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बीएमआई की रिपोर्ट: पश्चिम एशिया की जंग का भारत पर असर, निवेश-जीडीपी और खपत पर कितना बढ़ेगा दबाव? जानिए सबकुछ


पश्चिम एशिया में युद्ध जारी रहने से भारत में निवेश और जीडीपी पर नकारात्मक असर पड़ेगा। साथ ही, यह युद्ध यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों से मिलने वाले सकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक प्रभावित कर सकता है। फिच समूह की इकाई बीएमआई ने मंगलवार को जारी इंडिया आउटलुक रिपोर्ट में कहा कि पश्चिम एशिया में युद्ध जारी रहने से निवेश धारणा प्रभावित हो सकती है, जिसके चलते मार्च से अनिश्चितता में तेज बढ़ोतरी होने की आशंका है। अपनी जरूरतों का करीब 88 फीसदी क्रूड आयात करने वाले भारत में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे देश के आयात बिल में इजाफा होगा और ईंधन महंगाई पर दबाव बढ़ेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत क्रूड जरूरतों के लिए आयात पर अधिक निर्भर है और देश होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से अपनी आवश्यकता का करीब आधा कच्चा तेल मंगाता है। अगर इस मार्ग से आपूर्ति में बाधा आई, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे आम आदमी और कंपनियों पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, अधिक व्यापार घाटा और ज्यादा महंगाई से आमतौर पर खपत एवं निवेश प्रभावित होगा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी बड़ा झटका लग सकता है।

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कच्चे तेल में 10 फीसदी की तेजी से 0.6 फीसदी तक घट जाएगी जीडीपी

बीएमआई ने रिपोर्ट में कहा, अगर ईरान संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी की बढ़ोतरी होती है, तो इससे भारत के जीडीपी पर करीब 0.3 से 0.6 फीसदी तक का नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, दक्षिण एशिया जैसे शुद्ध तेल आयातक देशों पर भी इस संकट का अधिक प्रभाव पड़ने का अनुमान है। शोध एवं विश्लेषण इकाई बीएमआई ने अगले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7 फीसदी पर बरकरार रखा है, जो चालू वित्त वर्ष के लिए अनुमानित 7.9 फीसदी से कम है।

जहाजों को चुकाना होगा अधिक बीमा प्रीमियम- विशेषज्ञ

पश्चिम एशिया में संघर्ष के बीच अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरने पर मालवाहक जहाजों को अब अतिरिक्त बीमा प्रीमियम चुकाना होगा। पॉलिसीबाजार के प्रमुख (समुद्री बीमा) बालसुंदरम आर ने कहा, कच्चे तेल और एलएनजी के परिवहन में शामिल शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) के जहाजों की लाल सागर जैसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों से गुजरने पर युद्ध जोखिम कवरेज हासिल करने पर लागत बढ़ सकती है। इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के हरि राधाकृष्णन ने कहा, कुछ मामलों में प्रीमियम दर 0.25–0.5 फीसदी से बढ़कर लगभग एक फीसदी तक पहुंच गई हैं। इससे ढुलाई लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और वैश्विक व्यापार प्रवाह पर असर पड़ेगा।

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बीमा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने क्या कहा?

बीमा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कहा कि युद्ध जोखिम एवं हड़ताल, दंगे और नागरिक अशांति कवर के लिए बीमा कंपनियां आमतौर पर तीन से सात दिन के नोटिस पर कवरेज रद्द कर सकती हैं। बीमा कवरेज रद्द होने के बाद नया युद्ध जोखिम कवर उपलब्ध भी होता है, तो उसकी कीमत काफी अधिक हो सकती है। प्रूडेंट इंश्योरेंस ब्रोकर्स के गौरव अग्रवाल ने कहा, जहाज पर युद्ध कवरेज रद्द करने का नोटिस जारी किया गया है। मालवाहक बीमा पर भी जल्द ऐसा कदम उठाया जा सकता है।



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Aaj Ka Panchang: आज का पंचांग, 04 मार्च 2026, बुधवार



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जंग के बीच ईरान में फंसा उत्तराखंड का परिवार: पिता बोले- 2 दिन से बेटे का फोन बंद, सरकार कैसे भी हमारे बच्चों को वापस लाए – Dehradun News




अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान में जारी युद्ध ने हजारों किलोमीटर दूर उत्तराखंड के विकासनगर में एक घर की धड़कनें रोक दी हैं। मिसाइलों और फाइटर जेट की गूंज के बीच ईरान के कुम शहर में रह रहे अली हैदर (23) और उनकी पत्नी नूरजहां (21) से पिछले दो दिनों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। फोन की घंटी न बजना अब इस परिवार के लिए सबसे बड़ा डर बन चुका है। दैनिक भास्कर एप की टीम जब ग्राम पंचायत अंबाडी, विकासनगर स्थित उनके घर पहुंची तो वहां बेचैनी, इंतजार और दुआओं का माहौल था। तेहरान से 150 KM दूर कुम में रहते हैं अली-नूरजहां अली हैदर 2022 से ईरान के एक इस्लामिक विश्वविद्यालय में फारसी और उर्दू की पढ़ाई कर रहे हैं। सितंबर में उनका निकाह कारगिल की रहने वाली नूरजहां से हुआ था और शादी के बाद पत्नी भी उनके साथ ईरान चली गईं। परिवार के मुताबिक, वे तेहरान से करीब 150 किलोमीटर दूर कुम शहर में रह रहे हैं। आसमान में फाइटर जेट और मिसाइलों की आवाज अली के पिता शेर अली खान (57), जो पेशे से स्कूल बस ड्राइवर हैं, अभी भी ड्यूटी कर रहे हैं, लेकिन चेहरे पर साफ चिंता झलकती है। वे बताते हैं कि 1 मार्च को बड़े बेटे के फोन पर अली से करीब पांच मिनट की अंतरराष्ट्रीय कॉल पर बात हुई थी। उसने कहा कि हालात बहुत खराब हैं। आसमान में फाइटर जेट और मिसाइलों की आवाज साफ सुनाई दे रही है। उसके बाद से कोई कॉल नहीं आया। दो दिन से फोन बंद है। हर बार मोबाइल की स्क्रीन जलती है तो उम्मीद जगती है, लेकिन कॉल नहीं आता। मां रुखसाना की आंखों में डर, दिल में दुआ अली की मां रुखसाना (48) ने कहा कि जब से युद्ध शुरू हुआ है, तब से दिल घबराया हुआ है। दो दिन से बेटे से कोई संपर्क नहीं है। बस यही सोचते हैं कि वहां कैसे होंगे। वे बताती हैं कि बेटे का निकाह सितंबर में हुआ था। जून में भी एक बार एडवाइजरी जारी होने पर वह अचानक भारत आया था, लेकिन इस बार हालात बिगड़ने से पहले वह नहीं आ सका। हमें क्या पता था कि जंग छिड़ जाएगी… सब सामान्य था, मां की आवाज कांप जाती है। एलआईयू ने मांगे दस्तावेज अली 3 भाइयों में सबसे छोटा है और उससे छोटी एक बहन भी है। सबसे बड़े भाई शेखर अली, जो विकासनगर में लॉजिस्टिक का काम करते हैं, बताते हैं कि 1 मार्च को रात 11:30 बजे आखिरी बार भाई से बात हुई थी। बड़े भाई शेखर अली कहते हैं कि उसके बाद से कोई संपर्क नहीं है। 2 मार्च को विकासनगर एलआईयू ने हमसे संपर्क किया और पासपोर्ट नंबर, ईरान में पता जैसी जानकारी मांगी है। परिवार को उम्मीद है कि प्रशासनिक स्तर पर कोई मदद मिल सकेगी। मोदी सरकार हमारे बच्चों को सुरक्षित लाए-पिता की गुहार
बेबस पिता शेर अली खान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाते हैं कि बस किसी तरह हमारे बच्चों को सही-सलामत भारत ले आइए। हम और कुछ नहीं चाहते। उनकी यह अपील सिर्फ उनके घर तक सीमित नहीं है। ईरान के अलग-अलग शहरों में रह रहे भारतीय छात्रों और कामगारों के परिवारों की चिंता भी कुछ ऐसी ही है। हर घर में एक ही सवाल है क्या वे सुरक्षित हैं। हर बीतता मिनट भारी
घर के आंगन में खामोशी पसरी है। मोबाइल फोन चार्ज पर लगा है, नेटवर्क बार-बार चेक हो रहा है। भाभी यास्मीन बताती हैं कि अली सितंबर में भारत आया था। हमें अंदेशा भी नहीं था कि हालात इतने बिगड़ जाएंगे। अब बस एक कॉल का इंतजार है। जंग की खबरें लगातार सोशल मीडिया पर चल रही हैं, लेकिन इस घर में सबसे बड़ी खबर वही होगी। जब फोन बजेगा और उधर से अली की आवाज आएगी कि ‘अब्बू, हम ठीक हैं।’



