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oi-Siddharth Purohit
Khar Island Explained: अमेरिका-ईरान की जंग में ईरान का खार्ग आईलैंड एक बड़ा कीवर्ड बनकर सामने आया है। यहां अमेरिका का लालच और ईरान के हित दोनों साफ-साफ दिखते हैं। लेकिन इस जंग के बाद इस पर किसका कब्जा होगा, इस बारे में एक्सपर्ट्स की राय अलग-अलग है। कई एक्सपर्ट मानते हैं कि ईरान के सख्त रुख और मजबूत जवाबी क्षमता को देखते हुए यह ऑपरेशन कितना सफल नहीं होगा, कुछ कहते हैं कि अमेरिका ऐसा कर सकता है तो वहीं कुछ का मानना है कि कब्जा कर भी लिया तो टिके रहना मुश्किल होगा क्योंकि ईरान भी तो जवाब देगा। आइए इसे आसानी से समझते हैं।
रूस की गलती से सीखे अमेरिका
इस मुद्दे को समझने के लिए एक पुराना उदाहरण दिया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दौर में स्नेक आइलैंड (ज़मीनी द्वीप) को बहुत महत्वपूर्ण माना गया था। फरवरी 2022 में रूस ने इस द्वीप पर कब्जा कर लिया था, लेकिन यूक्रेन के लगातार हमलों के कारण जून 2022 के अंत में उसे इसे छोड़ना पड़ा।

छोटे द्वीप पर कब्जा रखना क्यों मुश्किल होता है?
स्नेक आइलैंड पर कब्जा बनाए रखना रूस के लिए बहुत मुश्किल साबित हुआ। उसे सैनिकों, एयर डिफेंस सिस्टम और सप्लाई जहाजों में भारी नुकसान उठाना पड़ा। आखिरकार रूस को पीछे हटना पड़ा, जो उसके लिए एक तरह से शर्मनाक स्थिति थी। यह उदाहरण ट्रंप की खार्ग द्वीप योजना पर भी सवाल खड़े करता है।
खार्ग द्वीप क्यों है इतना अहम?
स्नेक आइलैंड की तरह ही खार्ग द्वीप भी बेहद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह फारस की खाड़ी में ईरान की मुख्य भूमि से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा 8 किलोमीटर लंबा कोरल द्वीप है। यही से ईरान का ज्यादातर तेल निर्यात होता है, इसलिए इसे देश का सबसे संवेदनशील आर्थिक केंद्र माना जाता है।
हर दिन लाखों बैरल तेल का निर्यात
खार्ग द्वीप से औसतन हर दिन करीब 1.5 मिलियन बैरल तेल निर्यात होता है। लेकिन संभावित हमले के डर से ईरान ने बीच फरवरी से इस निर्यात को बढ़ाकर लगभग 3 मिलियन बैरल प्रति दिन कर दिया था। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट बताती है कि, करीब 18 मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल खार्ग पर बैकअप के तौर पर स्टोर किया गया है।
ट्रंप की योजना की पहली बड़ी समस्या
ट्रंप की योजना में पहली बड़ी दिक्कत यह है कि अगर अमेरिका खार्ग पर कब्जा कर लेता है, तो ईरान का लगभग पूरा तेल निर्यात रुक जाएगा। इससे वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसका असर दुनिया भर पर पड़ेगा और इसका राजनीतिक नुकसान खुद ट्रंप को भी उठाना पड़ सकता है।
दूसरी समस्या: ईरान का आसान जवाब
दूसरी बड़ी समस्या यह है कि अगर अमेरिका खार्ग के इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करना चाहे, तो तेल को ईरान की जमीन से खार्ग तक आना जरूरी होगा। लेकिन ईरान के पास एक आसान तरीका है, वह पाइपलाइन के वाल्व बंद कर सकता है। ऐसा होने पर पूरा अमेरिकी ऑपरेशन बेकार हो जाएगा। इसके बाद खार्ग आईलैंड पर बने रहना एक खाली मैदान में खड़े रहने जैसा होगा।
तीसरी समस्या: कब्जा बनाए रखना होगा मुश्किल
तीसरी चुनौती यह है कि जैसे रूस स्नेक आइलैंड पर अपनी पकड़ नहीं बना पाया, वैसे ही अमेरिका के लिए भी खार्ग पर कंट्रोल बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ईरानी सेना और खाड़ी में मौजूद जहाज लगातार हमले कर सकते हैं, जिससे अमेरिकी सैनिकों को भारी खतरा रहेगा। जितने ज्यादा सैनिक होंगे, ईरान के निशाने उतने ज्यादा लगने की संभावना होगी। साथ ही खार्ग पर अगर ट्रंप का बारूद खत्म हो तो वापस लाने के लिए अलग मशक्कत करना पड़ेगी, जबकि ईरान बिना रुके ताबड़तोड़ हमले जारी रख सकता है। जिसमें अमेरिका जल्दी निशाने पर आता रहेगा और बचने की संभावना कम होगी।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर असर
भौगोलिक नजरिए से देखें तो खार्ग द्वीप काफी अंदर की ओर स्थित है और यह Strait of Hormuz पर सीधा कंट्रोल नहीं देता। उस इलाके में एक शिपिंग एक्सपर्ट के मुताबिक, स्नेक आइलैंड की तरह इसका बड़ा और कई दूसरे कामों में आ सके ऐसा फायदा नहीं है, बल्कि इसकी अहमियत सिर्फ इसके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर तक ही सीमित है।
अमेरिकी सेना की संभावित तैयारी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ऑपरेशन के लिए करीब 5,000 अमेरिकी मरीन और 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 2,000 पैराट्रूपर्स को तैयार रखा गया है। पैराट्रूपर्स हवाई हमले कर सकते हैं, जबकि मरीन समुद्र के रास्ते या स्टीमर और छोटी नावों से उतर सकते हैं।
मिशन कितना खतरनाक हो सकता है?
इस मिशन के दौरान अमेरिकी जहाजों को ईरान के नियंत्रण वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरना होगा, जहां उन्हें दुश्मन की फायरिंग का सामना करना पड़ सकता है। वहीं हवाई लैंडिंग के दौरान भी ईरानी सेना, जहाजों और जमीन से हमले का खतरा रहेगा।
आखिर क्यों मुश्किल है यह ऑपरेशन?
भले ही अमेरिकी सेना शुरुआती हमलों को झेल ले, लेकिन खार्ग द्वीप पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना बेहद कठिन होगा। ईरानी मुख्य भूमि से लगातार हमले होते रहेंगे, जिससे स्थिति रूस के स्नेक आइलैंड जैसे अनुभव की तरह हो सकती है। जहां कब्जा बनाए रखना लगभग नामुमकिन साबित हुआ था।
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