तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए राज्यभर में 1,200 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकदी, सोना-चांदी, फ्रीबीज, शराब और ड्रग्स जब्त किए हैं। इसमें ₹169.85 करोड़ कैश, ₹650.87 करोड़ के सोना-चांदी शामिल हैं। वहीं महिला आरक्षण बिल को लेकर 18 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश को संबोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 700 से अधिक नागरिकों ने चुनाव आयोग को लेटर लिखकर इसे आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन बताया है। लेटर लिखने वालों में पूर्व ब्यूरोक्रेट्स, एक्टिविस्ट और पत्रकार शामिल हैं। शिकायत में कहा गया है कि यह संबोधन दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुआ, जो चुनाव के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रचार के समान है। साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर इस प्रसारण को अनुमति दी गई थी, तो अन्य राजनीतिक दलों को भी समान समय दिया जाना चाहिए। चुनाव से जुड़े 3 अपडेट्स…
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तमिलनाडु में ₹1,200 करोड़+ के कैश-गोल्ड और फ्रीबीज जब्त: PM मोदी पर आचार संहिता उल्लंघन का आरोप, चुनाव आयोग को 700 नागरिकों ने लेटर लिखा
एपल को मिला नया सीईओ: टिम कुक पद से देंगे इस्तीफा, कंपनी के हार्डवेयर प्रमुख जॉन टर्नस संभालेंगे कमान
एपल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) टिम कुक अपने पद से इस्तीफा देने जा रहे हैं। स्टीव जॉब्स के बाद उन्होंने यह पद संभाला था। अब उनका लगभग 15 साल का कार्यकाल खत्म हो रहा है।
जॉन टर्नस बनेंगे एपल के नए सीईओ
इस दौरान कंपनी का बाजार मूल्य बहुत तेजी से बढ़ा। आईफोन के दौर में एपल का मूल्य 3.6 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया। टिम कुक (65 वर्षीय) एक सितंबर से सीईओ के पद से हट जाएंगे। उनकी जगह कंपनी के हार्डवेयर इंजीनियरिंग प्रमुख जॉन टर्नस नए सीईओ बनेंगे।
कंपनी के कामकाज में सीमित भूमिका निभाते रहेंगे कुक
हालांकि, टिम कुक कंपनी से पूरी तरह नहीं हटेंगे। वह एपल में कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में जुड़े रहेंगे और कंपनी के कामकाज में भूमिका निभाते रहेंगे। यह बदलाव अमेजन के जेफ बेजोस और नेटफ्लिक्स के रीड हेस्टिंग्स की तरह है। उन्होंने भी सीईओ पद छोड़ने के बाद कंपनी में सीमित भूमिका निभाई थी।
टिम कुक को स्टीव जॉब्स जैसी दूरदर्शिता वाला तकनीकी दिग्गज नहीं माना गया। लेकिन उन्होंने जॉब्स द्वारा बनाए गए आईफोन और अन्य तकनीकी नवाचारों का उपयोग किया। इसके जरिए उन्होंने एपल को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। एपल कंपनी 1990 के दशक में लगभग दिवालिया होने की स्थिति में थी। कुक के नेतृत्व में दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल हो गई।
भारत में एपल पर सख्ती, लग सकता है 3.56 लाख करोड़ का जुर्माना
उधर, आईफोन एप्स मार्केट में दबदबे वाली स्थिति का गलत इस्तेमाल करने के मामले में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने एपल के खिलाफ जांच तेज करते हुए अंतिम सुनवाई की तारीख 21 मई तय कर दी है। यह कदम एपल की ओर से वित्तीय डाटा देने से लगातार इन्कार करने और जांच के निष्कर्षों पर उसकी आपत्तियों के बाद उठाया गया है। मामले में दोषी पाए जाने पर एपल पर 38 अरब डॉलर (करीब 3.56 लाख करोड़ रुपये) तक का भारी-भरकम जुर्माना लग सकता है।
सीसीआई न अपने आदेश में क्या कहा?