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पहाड़ों पर 15 दिन की बारिश मचा सकती है तबाही: उत्तराखंड के दून विश्वविद्यालय और 6 अन्य संस्थानों के शोध में खुलासा, साइलेंट डिजास्टर का खतरा – Dehradun News




पहाड़ों में आपदा का मतलब अक्सर बादल फटना या तेज मूसलाधार बारिश माना जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिक शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि लगातार कई दिनों तक होने वाली हल्की बारिश भी बड़े खतरे की वजह बन सकती है। ताज़ा अध्ययन में सामने आया है कि धीमी लेकिन लगातार वर्षा पहाड़ों पर जमा मलबे को अस्थिर कर देती है और यही मलबा बाद में जानलेवा रूप ले सकता है। दून विश्वविद्यालय ने देश के छह अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर यह शोध किया है। अध्ययन के मुताबिक, अगर पहाड़ी क्षेत्रों में 15 से 30 दिनों तक रोजाना औसतन 6 से 7 मिलीमीटर वर्षा होती रहे, तो ढलानों पर जमा मलबा पानी सोखकर अत्यधिक भारी और अस्थिर हो जाता है। वैज्ञानिक शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी से संतृप्त मलबा लगभग 60 किलोपास्कल का दबाव बनाते हुए अचानक खिसक सकता है। इसकी रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति सेकेंड तक दर्ज की गई है, जो नीचे बसे गांवों और बस्तियों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। हर साल बढ़ रही आपदाओं की संख्या
उत्तराखंड में औसतन हर वर्ष करीब 1900 से अधिक आपदाएं दर्ज की जाती हैं। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 2100 से अधिक हो गई। इन घटनाओं में 263 लोगों की जान चली गई। आंकड़े संकेत देते हैं कि आपदाएं अब असामान्य नहीं रहीं, बल्कि एक नियमित और बढ़ती हुई चुनौती बन चुकी हैं। धराली बना चेतावनी का प्रतीक
बीते साल 5 अगस्त को धराली में आई आपदा इसका हालिया और भयावह उदाहरण है। यह पूरे एक महीने की लगातार बारिश का परिणाम थी। पांच जुलाई से पांच अगस्त के बीच इस क्षेत्र में 195 मिमी बारिश दर्ज की गई। धीरे-धीरे हुई इस वर्षा ने पहाड़ियों पर जमा मलबे को पानी से भर दिया। बाद में जब यह मलबा खीरगंगा के बहाव के साथ नीचे आया, तो उसने भारी तबाही मचा दी। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह घटना बताती है कि हल्की वर्षा भी अगर लंबी अवधि तक जारी रहे तो उसका प्रभाव बेहद गंभीर हो सकता है। एक दिन की बारिश नहीं, 30 दिन का असर
शोध में स्पष्ट किया गया है कि 5 अगस्त को कोई अत्यधिक बारिश दर्ज नहीं हुई थी। असली कारण पिछले 30 दिनों में हुई लगभग 195 मिमी संचयी वर्षा थी। इस लगातार वर्षा ने ग्लेशियर और भूस्खलन से जमा ढीले मलबे को पूरी तरह संतृप्त कर दिया, जिससे अचानक मलबा सैलाब आया। मलबे की पहचान और निगरानी जरूरी
शोध रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राज्य की प्रमुख नदियों, ग्लेशियरों के मुहानों, नाले-धारों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जमा मलबे की मैपिंग की जाए। सेडिमेंट सोर्स मैपिंग को जरूरी बनाया जाए ताकि मलबे के स्रोतों की निरंतर पहचान और निगरानी हो सके। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने सरकार की आपदा प्रबंधन नीतियों में क्वांटिटेटिव हैजार्ड साइंस को शामिल करने की सिफारिश की है, जिससे जोखिम का वैज्ञानिक आकलन कर समय रहते प्रभावी रिजल्ट लिए जा सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संवेदनशील इलाकों में पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित किया जाए और मलबे के निस्तारण की ठोस व्यवस्था बनाई जाए, तो निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। लगातार बारिश भी बनती है बड़ी समस्या
दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ. विपिन कुमार ने बताया कि यह अध्ययन कई संस्थानों ने मिलकर किया है और इसके निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि जिन पहाड़ी नालों को स्थानीय भाषा में ‘गदेरे’ कहा जाता है, उनमें वर्षों से मलबा जमा होता रहता है। यह प्रक्रिया धीमी जरूर है, लेकिन लगातार चलती रहती है। उन्होंने कहा कि जब पहाड़ों में लगातार थोड़ी-थोड़ी बारिश होती रहती है तो इस जमा मलबे के भीतर मौजूद बेहद महीन मटीरियल धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकने लगता है। इससे ऊपर मौजूद बड़े-बड़े बोल्डर अस्थिर हो जाते हैं। जैसे ही उनका संतुलन बिगड़ता है, पूरा मलबा नीचे की ओर आना शुरू हो जाता है। यही स्थिति आगे चलकर गंभीर आपदा का कारण बनती है। उन्होंने बताया कि धराली में हुई घटना भी इसी तरह की प्रक्रिया का परिणाम थी। घटना से तकरीबन 30 दिन पहले उस क्षेत्र में लगभग 195 एमएम बारिश दर्ज की गई थी। यह मात्रा इस प्रकार के जमा मलबे को अस्थिर करने के लिए पर्याप्त थी। यह बारिश एक साथ नहीं हुई, बल्कि मल्टीपल एपिसोड्स में हुई। यानी रुक-रुक कर अलग-अलग चरणों में पानी गिरता रहा, जिससे मलबे के भीतर धीरे-धीरे बदलाव आता गया। बेहद महीन मटीरियल लगातार इकट्ठा होता
डॉ. विपिन कुमार ने कहा कि पहाड़ी बसावट के स्वरूप पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि पहाड़ों में अधिकांश आबादी या तो नदी किनारे बसती है या फिर बाढ़ वाले मैदानी क्षेत्रों में। ऐसे इलाके स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होते हैं। जहां-जहां गदेरे मुख्य नदी से मिलते हैं और जहां बेहद महीन मटीरियल लगातार इकट्ठा होता रहता है, वहां इस तरह की घटनाएं बेहद सामान्य मानी जाती हैं। शोध में यह भी सामने आया कि 2011 में धराली में 89 पक्के ढांचे थे, जो 2025 तक बढ़कर 160 हो गए यानी लगभग दोगुनी वृद्धि। 2013 की आपदा के बाद चेतावनियों के बावजूद नदी तट और एल्यूवियल फेन (alluvial fan) में निर्माण जारी रहा। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल करंट साइंस (Current Science) में प्रकाशित हुआ है।

