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Khamenei Hajj: सऊदी के साथ दुश्मनी की वजह से हज नहीं कर पाए खामेनेई? हर साल जारी करते थे यात्रा के लिए संदेश


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oi-Smita Mugdha

Khamenei Hajj: ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से चले आ रहे कूटनीतिक तनाव रहा है। यह तनाव सिर्फ धार्मिक (शिया बनाम सुन्नी) नहीं था, बल्कि इसका रणनीतिक असर भी था। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई सऊदी से दुश्मनी की वजह से कभी हज यात्रा पर नहीं जा पाए थे। सोशल मीडिया पर कई बार यह दावा किया गया कि सऊदी से दुश्मनी की वजह से उन्होंने मक्का-मदीना की यात्रा नहीं की। हालांकि ऐतिहासिक तथ्य इस दावे से अलग तस्वीर पेश करते हैं।

जानकारी के मुताबिक, अली खामेनेई ने ईरान के सुप्रीम लीडर बनने से पहले हज किया था। धार्मिक शिक्षा और इस्लामी परंपराओं से गहरे जुड़े खामेनेई के लिए हज सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव भी था। सुप्रीम लीडर बनने (1989) से पहले उन्होंने मक्का से मदीना की यात्रा पूरी की थी। इसलिए यह कहना कि उनका हज का सपना अधूरा रह गया, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

Khamenei Hajj

Khamenei Hajj: सुरक्षा कारणों से ईरान के बाहर नहीं जाते थे खामेनेई

– हालांकि, 1989 में सर्वोच्च पद संभालने के बाद क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा कारणों से उनकी व्यक्तिगत यात्राएं सीमित रहीं।

– ईरान-सऊदी संबंधों में उतार-चढ़ाव, खासकर 2015 की भगदड़ और क्राउन प्रिंस के अमेरिका के ओर झुकाव जैसी घटनाओं के बाद दोनों देशों के रिश्ते और तनावपूर्ण हो गए थे। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की सऊदी यात्रा की संभावना और भी कम हो गई।

– ईरान का सुप्रीम लीडर बनने से पहले उन्होंने कई देशों की यात्रा की थी। अपने जीवनकाल में उन्होंने हज भी किया था और इसे इस्लाम का जरूरी फर्ज मानते थे। इसके अलावा, अपने जीवन में सभी इस्लामिक उसूलों को मानते थे।

Khamenei Hajj Yatra: हज के लिए हर साल जारी करते थे संदेश

इसके बावजूद, खामेनेई हर साल हज सीजन शुरू होने से पहले दुनिया भर के मुसलमानों के नाम संदेश जारी करते थे। इन संदेशों में वे हज को इस्लामी एकता, आत्मशुद्धि और वैश्विक मुस्लिम एकजुटता का प्रतीक बताते थे। उनके संदेशों में अक्सर यह अपील होती थी कि हज को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखकर देखा जाए। खामेनेई के लिए हज एक आध्यात्मिक और वैचारिक मंच था, जहां से वे मुस्लिम जगत को संबोधित करते थे। इसके अलावा, खास मौके पर वह सार्वजनिक तौर पर नमाज अदा करने भी आते थे और अजान भी देते थे।

भले ही सुप्रीम लीडर बनने के बाद उन्होंने दोबारा हज न किया हो, लेकिन इस धार्मिक परंपरा से उनका वैचारिक और आध्यात्मिक संबंध लगातार बना रहा। सऊदी से दुश्मनी के कारण उनका हज का सपना अधूरा रह गया, पूरी तरह सही नहीं है। उन्होंने हज किया था और जीवनभर इस यात्रा के महत्व पर जोर देते रहे।



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