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oi-Siddharth Purohit
Iran America History Timeline: एक समय था जब ईरान अमेरिका को अपना दोस्त मानता था। इजरायल और अमेरिका मिलकर वहां की पहलवी सरकार की संप्रभुता के लिए लड़ते थे। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि अमेरिका और इज़राइल मिलकर ईरान पर बमबारी कर रहे हैं और उसके इस्लामी शासन को खत्म करने की कोशिश की बात करते हैं। आखिर दोनों देशों के रिश्ते दोस्ती से दुश्मनी तक कैसे पहुंचे? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
जब फारस को चाहिए था एक बाहरी दोस्त
बीसवीं सदी की शुरुआत में ईरान को फारस कहा जाता था और वहां क़ाजार राजवंश का शासन था। उस समय ब्रिटेन और रूस जैसी औपनिवेशिक ताकतें ईरान पर प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही थीं। ऐसे में ईरान को एक ऐसे देश की तलाश थी जिसका पश्चिम एशिया में औपनिवेशिक (अंग्रेजों की तरह कॉलोनी बनाने वाला) इतिहास न हो। अमेरिका इस मामले में अलग दिखता था। अमेरिका ने भी Self-determination का समर्थन किया और क्षेत्रीय दावे नहीं किए। इसी वजह से ईरान ने उसे उन दिनों दोस्त माना।

एक शिक्षक ने कराई दोस्ती
इसी दौर में हॉवर्ड बास्केर्विल नाम के एक युवा अमेरिकी शिक्षक तबरेज़ पहुंचे। वे ईरान की संवैधानिक क्रांति (1905-1911) में शामिल हो गए, जो लोकतंत्र की मांग कर रही थी। 1909 में उनकी हत्या कर दी गई। ईरानियों ने उन्हें “फारस का लाफ़ायेट” कहा- अमेरिकी क्रांति के नायक मार्क्विस डी लाफायेट की तरह सम्मान दिया। इससे दोनों देशों के लोगों के बीच भावनात्मक रिश्ता मजबूत हुआ।
मॉर्गन शूस्टर और ‘द स्ट्रैंग्लिंग ऑफ पर्शिया’
1911 में ईरान ने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अमेरिकी वकील मॉर्गन शूस्टर को कोषाध्यक्ष-जनरल नियुक्त किया। लेकिन ब्रिटेन और रूस के दबाव में उन्हें हटा दिया गया। शूस्टर ने बाद में “The Strangling of Persia” किताब लिखी, जिसमें उन्होंने यूरोपीय इम्पीरियलिज्म को ईरान की प्रगति रोकने का जिम्मेदार ठहराया।
रज़ा खान और पहलवी राजवंश की शुरुआत
1921 में रज़ा खान ने सैन्य तख्तापलट किया और 1925 में खुद को शाह घोषित कर पहलवी राजवंश की स्थापना की। वे तुर्की के मुस्तफा कमाल अतातुर्क से प्रेरित थे। उन्होंने मॉर्डनाइजेशन और धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाई। जिसमें ईरानी लोगों, खासकर कि महिलाओं के लिए स्वतंत्रता रखी गई।
दूसरा विश्व युद्ध और अमेरिका की भूमिका
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और सोवियत संघ ने ईरान पर कब्जा कर लिया। रज़ा खान को अपने बेटे मोहम्मद रज़ा पहलवी के पक्ष में पद छोड़ना पड़ा। अमेरिका ने Persian Corridor के जरिए रसद (logistics) सपोर्ट दिया। इसके बाद, 1943 के तेहरान सम्मेलन में अमेरिका ने ईरान की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की गारंटी का समर्थन किया। 1946 में उसने सोवियत सेनाओं को उत्तरी ईरान से हटाने में दबाव बनाया और इसमें सफलता भी हासिल की।
तेल का सवाल और मोसद्देग का उदय
युद्ध के बाद एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी (AIOC) को लेकर नाराज़गी बढ़ी क्योंकि ईरान को कम रॉयल्टी मिलती थी। मोहम्मद मोसद्देग ने तेल के राष्ट्रीयकरण की मांग की। 1951 में मोसद्देग प्रधानमंत्री बने तो ब्रिटेन ने तेल पर नाकेबंदी लगा दी। इससे शाह और मोसद्देग के बीच टकराव हुआ। हालांकि कहा जाता है कि मोसद्देग ईरानी जनता के पक्ष में थे, जबकि शाह अमेरिका और ब्रिटेन की भाषा बोल रहे थे।
1953 का तख्तापलट
1953 में CIA और MI6 के समर्थन से शाह ने ईरान में तख्तापलट कर मोसद्देग को सत्ता हटा दिया और उन्हें जीवनभर नजरबंद रखा गया। शाह वापस सत्ता में आए और अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ी। इधर शाह ने सत्ता में आते ही अमेरिका और ब्रिटेन के इशारे पर तेल का काम शुरू किया। जिससे अमीर होते हुए भी ईरानी लोगों के हाथ गरीबी और महंगाई लगने लगी। यहीं से ईरानियों में अमेरिका के खिलाफ गुस्सा पनपने लगा।
असंतोष की शुरुआत?