उत्तराखंड के पहाड़ों में अब खतरा सिर्फ तेज बारिश से नहीं, बल्कि लगातार गिरती हल्की बूंदों से भी है। यह ‘धीमी आपदा’ भविष्य में और गंभीर रूप ले सकती है, अगर समय रहते वैज्ञानिक चेतावनियों को नीति और जमीन पर लागू नहीं किया गया। ————————– ये खबर भी पढ़ें… देहरादून में बिल्डिंग-कॉलोनियों ने रोकी ठंडी हवा:रिपोर्ट में चेतावनी, परत कमजोर होने से हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ा; रात के तापमान में 6°C का अंतर देहरादून की ठंडी रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण बिल्डिंग और कॉलोनियों के फैलाव ने ठंडी हवा का रास्ता रोक दिया है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक शहर के शहरी इलाकों में रात का तापमान आसपास के ग्रामीण और जंगल वाले क्षेत्रों से 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया गया। (पढ़ें पूरी खबर)



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PM Kisan Yojana: बटाईदारों को भी मिलेंगे पीएम किसान के 2000 रुपये? 22वीं किस्त से पहले समझ लें नियम


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PM Kisan Yojana: देश के करोड़ों अन्नदाता हर चार महीने में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) की अगली किस्त का बेसब्री से इंतजार करते हैं। खेती की बढ़ती लागत, महंगे बीज और खाद के खर्च के बीच सरकार द्वारा दी जाने वाली 2-2 हजार रुपये की यह मदद छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसी बड़े संबल से कम नहीं है।

हालांकि, ग्रामीण इलाकों में अक्सर एक बड़ा सवाल चर्चा का विषय बना रहता है कि क्या वे किसान भी इस योजना के पात्र हैं, जो अपनी जमीन के बजाय दूसरों के खेतों को ‘बटाई’ या पट्टे पर लेकर खेती करते हैं? चूंकि गांवों में भूमिहीन किसानों की एक बड़ी आबादी बटाई पर ही निर्भर है, इसलिए इसे लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि केंद्र सरकार के मौजूदा दिशा-निर्देश इस बारे में क्या कहते हैं और किन शर्तों को पूरा करने पर ही यह राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है।

PM Kisan Yojana

PM Kisan: क्या है पीएम किसान योजना का मुख्य उद्देश्य?

