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oi-Pallavi Kumari
Iran War Impact on Indian Economy: मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, खासकर इजरायल-अमेरिका और ईरान में जारी जंग सिर्फ एक भू-राजनीतिक खबर नहीं है, इसका असर धीरे-धीरे भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। फाइनेंस और इकोनॉमिक्स एक्सपर्ट सरथक आहूजा (Sarthak Ahuja) का कहना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध तनाव का भारत की अर्थव्यवस्था पर पांच बड़े तरीकों से असर पड़ रहा है।
पहला, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से महंगाई का खतरा बढ़ रहा है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में फ्रेट और इंश्योरेंस महंगे होने से कंपनियों का मुनाफा घट सकता है। तीसरा, महंगे आयात की वजह से रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ सकता है। चौथा, फ्लाइट रद्द होने से बिजनेस ट्रैवल और पर्यटन प्रभावित हो सकता है। पांचवां, एनआरआई से पैसा आ सकता है लेकिन घरेलू खपत घट सकती है।

इसका असर करीब 15 कारोबारों पर पड़ सकता है, जिनमें तेल, एविएशन, बासमती चावल निर्यात, चाय, जेम्स-ज्वेलरी, हीरा उद्योग, टेक्सटाइल-गारमेंट, पॉलिएस्टर यार्न, पेंट, टायर, केमिकल, उर्वरक, कृषि, ट्रैवल एजेंसी और पर्यटन उद्योग शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध का प्रभाव पांच बड़े आर्थिक रास्तों से भारत तक पहुंचेगा, और आने वाले दिनों में कई रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी बदल सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों से महंगाई का खतरा
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भर करता है। मिडिल ईस्ट इस सप्लाई का सबसे बड़ा केंद्र है। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है।
तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने से लगभग हर सेक्टर में महंगाई का दबाव बन जाता है। इसका मतलब है कि आम उपभोक्ता को रोजमर्रा की चीजों के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
सोना, हीरे और ज्वेलरी कारोबार पर दबाव
भारत में इस्तेमाल होने वाला सोना और कच्चे हीरों का बड़ा हिस्सा दुबई जैसे व्यापारिक केंद्रों से आता है। अगर वहां से सप्लाई बाधित होती है तो बाजार में सोने की उपलब्धता कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में ज्वेलरी की कीमतें और बढ़ सकती हैं। गुजरात के सूरत जैसे शहर, जो हीरा प्रोसेसिंग के बड़े केंद्र हैं, वहां के कारोबार पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि कच्चे हीरों की सप्लाई कम हो सकती है।
सरथक आहूजा के मुताबिक,
”भारत में जो सोना आता है, उसका बड़ा हिस्सा दुबई के व्यापारियों से आयात किया जाता है। यही सोना बाद में प्रोसेस होकर ज्वेलरी में बदलता है। इसी तरह कच्चे हीरे भी बड़ी मात्रा में बाहर से आते हैं। अभी हालात ऐसे हैं कि कई जगह शिपमेंट रुक गए हैं या धीमे पड़ गए हैं। इसका मतलब यह है कि बाजार में सोने की सप्लाई कम हो सकती है। जब सप्लाई कम होती है तो ज्वेलरी महंगी हो जाती है। यानी अगर आप आने वाले समय में सोने के गहने खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको पहले से ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।”
फ्लाइट कैंसिलेशन और ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर पर असर
मिडिल ईस्ट का हवाई क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए बेहद अहम है। अगर वहां सुरक्षा जोखिम बढ़ता है तो कई उड़ानें रद्द हो सकती हैं या लंबा रास्ता लेना पड़ सकता है।
इसका असर एयरलाइन कंपनियों के साथ-साथ पर्यटन उद्योग और बिजनेस ट्रैवल पर भी पड़ेगा। जब यात्रा कम होती है तो होटल, ट्रैवल एजेंसी और पर्यटन से जुड़े कई व्यवसायों की आय प्रभावित होती है।
सरथक आहूजा ने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर वीडियो में कहा,
”अभी मिडिल ईस्ट के कई इलाकों में उड़ानें प्रभावित हो रही हैं और कुछ रूट्स पर फ्लाइट्स बंद भी हो सकती हैं। ऐसे में लोग यूरोप या मिडिल ईस्ट की छुट्टियों की बुकिंग करने से भी बच सकते हैं। अगर आप विदेश घूमने की योजना बना रहे हैं तो फिलहाल दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका या भारत के अंदर के लक्जरी डेस्टिनेशन ज्यादा सुरक्षित विकल्प माने जा रहे हैं। ट्रैवल एजेंसियों के लिए भी यही सलाह है कि वे अभी इन जगहों के पैकेज ज्यादा प्रमोट करें क्योंकि मांग वहीं बढ़ सकती है।”
अंतरराष्ट्रीय व्यापार महंगा, कंपनियों के मुनाफे पर दबाव
युद्ध के माहौल में समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ जाता है। इसका सीधा असर फ्रेट और इंश्योरेंस लागत पर पड़ता है। जब जहाजों के लिए बीमा महंगा हो जाता है और शिपिंग खर्च बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की लागत भी बढ़ जाती है।
