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Explainer: ताइवान पर कब्जा करने की तैयारी में चीन! मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच अचानक हलचल तेज?


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oi-Sumit Jha

Taiwan China conflict Explainer: बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ताइवान की विपक्षी नेता चेंग ली-वुन की मुलाकात ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह हलचल ऐसे समय में हुई है जब दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट और ऊर्जा संकट पर है। ताइवान में इस वक्त ‘दो विचारधाराओं’ की जंग छिड़ी हुई है।

एक तरफ सत्ताधारी पार्टी अमेरिका के भरोसे अपनी सुरक्षा देख रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल ‘कुओमिन्तांग’ (KMT) को डर है कि अमेरिका अपनी लड़ाइयों में उलझा हुआ है और ताइवान कहीं अकेला न पड़ जाए। इसीलिए, विपक्षी नेता शांति और संवाद के नाम पर बीजिंग पहुंचे हैं। चीन की यह ‘सॉफ्ट पावर’ चाल ताइवान की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है, जिसे कई जानकार तख्तापलट की आहट भी मान रहे हैं।

Taiwan China conflict Explainer

मिडिल ईस्ट का तनाव और ताइवान का डर

ईरान और खाड़ी देशों में बढ़ते युद्ध के बीच ताइवान को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। ताइवानी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका लंबे समय तक मिडिल ईस्ट के संघर्ष में फंसा रहा, तो चीन ताइवान पर दबाव बढ़ाने का यह मौका हाथ से नहीं जाने देगा। ताइवान को डर है कि संकट के समय अमेरिका के पास उसके लिए हथियार या समय नहीं बचेगा।

Taiwan opposition visit to China: विपक्षी नेता की बीजिंग यात्रा का मकसद

KMT नेता चेंग ली-वुन की चीन यात्रा का मुख्य उद्देश्य तनाव को कम करना है। उनका तर्क है कि अमेरिका और चीन की महाशक्ति की जंग में ताइवान को ‘बलि का बकरा’ नहीं बनना चाहिए। वे सीधे बीजिंग से बात करके युद्ध की आशंका को खत्म करना चाहती हैं। हालांकि, ताइवान की मौजूदा सरकार इसे चीन की चाल और देश के साथ समझौता मान रही है।

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‘बिना जंग’ ताइवान को जीतने की रणनीति

शी जिनपिंग ने इस मुलाकात के दौरान स्पष्ट संदेश दिया कि ताइवान और चीन का एक होना ‘इतिहास की अनिवार्य दिशा’ है। जानकारों का मानना है कि चीन अब सीधे हमले के बजाय ताइवान की राजनीति के जरिए उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। विपक्ष को साथ लेकर चीन ताइवान की मौजूदा सरकार को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

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Middle East war impact on Taiwan: अमेरिका के अधूरे वादे और हथियारों का संकट

ताइवान की सरकार अमेरिका से अरबों डॉलर के हथियार खरीद रही है, लेकिन डिलीवरी में भारी देरी हो रही है। पुराने सौदों के हथियार अभी तक ताइवान नहीं पहुंचे हैं। विपक्षी दल अब जनता के बीच यह सवाल उठा रहे हैं कि जब अमेरिका हथियार ही नहीं दे पा रहा, तो उस पर इतना भरोसा क्यों? इसी नाराजगी का फायदा चीन उठा रहा है।

Xi Jinping Taiwan meeting: चीन की ‘ग्रे जोन वॉरफेयर’ चाल

चीन लगातार ताइवान की सीमाओं के पास अपने फाइटर जेट्स और युद्धपोत भेज रहा है। इसे ‘ग्रे जोन वॉरफेयर’ कहते हैं, जिसका मतलब है बिना औपचारिक युद्ध के दुश्मन को थका देना। हर दिन होने वाली इन घुसपैठों से ताइवान की सेना दबाव में है और आम जनता के मन में अनिश्चितता और डर का माहौल पैदा हो रहा है।

बातचीत के लिए विपक्ष को ही क्यों चुना?

चीन केवल उन लोगों से बात करता है जो ‘एक चीन’ की नीति को मानते हैं। ताइवान की सत्ताधारी पार्टी (DPP) ताइवान की आजादी की बात करती है, इसलिए चीन उन्हें ‘अलगाववादी’ मानता है। इसके विपरीत, विपक्षी दल KMT ऐतिहासिक रूप से चीन के साथ संवाद के पक्ष में रहा है। चीन विपक्ष को बढ़ावा देकर ताइवान की जनता को बांटना चाहता है।

ताइवान में तख्तापलट या चुनावी रणनीति?

इस यात्रा को ताइवान के अगले चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। चीन चाहता है कि ताइवान में ऐसी सरकार आए जो बीजिंग के साथ मिलकर चले। विपक्षी नेता की बीजिंग में मेहमाननवाजी दिखाकर चीन ताइवानी मतदाताओं को यह संदेश दे रहा है कि “अगर आप विपक्ष को चुनते हैं, तो युद्ध नहीं होगा और व्यापार बढ़ेगा।”

क्या चाहती है ताइवान की जनता?

ताइवान के आम लोग इस वक्त ‘पिस रहे’ हैं। युवाओं को अपनी पहचान खोने का डर है, तो बुजुर्गों को युद्ध की विभीषिका का। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर लोग वर्तमान स्थिति (Status Quo) को बनाए रखना चाहते हैं। वे न तो पूरी तरह चीन के साथ जाना चाहते हैं और न ही युद्ध के मैदान में झोंका जाना चाहते हैं, वे बस शांति चाहते हैं।



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