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना केंद्र सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत पात्र किसान परिवारों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। यह राशि 2,000 रुपये की तीन समान किस्तों में सीधे किसानों के आधार-लिंक्ड बैंक खातों में भेजी जाती है। अब तक सरकार सफलतापूर्वक 21 किस्तें जारी कर चुकी है, जिससे देशभर के करोड़ों किसानों को अपनी कृषि संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली है।

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PM Kisan: पात्रता के लिए सबसे बड़ी शर्त, ‘लैंड होल्डिंग’

इस योजना का लाभ लेने के लिए सरकार ने कुछ कड़े और स्पष्ट नियम तय किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण शर्त जमीन का मालिकाना हक (Land Ownership) है।

राजस्व रिकॉर्ड: योजना के लाभार्थियों की पहचान उनके आधिकारिक भू-राजस्व रिकॉर्ड (Land Records) के आधार पर की जाती है।

नाम दर्ज होना अनिवार्य: केवल वही किसान इस योजना का लाभ पाने के हकदार हैं, जिनके नाम पर राज्य के राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में खेती योग्य भूमि दर्ज है।

अन्य औपचारिकताएं: पात्र होने के लिए किसान का बैंक खाता आधार से लिंक होना, ई-केवाईसी (e-KYC) प्रक्रिया पूर्ण होना और भूमि का नामांतरण (Mutation) अपडेट होना अनिवार्य है।

PM Kisan Yojana: बटाईदार किसानों के लिए क्या है कानूनी स्थिति?

गांवों में एक बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है जो ‘बटाई’ पर खेती करते हैं। ये किसान मेहनत तो पूरी करते हैं और फसल का एक तय हिस्सा या किराया जमीन मालिक को देते हैं, लेकिन कानूनी रूप से उस जमीन के मालिक नहीं होते।

जमीन के बिना लाभ नहीं: मौजूदा सरकारी नियमों के मुताबिक, जिन किसानों के पास अपनी कोई खेती योग्य जमीन नहीं है और वे पूरी तरह बटाई पर निर्भर हैं, उन्हें पीएम किसान योजना का लाभ नहीं मिलता है।

अपवाद की स्थिति: यदि कोई किसान किसी दूसरे की जमीन बटाई पर जोत रहा है, लेकिन उसके पास खुद के नाम पर भी थोड़ी-बहुत खेती योग्य जमीन दर्ज है, तो वह अपनी उस निजी जमीन के आधार पर योजना के लिए आवेदन कर सकता है।

जमीन मालिक को लाभ: बटाई की स्थिति में योजना का लाभ उस व्यक्ति को मिलता है जिसके नाम पर जमीन का कागज (खतौनी) है, न कि उसे जो उस पर वास्तव में हल चला रहा है।

भ्रामक खबरों और अफवाहों से रहें सावधान

अक्सर सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर ऐसी खबरें वायरल होती हैं कि सरकार अब बटाईदार किसानों या भूमिहीन मजदूरों को भी इस योजना में शामिल करने जा रही है। आधिकारिक तौर पर अभी तक सरकार ने ऐसा कोई बदलाव नहीं किया है। बिना वैध भूमि दस्तावेजों के योजना का लाभ लेने का दावा करने वाली सभी खबरें निराधार हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे केवल आधिकारिक पोर्टल pmkisan.gov.in पर दी गई जानकारी पर ही भरोसा करें।

With AI Inputs

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देशभर में होली पर रंगों की धूम, PHOTOs: राजस्थान में विदेशी मेहमानों ने उड़ाया रंग-गुलाल; अखिलेश यादव ने मनोज तिवारी पर वीडियो सॉन्ग बनाया



01:45 AM4 मार्च 2026

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होली से जुड़ी 5 मान्यताएं…

वसंतोत्सव: ऋतु बदलने का उत्सव होली पहले वसंतोत्सव के तौर पर मनाई जाती थी, क्योंकि फाल्गुन-पूर्णिमा के आसपास ठंड विदा होती है और वसंत का रंग दिखने लगते हैं। 7वीं सदी में सम्राट हर्ष के नाटक रत्नावली में इसका जिक्र है वसंत के मौके पर दरबारी उत्सव, संगीत और सांस्कृतिक आयोजन करते थे। वसंतोत्सव मनाने की ये परंपरा तब से चली आ रही है। अब ये उत्सव लोकजीवन में उतरकर अबीर-गुलाल और रंगों की होली में बदल गया।

