ले जाने वाले ट्रक शामिल हैं। ईंधन महंगा होने से खनन करना और उसकी ढुलाई दोनों की लागत बढ़ रही है। जिससे अब घर बनाना या दूसरे खनन से जुड़े काम भी महंगे हो सकते हैं।
इस्पात उद्योग पर भी युद्ध का असर
ईरान से जुड़े संघर्ष का असर भारत के इस्पात उद्योग पर भी पड़ा है। स्टील कंपनियों को ब्लास्ट फर्नेस उत्पादन में उपयोग होने वाले कोकिंग कोल की सप्लाई में बड़ी रुकावट आई है। जिससे अनिश्चितता के कारण शिपमेंट में देरी हो रही है और कोकिंग कोल की कीमतें बढ़ रही हैं।
भारत की कोकिंग कोल आयात पर निर्भरता
भारत में कोकिंग कोल का आयात लगातार बढ़ रहा है। यह 2020-21 में 51.20 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 57.58 मिलियन टन हो गया है। इस्पात उद्योग की करीब 95% कोकिंग कोल आवश्यकता आयात से पूरी होती है। कोकिंग कोल की शिपमेंट में देरी की वजह से कीमतों में 10% तक उछाल आया है। लिहाजा अब यह सेक्टर भी परेशान है।
ग्लास उद्योग पर भी मंडरा रहा खतरा
भारत के ग्लास मैन्युफेक्चरिंग उद्योग पर भी संकट का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि सरकार इस क्षेत्र के लिए नैचुरले गैस की सप्लाई में कटौती पर विचार कर रही है। अगर ऐसा होता है तो जो इंडस्ट्री 24 घंटे और सातों दिन चलता है। इसमें भट्ठी को बंद करना इसकी कमर पर गहरी चोट के जैसा होगा। इसका असर सिर्फ कांच की शीट तक नहीं बल्कि हाथों की चूड़ियों पर भी पड़ सकता है। फिरोजपुर में रहने रहने वाले मोहम्मद आरिफ जो चूड़ी बनाने का काम करते हैं और भट्टी का संचालन करते हैं, उन्होंने वनइंडिया को बताया कि आने वाले दिनों में शायद चूड़ियों की कीमत भी बढ़ सकती है।
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