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oi-Siddharth Purohit
Israel Stuck In War: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग में अब अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म को लेकर बातचीत होने की संभावना ने इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। दोनों पार्टियां बाद करने के लिए तैयार हैं, बस ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं है इसलिए थोड़ी देर रहो री है। इससे अलग Israel और Iran के बीच हमलों और जवाबी हमलों का सिलसिला जारी है। ऐसे में अगर ईरान और अमेरिका का समझौता होता है तो नेतन्याहू बुरे फंसेंगे और उनके पास विकल्प भी कुछ नहीं होगा।
‘नेतन्याहू नहीं चाहते समझौता हो’
इज़रायल के रुख और इजरायली एक्सपर्ट्स के बयानों को परखें तो साफ पता चलता है कि बेन्जामिन नेतन्याहू कोई समझौता नहीं चाहते। न ही वे ये चाहते हैं कि इस युद्ध में किसी किस्म की शांति हो। जबकि अमेरिका का रुख अलग है। जिसमें ट्रंप और नेतन्याहू के रुख में एक तरह का टकराव है। यह टकराव दोनों देशों की जियो पॉलिटकल प्राथमिकताओं में अंतर को दर्शाता है।

अपने ही वादे में फंसे नेतन्याहू
बेन्जामिन नेतन्याहू ने वादा किया था कि यह युद्ध इज़रायल के सभी बड़े ख़तरों को ख़त्म कर देगा और शायद ईरान में सत्ता परिवर्तन भी लाएगा। जो कि इस युद्ध का सबसे बड़ा मसकद है। लेकिन फिलहाल उनके वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच एक बड़ा फर्क दिख रहा है। यह स्थिति नेतन्याहू के लिए घरेलू स्तर पर भी चुनौतियां खड़ी कर रही है और वे देश के अंदर ही घिर रहे हैं। युद्ध के इस दौर में, किसी भी समझौते को इज़रायली मतदाताओं और अपने सहयोगियों के सामने बेहतर बताकर पेश करना उनके लिए चुनौती होगी। साथ ही, जनता और उनकी अपनी पार्टी ही इसे रिजेक्ट कर सकती है।
क्या है कैच-22 जहां फंसे नेतन्याहू?
इजरायली एक्सपर्ट मिशेल मिलिस्टीन लिखते हैं कि अगर ट्रंप सचमुच इस जंग से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं, तो इज़रायल के प्रधानमंत्री खुद को एक मुश्किल स्थिति में फंसा हुआ पाएंगे। मिल्स्टीन इस स्थिति को “कैच-22” बताते हैं, जहां कोई भी विकल्प आसानी से नहीं मिलता और दोनों तरफ से नुकसान की जबरदस्त आशंका है।
ट्रंप के बिना जंग लड़ पाएंगे नेतन्याहू?
अगर बातचीत होती है, तो नेतन्याहू युद्ध को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे, और वह डोनाल्ड ट्रंप से यह भी नहीं कह सकते कि मैं आपके बिना युद्ध जारी रखूंगा। उन्हें पता है कि ट्रंप जो भी फैसला करेंगे उसे इजरायल को मानना ही पड़ेगा।
लिकुड पार्टी का बयान
लिकुड पार्टी के सांसद डैन इलूज ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि, “इज़रायली लोग चाहते हैं कि जंग ख़त्म हो। लेकिन हमारा मानना है कि इसका सही अंत तभी होगा जब हम इस ईरान के मौजूदा शासन को हरा दें, न कि इसे ऐसे ही बीच छोड़ दें कि यह बार-बार हमें परेशान करता रहे।” उनका जोर केवल रोकथाम पर नहीं, बल्कि स्थायी समाधान पर है। लिहाजा नेतन्याहू के पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं है और अगर ट्रंप समझौता करते हैं तो इजरायली लोग और पार्टी दोनों उनके खिलाफ जा सकती हैं।
नेतन्याहू की सख्त कितने काम की?