दोलयात्रा: राधा-कृष्ण को झूले पर विराजित करने की परंपरा पूर्वी भारत और वैष्णव परंपराओं में होली का बड़ा रूप दोलयात्रा या दोल पूर्णिमा है। इस परंपरा में राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सजाकर झूले या पालकी पर निकाला जाता है। उन पर अबीर-गुलाल चढ़ाया जाता है और कीर्तन-उत्सव होता है। ओडिशा की सरकारी जानकारी के मुताबिक यह उत्सव फाल्गुन महीने की दशमी से दोल पूर्णिमा तक चलता है। बंगाल-ओडिशा क्षेत्र में, यही दिन चैतन्य महाप्रभु की जयंती से भी जुड़ गया। ये पहले वैष्णव झूला-उत्सव था। बाद में रंगों वाली होली से जुड़ गया।

राधा-कृष्ण फाग: प्रेम, रंग और लीला की होली ब्रज क्षेत्र में होली की सबसे बड़ी दूसरी मान्यता राधा-कृष्ण की फाग-लीला है। वैष्णव ग्रंथ गर्ग संहिता में होलिकोत्सव के बारे में लिखा गया है। जिसमें राधा और सखियों के साथ उत्सव का जिक्र है। इसी वजह से मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव की होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि कृष्ण-भक्ति, फाग-गायन और लीलाओं को याद करने का उत्सव मानी जाती है। बाद में यही परंपरा लोकहोली में बदल गई। जहां मंदिर की रंग-सेवा से आगे बढ़कर गांव-शहर की सामूहिक होली बनी।

किसानों का त्योहार: नई फसल और रबी सीजन का उल्लास होली को लंबे समय से फसल और खेती से भी जोड़ा जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार होली वसंत और फसल का उत्सव है। पहले इस त्योहार का रूप खेती पर आधारित था। इसमें किसान होलिका दहन में गेहूं की बालियां, नई उपज चढ़ाते थे और पूरा गांव नई फसल का उत्सव मनाता था। बाद में इसमें रंग, गुलाल और दूसरे धार्मिक-सांस्कृतिक रूप भी जुड़ते गए।

रिश्ते सुधारने का पर्व: बुरा न मानो होली है अमेरीका, ऑस्ट्रेलिया और स्कॉटलेंड के एंथ्रोपॉलॉजिस्ट ने अपनी स्टडी और रिसर्च में बताया कि भारत में होली ऐसा त्योहार है, जिसमें लोग पुराने विवाद और मनमुटाव को भूलकर त्योहार मनाते हैं। हालांकि बाद में रिश्तों और समाज कर कड़वाहट और तनाव फिर से वैसा ही हो जाता है। अमेरिकी एंथ्रोपॉलॉजिस्ट मैककिम मैरियट, ऑस्ट्रेलिया के डी. बी. मिलर और स्कॉटलेंड के विक्टर टर्नर के अनुसार भारत में होली पुरानी कड़वाहट कम करने, लोगों को करीब लाने और रिश्तों में नई शुरुआत करने का पर्व है।



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MP-राजस्थान में गर्मी का असर तेज: कई जिलों में पारा 35°C के पार; हिमाचल के 4 शहरों में तापमान 30°C हुआ


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भोपाल/लखनऊ/शिमला/देहरादून7 घंटे पहले

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देशभर में मौसम दो अलग-अलग रंग दिखा रहा है। पहाड़ी राज्यों में जहां एक बार फिर बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी के आसार बन रहे हैं, वहीं मध्य और उत्तर भारत के मैदानी हिस्सों में गर्मी ने रफ्तार पकड़ ली है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी तेज धूप के कारण दिन के तापमान में उछाल आया है। कई शहरों में पारा 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। मार्च के पहले पखवाड़े में तापमान में और इजाफा देखने को मिल सकता है, हालांकि पहाड़ी इलाकों में पश्चिमी विक्षोभ के असर से बीच-बीच में मौसम में बदलाव बना रहेगा।

उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दिन के साथ-साथ अब रात का तापमान भी बढ़ने लगा है। राजस्थान के पश्चिमी जिलों में गर्म हवाएं चलने लगी हैं और न्यूनतम तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर दर्ज हो रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम विभाग ने हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई है।

उत्तराखंड के गंगोत्री में न्यूनतम तापमान -13°C, बद्रीनाथ में -11°C, हेमकुंड -12°C और हर्षिल -10°C दर्ज किया जा रहा है, जबकि मुनस्यारी में पारा -21°C तक गिर गया है। मौसम विभाग ने सिक्किम, गुजरात और गोवा में कोहरे की संभावना जताई है।

