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 Maoist Ganapathy Surrender: माओवादी ‘गणपति’ का तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण, लाल आतंक की कैसे टूटी कमर?


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Maoist Ganapathy Surrender: केंद्र सरकार के 31 मार्च 2026 तक देश को पूरी तरह ‘नक्सल मुक्त’ बनाने के संकल्प के बीच नक्सली आंदोलन से जुड़ा एक बेहद अहम और निर्णायक घटनाक्रम सामने आया है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पूर्व महासचिव और नक्सल आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ ‘गणपति’ के तेलंगाना पुलिस के संपर्क में आने की खबरों से सुरक्षा एजेंसियों में जबरदस्त हलचल मच गई है।

सूत्रों के मुताबिक, गणपति बढ़ती उम्र और गंभीर बीमारियों के चलते जल्द ही आत्मसमर्पण कर सकते हैं। तेलंगाना पुलिस सूत्रों का कहना है कि करीब चार दशकों तक अंडरग्राउंड रहकर माओवादी हिंसा का नेतृत्व करने वाले 76 वर्षीय गणपति लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं।

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लगातार सिकुड़ते संगठन, सुरक्षाबलों के दबाव और इलाज की जरूरत ने उन्हें मुख्यधारा में लौटने के लिए मजबूर किया है। बताया जा रहा है कि वे फिलहाल किसी गुप्त स्थान पर हैं और नेपाल या किसी शहरी इलाके से पुलिस के संपर्क में हैं। उनके संभावित सरेंडर को लेकर उच्च स्तर पर गोपनीय बातचीत चल रही है।

Who Is Maoist Ganapathy: कौन है मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ ‘गणपति’?

मुप्पला लक्ष्मण राव का जन्म 16 जून 1949 को तेलंगाना के जगतियाल जिले में हुआ था। पढ़ाई के दौरान वे विज्ञान स्नातक और बी.एड योग्यताधारी रहे और शुरुआती दौर में शिक्षक के रूप में भी काम किया। लेकिन 1970-80 के दशक में वे वामपंथी उग्रवाद से जुड़े और धीरे-धीरे नक्सली आंदोलन के सबसे बड़े रणनीतिकार और विचारक बन गए।

साल 2004 में पीपुल्स वॉर और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय के बाद बनी भाकपा (माओवादी) के वे पहले महासचिव बने और 2018 तक इस पद पर रहे। भारत सरकार ने उन पर कुल 3.6 करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। गणपति को देश में माओवादी विचारधारा का सबसे बड़ा स्तंभ और संगठन का ‘ब्रेन’ माना जाता रहा है।

देवजी के बाद गणपति: ताश के पत्तों की तरह ढहा नेतृत्व

यह खबर ऐसे समय में आई है जब महज एक हफ्ते पहले ही माओवादियों के शीर्ष कमांडर और रणनीतिकार थिप्पिरी तिरुपति उर्फ ‘देवजी’ (5 करोड़ का इनामी) और मल्ला राजी रेड्डी ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है।

गणपति का संभावित आत्मसमर्पण नक्सली संगठन के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। हाल के महीनों में शीर्ष कमांडर थिप्पिरी तिरुपति उर्फ ‘देवजी’ और मल्ला राजी रेड्डी जैसे बड़े नेताओं के सरेंडर से पहले ही संगठन नेतृत्व संकट से जूझ रहा है।

हालांकि गणपति ने 2018 में स्वास्थ्य कारणों से महासचिव पद छोड़ा था, लेकिन वे संगठन के वैचारिक मार्गदर्शक बने हुए थे। उनके सरेंडर से नक्सली कैडर का मनोबल बुरी तरह टूट सकता है और बचे-खुचे नेतृत्व में आपसी खींचतान और तेज होने की आशंका है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बाद नक्सली संगठन का केंद्रीय नियंत्रण लगभग खत्म हो जाएगा।

‘Operation Kagar 2026’ और 31 मार्च की डेडलाइन

गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने की स्पष्ट डेडलाइन तय की है। इसी लक्ष्य के तहत सुरक्षाबलों द्वारा ‘ऑपरेशन कगार’ जैसे अभियानों के जरिए नक्सलियों के ठिकानों, जंगलों और सप्लाई नेटवर्क को ध्वस्त किया जा रहा है। साथ ही, NIA और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नक्सलियों के फंडिंग नेटवर्क पर कड़ी कार्रवाई कर उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है।

सुरक्षा बलों ने ‘ऑपरेशन कगार’ के जरिए नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म कर दिया है। NIA और ED द्वारा फाइनेंशियल नेटवर्क को ध्वस्त करने से नक्सलियों के लिए हथियारों और रसद की व्यवस्था करना असंभव हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गणपति का सरेंडर माओवादी आंदोलन के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित होगा।

जब आंदोलन का सबसे बड़ा नेता हथियार डालता है, तो निचले स्तर के कैडरों में लड़ने का जज्बा खत्म हो जाता है। पिछले एक साल में मल्तोजुला वेणुगोपाल उर्फ सोनू और हिडमा के उत्तराधिकारियों के खात्मे या सरेंडर के बाद अब संगठन चलाने के लिए कोई प्रभावी ‘पोलित ब्यूरो’ सदस्य नहीं बचा है।



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