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oi-Sumit Jha
LPG Oil Crisis: पश्चिम एशिया में युद्ध के गहराते बादलों ने भारत की ‘एनर्जी लाइफलाइन’ पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग, ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ में बढ़ते तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा अब दांव पर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री रास्ते के पश्चिमी हिस्से में भारत के झंडे वाले 20 विशाल जहाज फंसे हुए हैं।
इन जहाजों पर कुल 16.7 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल, 3.2 लाख मीट्रिक टन रसोई गैस (LPG) और 2 लाख मीट्रिक टन LNG लदा है। जहाजों पर मौजूद 611 भारतीय नाविकों की सुरक्षा और देश में ईंधन की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार हर पल की निगरानी कर रही है। इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि इन फंसे हुए जहाजों का भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर क्या असर होगा।

Strait of Hormuz oil crisis: भारत की ‘एनर्जी लाइफलाइन’ पर संकट
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारा है, जिससे होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध जैसे हालातों ने इस मार्ग को असुरक्षित बना दिया है। यदि यह मार्ग पूरी तरह बाधित होता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर प्रभावित होगी, जिससे देश के औद्योगिक और घरेलू क्षेत्रों में ईंधन की भारी किल्लत हो सकती है।
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समुद्र में फंसी 2.25 करोड़ परिवारों की रसोई
अगर हम भारत में इस्तेमाल होने वाले मानक घरेलू सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) को आधार मानें, तो गणित कुछ इस प्रकार है
- कुल LPG भार: 3.2 लाख मीट्रिक टन = 32,00,00,000 किलोग्राम (32 करोड़ किलो)
- सिलेंडरों की संख्या: 32,00,00,000/ 14.2= 2.25 करोड़ से ज्यादा घरेलू सिलेंडर
कितने लोगों को मिलेगी राहत?
यह स्टॉक भारत की एक बड़ी आबादी के लिए ‘संजीवनी’ की तरह है:
- करोड़ परिवारों को सीधा फायदा: यदि एक औसत भारतीय परिवार में एक सिलेंडर 30 दिन चलता है, तो यह स्टॉक 2.25 करोड़ परिवारों की एक महीने की जरूरत को अकेले दम पर पूरा कर सकता है।
- उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए अहम: भारत में 10 करोड़ से अधिक उज्ज्वला लाभार्थी हैं। यह स्टॉक उनमें से लगभग 25% परिवारों को संकट के समय राहत पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।
- LNG और कच्चे तेल का महत्व: इसके अलावा जो 2 लाख टन LNG फंसी है, वह हज़ारों कारखानों को चलाने और बिजली पैदा करने के काम आती है। वहीं 16.7 लाख टन कच्चा तेल इतना है कि इससे करोड़ों लीटर पेट्रोल और डीजल बनाया जा सकता है, जो देश की रफ़्तार को थमने नहीं देगा।
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Indian vessels stuck crude oil: 75 करोड़ लीटर पेट्रोल, 110 करोड़ लीटर डीजल
इसके अलावा, 16.7 लाख टन कच्चा तेल इतना ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक, इतने कच्चे तेल को रिफाइन करने पर लगभग 75 करोड़ लीटर पेट्रोल और 110 करोड़ लीटर डीजल तैयार किया जा सकता है। यह ईंधन भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली लाखों कारों, ट्रकों और बसों को कई दिनों तक चलाने के लिए काफी है। यही कारण है कि इन जहाजों का सुरक्षित निकलना भारत की अर्थव्यवस्था और सामान्य जनजीवन की रफ्तार बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
611 नाविकों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता
इन 22 जहाजों पर केवल तेल और गैस ही नहीं, बल्कि 611 भारतीय नाविक भी मौजूद हैं। युद्ध वाले इलाके के करीब होने के कारण इन भारतीयों की जान जोखिम में है। शिपिंग मंत्रालय और विदेश मंत्रालय लगातार इन जहाजों के संपर्क में हैं। भारतीय नौसेना भी स्थिति पर नजर रख रही है ताकि जरूरत पड़ने पर नाविकों को सुरक्षा दी जा सके। सरकार की पहली कोशिश यह है कि इन सभी को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित बाहर निकाला जाए।
आपकी जेब और महंगाई पर कैसे पड़ेगा असर?
अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर आपकी जेब पर होगा। सप्लाई कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे, जिससे भारत में पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं। जब डीजल महंगा होता है, तो ट्रक और मालगाड़ियों का किराया बढ़ जाता है, जिससे फल, सब्जी और अनाज जैसी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। यानी समुद्र में फंसे ये जहाज सीधे तौर पर आपकी रसोई के बजट से जुड़े हैं।
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संकट से निपटने के लिए सरकार का ‘प्लान बी’
भारत सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। पेट्रोलियम मंत्रालय अन्य तेल उत्पादक देशों (जैसे रूस या अमेरिका) से सप्लाई बढ़ाने पर बातचीत कर रहा है ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता थोड़ी कम की जा सके। साथ ही, सरकार अपने ‘रणनीतिक तेल भंडार’ (Strategic Petroleum Reserve) का उपयोग करने पर भी विचार कर रही है। यह भारत का वह इमरजेंसी स्टॉक है जो संकट के समय देश की तेल जरूरतों को कुछ हफ्तों तक पूरा कर सकता है।
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