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अगले 2 दिन मौसम का हाल…

5-6 मार्च- जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश में बारिश-बर्फबारी की संभावना।

मध्य प्रदेश: MP के 25 जिलों में तापमान 33°C के पार, मालवा-निमाड़ सबसे गर्म; होली पर गर्म रहेंगे भोपाल-इंदौर

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मार्च की शुरुआत में ही मध्य प्रदेश में गर्मी असर दिखाने लगी है। खासकर मालवा-निमाड़ यानी, इंदौर और उज्जैन संभाग के जिलों में दिन का टेम्पेरेचर बढ़ रहा है। मंगलवार को प्रदेश के 35 जिलों में अधिकतम तापमान 33 डिग्री के पार पहुंच गया। इनमें धार, नर्मदापुरम, खरगोन, खंडवा और रतलाम सबसे गर्म रहे। पूरी खबर पढ़े…

राजस्थान: टेम्परेचर 38°C से ऊपर पहुंचा, दिन-रात में सामान्य से ज्यादा तापमान

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राजस्थान में गर्मी बढ़ती जा रही है। मंगलवार को राज्य के कई शहरों का अधिकतम तापमान 35°C से ऊपर दर्ज हुआ। पश्चिमी जिलों में तो दिन में झुलसाने वाली गर्मी रही। बाड़मेर में अधिकतम तापमान 38°C के पार चला गया। न्यूनतम तापमान में मामूली गिरावट होने से मंगलवार रात में कुछ शहरों में हल्की ठंडक रही, लेकिन तापमान सामान्य से ज्यादा रहा। पूरी खबर पढ़ें…

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खबरें और भी हैं…



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MP-राजस्थान में गर्मी का असर तेज: कई जिलों में पारा 35°C के पार; हिमाचल के 4 शहरों में तापमान 30°C हुआ


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भोपाल/लखनऊ/शिमला/देहरादून16 मिनट पहले

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देशभर में मौसम दो अलग-अलग रंग दिखा रहा है। पहाड़ी राज्यों में जहां एक बार फिर बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी के आसार बन रहे हैं, वहीं मध्य और उत्तर भारत के मैदानी हिस्सों में गर्मी ने रफ्तार पकड़ ली है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी तेज धूप के कारण दिन के तापमान में उछाल आया है। कई शहरों में पारा 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। मार्च के पहले पखवाड़े में तापमान में और इजाफा देखने को मिल सकता है, हालांकि पहाड़ी इलाकों में पश्चिमी विक्षोभ के असर से बीच-बीच में मौसम में बदलाव बना रहेगा।

उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दिन के साथ-साथ अब रात का तापमान भी बढ़ने लगा है। राजस्थान के पश्चिमी जिलों में गर्म हवाएं चलने लगी हैं और न्यूनतम तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर दर्ज हो रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम विभाग ने हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई है।

उत्तराखंड के गंगोत्री में न्यूनतम तापमान -13°C, बद्रीनाथ में -11°C, हेमकुंड -12°C और हर्षिल -10°C दर्ज किया जा रहा है, जबकि मुनस्यारी में पारा -21°C तक गिर गया है। मौसम विभाग ने सिक्किम, गुजरात और गोवा में कोहरे की संभावना जताई है।

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अगले 2 दिन मौसम का हाल…

5-6 मार्च- जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश में बारिश-बर्फबारी की संभावना।

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हरियाणा में नौल्था की डाट होली: कढ़ाहों में पकाया रंग, महिलाओं ने छतों से फेंका, पूरा दिन चली टोलियों की मस्ती; धूमधाम से निकाली झांकी – Panipat News


पानीपत4 घंटे पहलेलेखक: अमन वर्मा

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पानीपत के नौल्था गांव में बुधवार को होली खेलते फाग कमेटी के सदस्य।

हरियाणा के पानीपत में 909वीं ऐतिहासिक डाट होली मनाई गई। नौल्था की होली साल 1288 से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है। इसके लिए कई दिन से तैयारी शुरू हो जाती है। बड़े-बड़े कढ़ाहों में रंग पका लिया गया था।

आज बुधवार को फाग के दिन युवाओं की टोली जैसे ही गलियों से निकली, उन पर महिलाओं ने छतों से रंग फेंका। पूरा दिन इसी तरह मस्ती चली। इस दौरान गांव में झांकी भी निकाली गई।

