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Khamenei Death: खामेनेई की मौत के 21 दिन बाद भी क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार? सामने आई चौंकाने वाली वजह!


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oi-Sumit Jha

Khamenei Death: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की खबरों ने न केवल मध्य-पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है। रिपोर्ट्स का दावा है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक कथित हमले ने ईरान के इस सबसे ताकतवर स्तंभ को ढहा दिया। लेकिन मौत से ज्यादा बड़ा रहस्य उनके अंतिम संस्कार को लेकर गहरा गया है।

हफ्तों बीत जाने के बाद भी खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक न किया जाना अंतरराष्ट्रीय गलियारों में चर्चा और साजिश की थ्योरीज़ को जन्म दे रहा है। क्या यह उत्तराधिकार की जंग को रोकने की कोई गुप्त रणनीति है, या तेहरान किसी बड़े जवाबी हमले की तैयारी में समय ले रहा है? यह देरी महज़ सुरक्षा प्रोटोकॉल है या पर्दे के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक खेल, इसकी पड़ताल अब अनिवार्य हो गई है।

Khamenei Death

Why is Khamenei burial delayed: क्यों नहीं हो रहा अंतिम संस्कार?

अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में हो रही असाधारण देरी के पीछे ‘सुरक्षा की अभेद्य दीवार’ खड़ी करना तेहरान की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। ईरान के सबसे कद्दावर नेता की अंतिम विदाई में उमड़ने वाला जनसैलाब, युद्ध की विभीषिका के बीच किसी बड़े इजरायली या अमेरिकी हमले का आसान निशाना बन सकता है। प्रशासन को डर है कि एक छोटी सी चूक देश को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकती है।

यही कारण है कि जब तक शोक सभा के हर रास्ते और आयोजन स्थल को ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ और अभेद्य किले में तब्दील नहीं कर दिया जाता, तब तक सुपुर्द-ए-खाक की प्रक्रिया को टाला जा रहा है। इसके साथ ही, संभावित उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई के घायल होने की अपुष्ट खबरों ने सत्ता के गलियारों में ‘वैक्यूम’ पैदा कर दिया है। बाहरी हमलों और आंतरिक अस्थिरता के दोहरे मोर्चे पर जूझ रहा ईरान फिलहाल ‘इंतजार करो और देखो’ की रणनीति अपना रहा है, ताकि सत्ता का हस्तांतरण और अंतिम विदाई बिना किसी रक्तपात के संपन्न हो सके।

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Iran Israel Conflict Update Hindi: शव को सुरक्षित रखने की तकनीक

इस्लामी मान्यताओं में शव को जल्द दफनाने की परंपरा है, लेकिन विशेष स्थितियों में इसे ठंडे वातावरण (रेफ्रिजरेशन) में रखा जा सकता है। वैज्ञानिक रूप से, बिना किसी केमिकल के भी शव को डीप फ्रीजर में कई हफ्तों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे शरीर के गलने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है। खामेनेई के मामले में भी शायद इसी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है ताकि उनके शरीर को अंतिम विदाई तक सही स्थिति में रखा जा सके।

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धार्मिक परंपरा और मजबूरी का तालमेल

शिया इस्लाम में ‘गुस्ल’ (स्नान) और ‘कफन’ के बाद शव को तुरंत दफनाना जरूरी होता है। लेकिन असाधारण परिस्थितियों में, जैसे कि युद्ध या बड़ी आपदा, नियमों में थोड़ी ढील की गुंजाइश देखी जाती है। धार्मिक गुरुओं के बीच इस बात पर चर्चा हो रही है कि सुरक्षा और सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने के लिए कितना इंतजार करना जायज है। यह देरी मजहबी मान्यताओं और जमीनी हकीकत के बीच के संतुलन को दर्शाती है।



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