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने 8 अप्रैल के एक आदेश में कहा, एंटीट्रस्ट मामले में जांच के लिए एपल से कुछ वित्तीय जानकारियां मांगी गई थीं। लेकिन, अमेरिकी कंपनी अक्तूबर, 2024 से अब तक ये विवरण जमा करने में नाकाम रही। साथ ही, उसने दिल्ली हाई कोर्ट में भारत के एंटीट्रस्ट जुर्माना कानून को चुनौती दी है। सूत्रों का कहना है कि एंटीट्रस्ट जुर्माना कानून को चुनौती देने सहित एपल का रुख सीसीआई को तेजी से आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर रहा है। नियामक एपल के इन कदमों को जांच में देरी करने की कोशिश के तौर पर देख रहा है।
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मामला कहां से शुरू हुआ?
यह मामला 2021 में तब शुरू हुआ था, जब मैच ग्रुप्स और कई भारतीय स्टार्टअप्स ने एपल के कारोबारी तरीकों का विरोध किया था। मामले की जांच के बाद सीसीआई के जांचकर्ताओं ने 2024 में एक रिपोर्ट में कहा, एपल ने ऐप्स मार्केट में अपनी दबदबे वाली स्थिति का गलत फायदा उठाया। डेवलपर्स को अनिवार्य इन-एप पर्चेज (आईएपी) सिस्टम इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया। ये कदम बाजार में प्रतिस्पर्धा कम करते हैं।
मामले से जुड़े वकीलों का कहना है कि अंतिम सुनवाई की तारीख तय होना इस बात का संकेत है कि सीसीआई अपना रुख सख्त कर रहा है। दुआ एसोसिएट्स में एंटीट्रस्ट पार्टनर गौतम शाही ने कहा, एपल के पास अब भी मौका है कि वह ऑडिटर के सर्टिफिकेट के साथ अपने वित्तीय विवरण जमा करे और सुनवाई के दौरान इन डाटा के आधार पर जुर्माने की रकम पर बहस करे, जिसे कंपनी के वैश्विक टर्नओवर के आधार पर तय किया गया है। अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहती है, तो जुर्माने की रकम पर उसकी दलीलें सीमित हो जाएंगी।
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सेबी के नए नियमों से फंड ऑफ फंड्स बने अधिक आकर्षक, जानिए बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच ये कैसे लाभकारी
साल 2026 की शुरुआत से ही भारतीय निवेशकों के लिए शेयर बाजार भारी चुनौतियां पेश कर रहा है। बाजार में आ रही लगातार गिरावट ने निवेशकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा ली है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में बाजार के विशेषज्ञों की लंबे समय तक निवेशित रहें वाली आम सलाह का पालन करना काफी मुश्किल हो जाता है। दैनिक समाचारों की सुर्खियों से निवेशकों में घबराहट बढ़ती है, जिससे वे अक्सर भावनाओं में बहकर निचले स्तर पर बाजार से बाहर निकलने या गलत प्रवृत्तियों के पीछे भागने जैसे फैसले ले लेते हैं। इस तनावपूर्ण माहौल में थीमेटिक इन्वेस्टिंग निवेशकों के मुख्य पोर्टफोलियो के लिए एक बेहतरीन रणनीतिक विकल्प बनकर उभर रहा है।
लंबी अवधि के रुझानों का लाभ
भल्ला फाइनेंशियल सर्विसेज के निदेशक महेश भल्ला के अनुसार थीमेटिक इन्वेस्टिंग निवेशकों को डिजिटलीकरण, ऊर्जा संक्रमण या विनिर्माण विकास जैसे लंबी अवधि के और संरचनात्मक रुझानों में भाग लेने का शानदार मौका देता है। इसके तहत निवेशकों का पैसा पेशेवरों द्वारा तैयार किए गए शेयरों के एक खास बास्केट में लगाया जाता है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस तरीके से निवेशकों को किसी विशेष थीम के भीतर व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग शेयरों को चुनने के भारी झंझट से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है।
