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Iran Vs America: ईरान के आगे क्यों झुके ट्रंप? सत्ता जाने का डर या कुछ और, जानें सरेंडर के पीछे का खौफनाक सच


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oi-Sumit Jha

Iran Vs America War: मध्य पूर्व में परमाणु युद्ध की आहट के बीच दुनिया उस वक्त दंग रह गई, जब कल तक ईरान को मिटाने की धमकी देने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर अचानक बदल गए। ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान के बीच “बेहद सकारात्मक” बातचीत हुई है, जिसके बाद उन्होंने ‘रक्षा विभाग’ को अगले 5 दिनों तक ईरान के पावर प्लांट्स पर हमले रोकने का आदेश दिया है।

युद्ध के मुहाने पर खड़े देशों के बीच यह अचानक आई नरमी क्या वाकई शांति की पहल है या ट्रंप का कोई गहरा राजनीतिक डर? ट्रंप के इस पोस्ट को कुछ ही देर में डिलीट करने ने सस्पेंस को और गहरा दिया है। आइए जानते हैं इस ‘सरेंडर’ के पीछे के 5 कड़वे सच।

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$100 प्रति बैरल तेल और वैश्विक अर्थव्यवस्था का दबाव

ईरान पर हमले की खबर मात्र से वैश्विक तेल बाजारों में हाहाकार मच गया था। विशेषज्ञों का मानना था कि यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली जातीं, जिससे अमेरिका सहित पूरी दुनिया में रिकॉर्ड तोड़ महंगाई आ जाती। ट्रंप जानते हैं कि अमेरिकी जनता युद्ध से ज्यादा अपनी जेब की परवाह करती है। अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाने के लिए उन्होंने अंतिम क्षणों में अपने कदम पीछे खींचे हैं, जिसे दुनिया उनका आर्थिक सरेंडर मान रही है।

Trump Iran Peace Talks 2026: भारत सहित दुनियाभर के देश ट्रंप के खिलाफ

अमेरिका के अलावा दुनिया भर में तेल और LPG गैस की भारी किल्लत ने ट्रंप की युद्ध नीति के खिलाफ एक वैश्विक मोर्चा खड़ा कर दिया है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, ने स्पष्ट कर दिया कि वह इस युद्ध के कारण अपनी अर्थव्यवस्था को दांव पर नहीं लगा सकता। भारत सहित कई शक्तिशाली देशों ने अमेरिका के इस कदम का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया। इसी अंतरराष्ट्रीय दबाव और अलग-थलग पड़ने के डर ने ट्रंप को अपनी आक्रामक रणनीति बदलने पर मजबूर किया।

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Trump Iran War News Today: 2026 मिड-टर्म चुनावों में कुर्सी छिनने का डर

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ट्रंप की यह नरमी “शांति प्रेम” नहीं, बल्कि विशुद्ध “चुनावी गणित” है। 2026 के मिड-टर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति नाजुक बनी हुई है। सर्वे बता रहे हैं कि अमेरिकी नागरिक एक और अंतहीन युद्ध (Forever War) के पक्ष में नहीं हैं। ट्रंप को डर है कि अगर ताबड़तोड़ हमले शुरू हुए और अमेरिकी सैनिकों के ताबूत वापस आए, तो उनकी सत्ता हमेशा के लिए जा सकती है। सत्ता बचाने के लिए उन्होंने इस कूटनीतिक समझौते का सहारा लिया है।

US-Iran Conflict News Hindi: ईरान का घातक पलटवार और हॉर्मुज की घेराबंदी

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि यदि उसके पावर प्लांट्स पर हमला हुआ, तो वह ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को पूरी तरह बंद कर देगा। दुनिया का 20% तेल यहीं से गुजरता है। इसके अलावा, ईरान के पास मौजूद अत्याधुनिक मिसाइलें खाड़ी में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के लिए तैयार थीं। ईरान के इस संभावित घातक पलटवार ने पेंटागन और व्हाइट हाउस को अपनी युद्ध नीति पर दोबारा विचार करने और अस्थायी युद्धविराम घोषित करने पर मजबूर कर दिया।

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नाटो सहयोगियों का साथ छोड़ने का संकेत

ट्रंप की इस आक्रामक नीति में अमेरिका अलग-थलग पड़ता दिख रहा था। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख नाटो (NATO) सहयोगियों ने ईरान के साथ पूर्ण युद्ध का समर्थन करने से इनकार कर दिया था। बिना अंतरराष्ट्रीय समर्थन के अकेले युद्ध लड़ना अमेरिका के लिए सैन्य और रणनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता था। सहयोगियों के इस ठंडे रुख ने ट्रंप के आत्मविश्वास को हिला दिया, जिसके बाद उन्हें बातचीत की मेज पर आने के अलावा और कोई सुरक्षित रास्ता नहीं सूझा।

सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट करने का रहस्यमयी सस्पेंस

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ट्रंप का वो पोस्ट था, जिसे उन्होंने “सकारात्मक बातचीत” के बाद शेयर किया और फिर कुछ ही मिनटों में डिलीट कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट हाउस के अंदर और रक्षा विभाग के बीच इस समझौते को लेकर भारी मतभेद हैं। क्या ट्रंप पर उनकी ही सेना का दबाव था? या फिर यह ईरान को भ्रमित करने की कोई नई चाल है? इस डिलीटेड पोस्ट ने संकेत दिया है कि ट्रंप प्रशासन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है और वे गहरे दबाव में काम कर रहे हैं।



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