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oi-Siddharth Purohit
OI Exclusive: अमेरिका और ईरान चल रही जंग में 40 दिनों के बाद सीजफायर हो गया है। लेकिन कई लोग भारत के लिए इसे बड़ा झटका मान रहे हैं। कारण हैं, इसमें पाकिस्तान द्वारा कथित मध्यस्थता। एक देश जिसकी छवि दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी समर्थक देश के रूप में जाने जाती है वह अचानक दुनिया के सबसे ताकतवर देश का झगड़ा सुलझा रहा है, ये बात एक आम भारतीय को हजम नहीं हो रही है। इसलिए ये समझना जरूरी हो जाता है कि पाकिस्तान कैसे इस बातचीत को अंजाम दे पाया और इतिहास इसे कैसे देखेगा?
‘मीडिएटर नहीं मैसेंजर है पाकिस्तान’
इस मामले को बारीकी से समझने के लिए हमने डिफेंस एकस्पर्ट कमर आगा से बात की। उन्होंने वनइंडिया को विस्तार से बताया कि तस्वीर जैसी दिख रही है वैसी है नहीं। कमर आगा कहते हैं कि “पाकिस्तान इस मामले में किसी मीडिएटर की भूमिका में नहीं है वो सिर्फ एक मैसेंजर है। उसका काम है कि अमेरिका ने उससे जो कहा है वह ईरान तक पहुंचा दे और ईरान ने जो शर्तें बताई हैं वो अमेरिका तक पहुंचा दे। जबकि मीडिएटर वो होता है जो दोनों पक्षों के सामने बेहतर विक्लप रखकर उन्हें राजी करवाने की कोशिश करे। इसलिए पाकिस्तान को मीडिएटर कहना यहां गलत होगा। रही बात इसकी, कि 10 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के टॉप नेताओं की सीजफायर पर बात होनी है, तो यह सिर्फ एक या दो दौर की बातचीत होगी। इसके बाद ईरान जिनेवा का रुख करेगा और चाहेगा एक न्यूट्रल ग्राउंड पर बातचीत हो।”

‘ईरान में घुसपैठ करवाता है पाकिस्तान’
“इसके पहले भी पाकिस्तान ने शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद का ऑप्शन बतौर टेबल पेश किया था लेकिन ईरान ने इस पर आपत्ति जताई जिसके बाद दोनों पक्षों में बातचीत ओमान में होती रही। इसकी बड़ी वजह है कि ईरान पाकिस्तान को एक फ्रैंडली नहीं बल्कि कॉम्प्टीटर और कुछ मायनों में दुश्मन देश की तरह देखता है। ईरान और पाकिस्तान बॉर्डर साझा करते हैं और आए दिन इनके बॉर्डर पर झगड़े होते रहते हैं। पाकिस्तान, आए दिन ईरान में घुसपैठ और हमले करवाता रहता है। जिसकी वजह से आम दिनों में ही दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहते हैं। साथ ही, ईरान को पाकिस्तान पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। उसका बड़ा कारण है पाकिस्तानी नेता अमेरिका की चापलूसी कर उससे संबंध बेहतर करने पर फोकस करते रहे हैं ताकि उधार मिलने वाले पैसों में कोई रुकावट न आए। इसलिए ईरान का इस्लामाबाद पर ऐतबार कम ही है। रही बात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची द्वारा पाकिस्तान को थैंक्यू बोलने की, तो यह एक कर्टसी मात्र है, जिसमें सीजफायर होने पर थैंक्यू बोलना स्वभाविक था। एक और समझने वाली बात है कि पाकिस्तान ने तय नहीं किया वह मीडिएटरशिप करेगा बल्कि अमेरिका ने उसे ऐसा करने के लिए बाधित किया, जिसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के संदेश ईरान तक और ईरान के संदेश व्हाइट हाउस तक पहुंचाए। ईरान ओमान और जिनेवा में बातचीत के लिए शुरू से राजी है लेकिन पाकिस्तान में नहीं। चूंकि जंग के बीच दोनों जगह जाना संभव नहीं हो सका इसलिए पाकिस्तान के खाते में ये काम आ गया।”
भारत कहां चूका?