फंड ऑफ फंड्स की नई भूमिका
भल्ला ने कहा, “जो निवेशक बाजार की बारीकियों में उलझे बिना निवेश करना चाह रहे हैं, उनके लिए ‘फंड ऑफ फंड्स’ यानी एफओएफ एक बहुत ही मजबूत समाधान प्रस्तुत करते हैं। एक फंड ऑफ फंड्स अन्य म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो में निवेश करता है, इससे निवेशकों को तुरंत अलग-अलग परिसंपत्ति वर्गों, निवेश शैलियों और फंड प्रबंधकों के बीच विविधता मिल जाती है। ऐतिहासिक रूप से इन पोर्टफोलियो में कुल इक्विटी (शेयर) निवेश आम तौर पर 80 से 100 प्रतिशत तक होता था। इतनी अधिक इक्विटी हिस्सेदारी होने के कारण स्वाभाविक रूप से इनकी प्रकृति काफी अस्थिर होती थी।”
जोखिम कम करने के लिए डेट फंड का सुरक्षा कवच
महेश भल्ला के अनुसार हाल ही में नियामक की ओर से हुए बदलावों के बाद इनमें से कुछ फंड्स को अब एग्रेसिव हाइब्रिड एक्टिव फंड ऑफ फंड्स के रूप में फिर से वर्गीकृत किया गया है। नए नियमों के तहत अब इन फंड्स में इक्विटी का आवंटन 65 से 80 प्रतिशत के बीच रखा जा सकता है। इस इक्विटी आवंटन में स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों में किया जाने वाला सामरिक निवेश भी शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस इक्विटी हिस्सेदारी के साथ अब 20 से 35 प्रतिशत के दायरे में बढ़ा हुआ डेट (ऋण) आवंटन भी जोड़ा गया है। ऋण बाजार में किया गया यह बढ़ा हुआ निवेश बाजार के झटकों के खिलाफ एक कुशन (सुरक्षा कवच) प्रदान करता है, जिससे निवेशकों की निवेश यात्रा आसान हो जाती है।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल फंड का शानदार ट्रैक रिकॉर्ड
भल्ला ने बताया कि इस नए बदलाव और शानदार प्रदर्शन के एक प्रमुख उदाहरण के तौर पर आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एग्रेसिव हाइब्रिड एक्टिव फंड ऑफ फंड्स को देखा जा सकता है। यह फंड पहली बार दिसंबर 2003 में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल थीमेटिक एडवांटेज फंड ऑफ फंड्स के नाम से बाजार में उतारा गया था। मार्च 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस फंड ने लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हुए तीन साल में 15.11 प्रतिशत, पांच साल में 14.91 प्रतिशत और दस साल में 14.47 प्रतिशत का चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) रिटर्न दिया है।
1 अप्रैल 2026 से लागू हुआ सेबी का नया ढांचा
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के ‘फंड ऑफ फंड्स’ के लिए बनाए गए नए ढांचे के अनुरूप यह फंड 1 अप्रैल, 2026 से काम करना शुरू कर देगा। इस नए नियम के तहत यह अपनी कुल पूंजी का 65 से 80 प्रतिशत हिस्सा सक्रिय रूप से प्रबंधित इक्विटी योजनाओं में और 20 से 35 प्रतिशत हिस्सा सक्रिय रूप से प्रबंधित ऋण योजनाओं में निवेश करेगा। चूंकि पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय, विषयगत और मार्केट कैप-आधारित इक्विटी योजनाओं में निवेशित रहेगा, इसलिए यह फंड पहले की तरह ही विकासोन्मुखी बना रहेगा। हालांकि, अब इसके पास बाजार की अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच भी मौजूद होगा।
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