शाह और अमेरिका के बीच तेल, खुफिया और सैन्य सहयोग बढ़ा। लेकिन शाह की गुप्त पुलिस SAVAK पर दमन के आरोप लगे। 1975 में सभी राजनीतिक दलों को खत्म कर एक ही रस्तखिज़ पार्टी बनाई गई। इसके बाद, 1977 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने शाह को “स्थिरता का द्वीप” कहा। लेकिन 1978-79 में देशभर में हड़तालें हुईं, तेल उद्योग ठप पड़ा।
शाह की अय्याश पार्टी और शासन का अंत
हड़ताल और तेल उद्योग ठप हो रहा था लेकिन मोहम्मद रेजा पहलवी की अय्याशियों में कोई कमी नहीं थी। इसी बीच दूसरे देशों के नेताओं को लुभाने के लिए शाह ने एक आलीशान पार्टी रखी जिसमें बहुत सारा पैसा खर्च किया। लिहाजा महंगाई से जूझ रही जनता को ये सहन नहीं हुआ। बड़ी तादाद में पूरे ईरान में प्रोटेस्ट हुए और जनवरी 1979 में शाह देश छोड़कर भाग गए।
1979 की इस्लामिक क्रांति और खुली दुश्मनी
इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका-ईरान रिश्ते पूरी तरह बदल गए। 1979 में अमेरिकी दूतावास बंधक संकट 444 दिनों तक चला। फिर ईरान-इराक युद्ध (8 साल) हुआ, जिसमें लाखों लोग मारे गए।अमेरिका ने ईरानी तेल प्लेटफॉर्म पर हमले किए और 1988 में ईरानी फ्लाइट 655 को मार गिराया।
प्रतिबंध और आर्थिक असर
अमेरिका ने रक्षा, ऊर्जा, बैंकिंग, आर्थिक, धातु और व्यापार जैसे क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाए। आज खुले बाजार में ईरान की मुद्रा लगभग 16,64,000 रियाल प्रति 1 अमेरिकी डॉलर के आसपास बताई जाती है। इससे आर्थिक दबाव साफ दिखता है।
वैचारिक दुश्मनी और प्रॉक्सी युद्ध
1979 के बाद ईरान ने अमेरिका को “शैतान” और इज़राइल को “ज़ियोनिस्ट शासन” कहा। ईरान हमास, हिजबुल्लाह और हौथी जैसे समूहों के जरिए “प्रतिरोध” की नीति अपनाता रहा है। हाल की झड़पों में ईरान ने उन खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। अयातुल्ला अली खामेनेई की संभावित हत्या से यह टकराव और गहरा होता जा रहा है। तो ये पूरी टाइमलाइन थी कि कैसे अमेरिका और ईरान जो कभी दोस्त होते थे आज उनके बीच में मिसाइलें दागी जा रही हैं।
इस टाइमलाइन पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।
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