“भारत इस मामले में चूक गया है, ये भी कहना गलत होगा। दरअसल भारत कभी किसी भी देश के झगड़े में मीडिएटर नहीं रहा, न ही हमें इसका अनुभव है और न ही हमारा इसका इतिहास है। दो पक्षों के झगड़े में बीच में कूदना भारत की अंतर्राष्ट्रीय पॉलिसी का हिस्सा नहीं है। बीते दिनों जब कंबोडिया और थाईलैंड में झगड़े हुए हमने तब भी किसी से कोई बात नहीं की। इससे पहले वियतनाम युद्ध में भी न भारत ने वियतनाम का पक्ष लिया था और न ही अमेरिका का। 20 साल चले उस युद्ध में हमने किसी के पक्ष में या किसी के खिलाफ कुछ नहीं कहा था, ये हमारी गुटनिरपेक्ष नीति का हिस्सा है। पाकिस्तान को इसका फायदा सिर्फ इसलिए भी मिला क्योंकि फिलीस्तीन के मुद्दे पर उसकी और ईरान की पॉलिसी एक है। साथ ही पाकिस्तान भी इजरायल से डिप्लोमैटिक रिश्ते नहीं रखता है और न ही इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देता है। ये इकलौती बात है जो पाकिस्तान के पक्ष में मजबूत कही जा सकती है।”
क्या इजरायल की वजह से ईरान भारत से नाराज है?
“बिल्कुल नहीं, भारत और ईरान के संबंध कोई एक दो साल पुराने नहीं बल्कि एक सभ्यता पुराने हैं जिसकी अवधि करीब 5 हजार साल की है। वहां की खुदाई में आज भी कई मंदिर मिल जाते हैं जो बताता है कि भारत और पर्शिया पहले भी गहरे संबंधों के साथ क्षेत्र में रहे हैं। हाल के दिनों में हमारे संबंध इजरायल से काफी मजबूत हुए हैं लेकिन जब इन दोनों में तनाव हुआ तो भारत ने दोनों को ही शांत करने के लिए काफी कोशिशें भी की। भारत सिर्फ सभ्यता के आधार पर ईरान से नहीं जुड़ा बल्कि बड़े व्यापारिक हित भी हमारे ईरान के साथ हैं। 2019 तक हम भारी तादात में क्रूड ऑयल और गैस इम्पोर्ट करते थे और वहां के चाबहार पोर्ट पर हमारा काफी इन्वेस्टमेंट है। लेकिन अमेरिका में ट्रंप की वापसी के बाद हमें वहां से विड्रो करना पड़ा और UAE से नजदीकियां बढ़ानी पड़ीं। ये सब व्यापारिक हित और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का हिस्सा होता है। ईरान भी इस बात को समझता है। इस युद्ध में भारत के लिए लोगों ने न सिर्फ ईरानियों के लिए करोड़ों रुपए चंदा इकठ्ठा किया बल्कि ईरान के कई शहरों में फ्री खाने के लंगर भी लगाए। इसी बीच भारत सरकार ने भी ईरान के लिए मदद भेजी जिसमें खाना, कपड़े और दवाईयां जैसी सुविधाएं वहां के लोगों तक पहुंचाई लेकिन पाकिस्तान या किसी दूसरे देश ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया।”
क्या ये समझौता ‘इस्लामाबाद एकॉर्ड’ के नाम से जाना जाएगा?
इस पर कमर आगा कहते हैं कि “वैसे तो ये भविष्य का प्रश्न है, लेकिन फिर भी इसकी संभावना काफी कम है, क्योंकि बातचीत की शुरुआत ओमान से हुई। फरवरी 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच जब तनाव बढ़ा तब ओमान ने ही दोनों देशों को ओमान बुलाकर कई दौर की बातचीत कराई। इसके बाद जब युद्ध शुरू हो गया तो इजिप्ट ने भी दोनों देशों के नेताओं से शांति समझौते पर लंबी बात की। इसके बाद पाकिस्ताान तीसरे नंबर पर इस समझौते में आया लेकिन ईरान उसके लिए राजी नहीं था। चूंकि दूसरे विकल्प न होने के चलते इस्लामाबाद को ये मौका मिला। लेकिन आगे ईरान ऐसा नहीं चाहेगा। क्योंकि उसे एक न्यूट्रल ग्राउंड चाहिए जिस पर वह भरोसा कर सके। इसलिए ये संभावनाएं ज्यादा हैं कि एक या दो दौर की बातचीत के बाद ओमान या फिर जिनेवा में आगे की बातचीत हो। जब बातचीत इतनी सारी जगहों पर हो रही है तो इस्लामाबाद के नाम पर इस समझौते का नाम नहीं रखा जा सकता है। हां, पाकिस्तान ऐसा जरूर चाहेगा लेकिन अभी कई महीने बात होगी तब जाकर तय होगा कि किसके नाम पर ये समझौता रजिस्टर होता है।”
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