सोमवार को राष्ट्रपति ट्रंप से बातचीत के बाद, नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि इज़रायल, ईरान और लेबनान दोनों पर हमले जारी रखेगा और सभी परिस्थितियों में अपने अहम हितों की रक्षा करेगा। नेतन्याहू का ये बयान भले ही उनकी दृढ़ता दिखाता हो लेकिन अकेले इजरायल ईरानी शासन को नहीं बदल सकता। पिछले 27 दिनों की जंग में जब अमेरिका के साथ में उनसे सफलता नहीं मिली तो फिर अकेले ये काम और मुश्किल होगा।
लेबनान में भरपाई करना चाह रहा इजरायल?
इधर ईरान में अपना मकसद पूरा होता न देख इजरायल भी पैनिक कर रहा है। इसलिए वहां की लीडरशिप ने लेबनान पर हमला और कब्जा करने की रणनीति तेज कर दी है। अगर ईरान में तय लक्ष्य हासिल न हुए तो फिर वह लेबनान की जमीन पर हुए कब्जे को अपनी जीत के तौर पर पेश कर सकता है। साथ ही, अगर वह हिज्बुल्लाह को गुट को पूरी तरह खत्म करने में कामयाब रहता है तो इस पर भी नेतन्याहू अपनी पीठ थपथपा सकते हैं।
ईरान की रणनीतिक बढ़त
एक्सपर्ट्स की मानें तो ईरानी शासन आसानी से झुकने वाला नहीं है, वह अमेरिका को ऐसी कोई चीज नहीं देंगे जो उन्होंने युद्ध से पहले नहीं दी थी। वह ईरान की रणनीतिक बढ़त पर भी प्रकाश डालते हैं। जो कि नेतन्याहू के खिलाफ जा रही है। अगर अमेरिका, ईरान की न्यूक्लियर का सिविल इस्तेमाल और प्रतिबंध हटाने जैसी बड़ी शर्तें मान लेता है तो फिर यह नेतन्याहू की बड़ी हार होगी।इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की एक अहम कड़ी, Strait of Hormuz ईरान के कंट्रोल में है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है। फिलहाल ईरान ने इसे बाधित कर बता दिया है जमीन को भी हथियार बनाया जा सकता है। और यह ऐसा हथियार है जिसे सिर्फ कंट्रोल किया जा सकता है न कि तबाह। फिलहाल, यह परिस्थिति भी नेतन्याहू के खिलाफ और ईरान के पक्ष में जाती दिख रही है।
ट्रंप का यू-टर्न
राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ नहीं खोलने पर वह ईरान के ऊर्जा ढांचे पर बड़े पैमाने पर हमला करेंगे, लेकिन पिछले हफ्ते ट्रंप ने यह अल्टीमेटम वापस ले लिया। इस फैसले से ईरान का आत्मविश्वास और बढ़ा है जबकि इजरायल से इसको झटका लगा है। इसका सीधा कारण ये माना जा रहा है कि इजरायल के एनर्जी सोर्स पर हमला करने के जवाब में ईरान ने भी ऐसा ही किया। जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई और इसे अचानक रोकना पड़ा।
नेतन्याहू के हाथ में क्या बचा?
अगर डील होती है तो यह नेतन्याहू की हार होगी, पर बहुत बड़ी नहीं। लेकिन उनकी ईरान को कमजोर करने की प्लानिंग पूरी तरह से फेल हो जाएगी। जिसका असर इजरायल में आने वाले चुनाव में देखने को मिलेगा। साथ ही, भविष्य में ईरान पर होने वाले हमलों की संभावना भी निचले स्तर पर पहुंचेगी। कुल मिलाकर नेतन्याहू इस युद्ध में फिलहाल फंसे हुए हैं। निकलेंगे कैसे, यह समझौते की वो शर्तें तय करेेंगी जिन पर ईरान और अमेरिका दोनों सहमत होंगे।
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