इस स्थिति में कई कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है, क्योंकि उन्हें ज्यादा लागत के साथ व्यापार करना पड़ता है। खासकर वे कंपनियां जो आयात-निर्यात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति बन सकती है।
रुपया कमजोर पड़ने की आशंका
अगर तेल और अन्य जरूरी आयात महंगे हो जाते हैं तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसका असर भारतीय रुपये पर भी पड़ सकता है। सरथक आहूजा मानते हैं कि ऐसी स्थिति में रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है। इससे आयात और महंगा हो जाएगा और विदेशी यात्रा से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक कई चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
कपड़ा और गारमेंट उद्योग की लागत बढ़ सकती है
कपड़ा उद्योग में इस्तेमाल होने वाला पॉलिएस्टर यार्न कच्चे तेल से जुड़ा हुआ है। तेल महंगा होने का मतलब है कि कपड़ा उत्पादन की लागत भी बढ़ेगी। सूरत और अन्य टेक्सटाइल हब में कपड़ा और गारमेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकती है। अगर लागत बढ़ी तो निर्यात और घरेलू बिक्री दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
भारत में आने वाले दिनों में कपड़ा और गारमेंट इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। कपड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाला पॉलिएस्टर यार्न काफी हद तक कच्चे तेल से जुड़ा होता है। जब तेल महंगा होता है तो इस कच्चे माल की कीमत भी बढ़ जाती है। इसका सीधा असर कपड़ा बनाने की लागत पर पड़ता है। इसलिए आने वाले समय में कपड़े महंगे हो सकते हैं और जो लोग कपड़े के कारोबार या एक्सपोर्ट में हैं, उन्हें अपनी लागत और मुनाफे को लेकर सावधान रहना पड़ेगा।
एनआरआई से आने वाला पैसा बढ़ सकता है, लेकिन खर्च घटेगा
मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। तनाव के समय वे अपने परिवारों को ज्यादा पैसे भेज सकते हैं ताकि घर की आर्थिक सुरक्षा बनी रहे। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में परिवार अक्सर खर्च कम कर देते हैं और बचत बढ़ा देते हैं। इसका असर घरेलू खपत पर पड़ सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ताकत मानी जाती है।
चावल कारोबार पर असर, बासमती की खेप फंसी
भारत के बासमती चावल का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट और खाड़ी देशों में जाता है। ईरान और इराक इस चावल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं। मौजूदा हालात में खबर है कि करीब दो लाख टन से ज्यादा बासमती चावल जहाजों में फंसा हुआ है और आगे नहीं बढ़ पा रहा।
अगर यह स्थिति लंबी चली तो निर्यात में बाधा आएगी और घरेलू बाजार में चावल की आपूर्ति बढ़ सकती है। अगर यह चावल निर्यात नहीं हो पाया तो इसे भारतीय बाजार में ही बेचना पड़ेगा। ऐसे में बाजार में चावल की सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतें थोड़ी कम भी हो सकती हैं। इसी तरह चाय के निर्यात पर भी असर पड़ने की आशंका है।
खेती और किसानों पर पड़ने वाले असर
भारत जिन उर्वरकों का इस्तेमाल खेती में करता है, उनका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। खासकर सल्फर आधारित उर्वरक का आयात काफी हद तक इसी क्षेत्र से होता है। अगर वहां से सप्लाई कम हो जाती है या रुक जाती है तो किसानों के लिए उर्वरक महंगे हो सकते हैं। जब खेती की लागत बढ़ती है तो उसका असर बाद में अनाज और सब्जियों की कीमतों पर भी पड़ता है। इसलिए आने वाले छह महीनों में कृषि उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
पेंट, टायर और केमिकल सेक्टर पर असर
कई औद्योगिक उत्पादों में कच्चे तेल से बनने वाले रॉ मैटेरियल का इस्तेमाल होता है। पेंट, टायर और केमिकल उद्योग ऐसे ही सेक्टर हैं। जब कच्चा माल महंगा होता है तो कंपनियों को या तो कीमत बढ़ानी पड़ती है या अपने मुनाफे में कटौती करनी पड़ती है। इसका असर आखिरकर बाजार और उपभोक्ता दोनों पर पड़ता है।
कुल मिलाकर भारत के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों का कहना है कि मिडिल ईस्ट का यह संकट केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं है। इसके असर की लहरें धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंचती हैं और भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता।
तेल से लेकर कृषि, ज्वेलरी, टेक्सटाइल और पर्यटन तक कई सेक्टरों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। आने वाले महीनों में बाजार की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि मिडिल ईस्ट का यह संकट कितना लंबा चलता है और वैश्विक व्यापार पर इसका कितना असर पड़ता है।
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