बता दें कि युवकों की टोलियां हाथ ऊपर कर अपने सीने से एक दूसरे को पीछे धकेलती हैं। इस जोर आजमाइश में जो गिर जाता है या पीछे हट जाता है, उसे हार माननी पड़ती है। 15 दिन पहले ही 6 मोहल्लों के युवक इसकी प्रैक्टिस करना शुरू कर देते हैं। यह प्रैक्टिस भी मोहल्ला बदल-बदलकर की जाती है।

ग्रामीणों के अनुसार, अंग्रेजों के शासनकाल में होली के समय गांव के एक युवक की मौत हो गई थी। इस पुरानी परंपरा को टूटने से बचाने के लिए युवक के पिता ने बाल्टी में रंग भरकर अपनी बेटी की अर्थी पर डाल दिया था।

ढोल की थाप पर डांस करते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य

ढोल की थाप पर डांस करते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य

11 बजे के बाद शुरू हुई डाट होली

नौल्था फाग कमेटी के मेंबर कैलाश चंद ने बताया कि नौल्थ की होली पूरे देश में मशहूर है। 3 मार्च को गांव में फ्लैग मार्च निकाला गया था, ताकि भाईचारा बना रहे। ग्रामीणों को कहा गया है कि वह सुबह 11 बजे से पहले अपने काम निपटा लें, इसके बाद गांव की गलियों में डाट होली खेली जाएगी। आज तय समय पर होली शुरू हुई।

गांव में झांकी निकालते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य।

गांव में झांकी निकालते नौल्था फाग कमेटी के सदस्य।

अब जानिए क्या है डाट होली, इसकी कैसे शुरुआत हुई….

लाठे वाले बाबा ने शुरू की थी परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार, बाबा लाठे वाले 909 साल पहले फाग के दौरान मथुरा के दाऊजी गांव गए थे। वहां फाग (धुलंडी) उत्सव में लोगों का आपसी प्रेम और भाईचारा देख कर प्रभावित हुए। उन्होंने गांव आकर उत्सव को मनाने का फैसला लिया और तभी से नौल्था में हर साल डाट होली उत्सव मनाया जा रहा है। गांव के लोग इस ऐतिहासिक परंपरा के लिए अंग्रेजों तक से लोहा ले चुके हैं। नौल्था गांव की आबादी करीब 15 हजार है और पूरा गांव जहां रंगों में सराबोर होकर होली खेलता है, यहां की ऐतिहासिक होली को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और इसमें भाग लेते हैं।

गांव में झांकियां निकलती हैं

सुबह सबसे पहले देवर-भाभी के बीच होली खेली जाती है। इसके बाद गांव में विभिन्न तरह की झांकियां निकलती हैं। इसमें बाबा लाठे वाली की झांकी सबसे पहले निकलती है। दूसरे नंबर पर गौमाता की झांकी होती है। एक के बाद एक कुल 12 से 15 धार्मिक झांकियां निकाली जाती हैं।

नौल्था गांव में एक दूसरे को धकेलने की प्रैक्टिस करते युवक। यह रिहर्सल 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है।

नौल्था गांव में एक दूसरे को धकेलने की प्रैक्टिस करते युवक। यह रिहर्सल 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है।

जो टीम गिर गई, वो हारी

झांकियां निकालने के बाद दोपहर को गांव की सभी 6 चौपालों में बड़े-बड़े कढ़ाहों में बाजारों से लाया रंग पकाया जाता है। ये कढ़ाहे गांवों के ही होते हैं। रंगों को पकाने के लिए गर्म किया जाता है। कुछ ही देर बाद रंग पक जाते हैं और फिर गांव में डाट होली का उत्सव शुरू होता है। दो टोलियां एक-दूसरे के सामने हो जाती हैं। महिलाएं छतों गर्म रंग डालती हैं। जो टोली, दूसरी टोली को पीछे धकेल देती है, वो जीत जाती है।

बेटे की मौत पर भी टूटने नहीं दी थी परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार अंग्रेजों के समय में गांव में एक धूमन जैलदार होता था, जिसका एक बेटा सरदारा था। गांव में होली की पूरी तैयारी थी, लेकिन उसी समय धूमन के बेटे की मौत हो गई। गांव में शोक था और किसी ने होली नहीं खेली। धूमन ने गांव की परंपरा टूटती देखी तो चौपाल से एक बाल्टी रंग की भरी और बेटे की अर्थी पर डाल दी। सभी गांव वालों को कहा कि भगवान की मर्जी से आना-जाना होता है। त्योहार भुलाए नहीं जा सकते।

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