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Harish Rana Case में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, भारत में इच्छामृत्यु पर क्या कहता है संविधान?


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SC Verdict Harish Rana Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 11 मार्च को एक ऐसा फैसला सुनाया, जो भारतीय कानून व्यवस्था में ‘जीवन के अधिकार’ (Right to Life) और ‘मृत्यु के अधिकार’ (Right to Die) के बीच की धुंधली रेखा को स्पष्ट करता है। इस फैसले ने देश में ‘जीवन के अधिकार’ और ‘सम्मानजनक मृत्यु’ के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है।

दरअसल, कोर्ट का यह निर्णय हरीश राणा के परिवार द्वारा दायर याचिका पर आया है। हरीश पिछले 13 सालों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में हैं और पूरी तरह से बिस्तर पर निर्भर हैं।

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कोर्ट ने परिवार की याचिका को स्वीकार करते हुए उनके लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट (जीवन रक्षक प्रणाली) को वापस लेने की अनुमति दे दी है। SC ने परिवार, मेडिकल बोर्ड और केंद्र सरकार की राय लेने के बाद जनवरी 2026 में फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे अब सुनाया गया है।

Harish Rana Case Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने किस मामले में सुनाया फैसला?

पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हरीश राणा साल 2013 में अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं, जिससे उन्हें 100% क्वाड्रीप्लेजिक डिसेबिलिटी हो गई। डॉक्टरों की टीम और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने परिवार वालों से कहा कि हरीश के ठीक होने की अब कोई वैज्ञानिक उम्मीद नहीं बची है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में हरीश के परिवार की जमकर तारीफ की। बेंच ने कहा कि इतने लंबे और कठिन समय के बावजूद परिवार ने अटूट समर्पण के साथ हरीश की सेवा की, जो मानवीय संवेदनाओं की एक मिसाल है।

Right to Life vs Right to Die: ‘इच्छामृत्यु’ और ‘जीने के अधिकार’ के बीच क्या कहता है भारत का संविधान?

भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) का मामला संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है, जो हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अनुच्छेद 21 की व्याख्या की है। कोर्ट का मानना है कि ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ में ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ (Right To Die With Dignity) भी शामिल है। यह अधिकार केवल उन परिस्थितियों में लागू होता है जहां मरीज लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो और सुधार की कोई संभावना न हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में ‘एक्टिव’ बनाम ‘पैसिव’ इच्छामृत्यु के बीच का स्पष्ट अंतर बताया। एक्टिव इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) में जानबूझकर जहरीला इंजेक्शन या कोई पदार्थ देकर मरीज की जान ली जाती है। भारत में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है।

वहीं पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) में मरीज को जीवित रखने वाले उपचार जिसमें पेसेंट को वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब को हटा लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में इसी की अनुमति दी है।

Common Cause vs Union of India: 2018 का ‘कॉमन कॉज’ फैसला क्या है?

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम फैसला 2018 में ‘कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में आया था। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लाइलाज बीमारी या कोमा में पड़े मरीजों को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी जा सकती है।

मरीज ‘लिविंग विल’ (Living Will) के जरिए पहले से यह तय कर सकता है कि अगर वह गंभीर बीमारी में चला जाए तो उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। इलाज रोकने का फैसला मेडिकल बोर्ड और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही लिया जा सकता है।

हरीश राणा का मामला भी 2018 के कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का जिक्र करते हुए माना कि अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में है जहां वह मशीनों के बिना सांस भी नहीं ले सकता और उसके बचने की कोई गुंजाइश नहीं है, तो उसे जबरन जीवित रखना उसकी गरिमा का अपमान है।

भारत में किसे मिलता है इच्छामृत्यु का अधिकार?

भारत में इच्छामृत्यु का अधिकार हर किसी को नहीं मिलता। इसके लिए कुछ कड़ी शर्तें और प्रक्रियाएं हैं। लाइलाज बीमारी के मामले में जब मरीज ऐसी स्थिति में हो जहां आधुनिक चिकित्सा उसे ठीक नहीं कर सकती है वहां इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी जाती है।

जैसे- वेजिटेटिव स्टेट/ब्रेन डेड मरीज जो कोमा में हो या उसका मस्तिष्क काम करना बंद कर चुका हो। लिविंग विल व्यक्ति ने स्वस्थ रहते हुए लिखित में इच्छा जताई हो कि ऐसी स्थिति में उसे मशीन पर न रखा जाए वहां इच्छामृत्यु का अधिकार मिलता है। हालांकि, यदि लिविंग विल नहीं है, तो विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड इसकी सिफारिश करता है, जिसे कोर्ट की मंजूरी मिलनी आवश्यक है।

SC के फैसले के बाद नैतिक और सामाजिक बहस को मिला बल

इच्छामृत्यु पर समाज में दो विचारधाराएं हैं। समर्थकों का कहना है कि लाइलाज मरीज को मशीन के सहारे तड़पाना अमानवीय है और यह देखभाल करने वालों पर भी भारी फाइनेंसियल और इमोशनल बोझ डालता है। वहीं, विरोधियों का तर्क है कि इसका गलत इस्तेमाल संपत्ति या अन्य स्वार्थों के लिए हो सकता है और यह राज्य के ‘जीवन बचाने’ के कर्तव्य के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश की है जहां जीवन बचाने की उम्मीद न हो, वहाँ मृत्यु को गरिमापूर्ण बनाना ही न्याय है।

हरीश राणा केस क्यों अहम है?

हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत में ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ और पैसिव इच्छामृत्यु के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। यह फैसला दिखाता है कि अदालत ऐसे मामलों में मरीज के अधिकार, परिवार की स्थिति और चिकित्सा विशेषज्ञों की राय को ध्यान में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश करती है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में भी ऐसे मामलों में अदालत के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।



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