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Pakistan Ceasefire: दो दुश्मनों को एक टेबल पर कैसे लाए आसिम मुनीर? नेतन्याहू को किसने किया राजी?


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oi-Siddharth Purohit

Pakistan Ceasefire: मिडिल ईस्ट में दो सप्ताह के सीजफायर का ऐलान करते हुए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर को धन्यवाद दिया है। यहां तक कि उन्होंने दोनों को अपना प्यारे भाई तक बताया। साथ ही, अमेरिका ने भी पाकिस्तान की भूमिका को सराहा है। ऐसे में में ये जानना जरूरी होता है कि पाकिस्तान कैसे दोनों पक्षों को बैलेंस कर पाया।

ट्रंप ने पहले नेतन्याहू फिर मुनीर से की बात

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर से पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और असीम मुनीर से बातचीत की थी। बताया गया कि मुनीर पूरी रात अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और अराघची से बात करते रहे। यानी पर्दे के पीछे लगातार बातचीत चल रही थी, जिसने इस सीजफायर को संभव बनाया।

Pakistan Ceasefire

शहबाज की गलती से बना मजाक

इस बड़ी कूटनीतिक सफलता के बीच पाकिस्तान एक अजीब विवाद में भी फंस गया। शहबाज शरीफ की एक पोस्ट गलती से “Draft- Pakistan PM message” टैग के साथ पब्लिश हो गई। हालांकि बाद में इसे हटा दिया गया, लेकिन एडिट हिस्ट्री के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर यह आरोप लगने लगा कि यह संदेश व्हाइट हाउस से कॉपी-पेस्ट किया गया था।

क्या सिर्फ पाकिस्तान ने रुकवाई जंग?

इस युद्धविराम का श्रेय कई नेताओं को दिया जा रहा है। इसमें जेडी वेंस की भूमिका, अराघची का नेतृत्व और असीम मुनीर की मध्यस्थ कूटनीति सबसे अहम मानी जा रही है, क्योंकि दोनों पक्षों ने उन्हें क्रेडिट दिया है। इन तीनों ने मिलकर दोनों देशों के बीच भरोसा बनाने और बातचीत जारी रखने में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि इसमें कुछ और देश जैसे ओमान और मिस्र की भूमिका भी लेकिन वे क्रेडिट लेने से चूक गए।

मार्च से ही एक्टिव था पाकिस्तान

पाकिस्तान मार्च के अंत से ही मिडिल ईस्ट में शांति के लिए सक्रिय था। 29 मार्च को उसने तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की थी। इसका मकसद क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना और युद्ध को फैलने से रोकना था।

मैसेज कैररियर और बैकचैनल गेम

जब युद्ध लंबा खिंचने लगा, तब अमेरिका और ईरान दोनों समाधान ढूंढने लगे। ऐसे में पाकिस्तान एक अहम मीडिएटर बनकर उभरा। उसने अमेरिका का 15 प्वॉइंट वाला प्रपोजल ईरान तक पहुंचाया और फिर ईरान की प्रतिक्रिया अमेरिका को दी। हालांकि ईरान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया लेकिन इस तरह वह दोनों देशों के बीच मैसेज कैरियर बन गया।

इजरायल से दुश्मनी बनी प्लस प्वॉइंट

किसी भी मध्यस्थ के लिए दोनों पक्षों का भरोसा जरूरी होता है। ईरान को अमेरिका से करीबी रिश्तों के कारण खाड़ी देशों पर भरोसा नहीं था। साथ ही लगभग सभी देश किसी न किसी तरीके से इजरायल से संबंध बनाए हुए हैं। वहीं पाकिस्तान एक मात्र ऐसा देश है जिसने इजरायल को आज तक मान्यता भी नहीं दी है, दोनों देशों के बीच में राजनायिक संबंध भी नहीं हैं और फिलीस्तीन के मुद्दे पर वह ईरान की भाषा में ही बात करता है। भले ही ईरान और पाकिस्तान के बॉर्डर से जुड़े मतभेद हों, लेकिन दोनों इजरायल के मुद्दे पर एक हैं। यही वजह है कि अराघची ने शरीफ और मुनीर को प्यारे भाई कहा।

अमेरिका से सुधरते रिश्तों का फायदा

पिछले साल से पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते बेहतर हुए हैं। पाकिस्तान ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा भी रहा है। ट्रंप खुद असीम मुनीर को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल बता चुके हैं, जिससे पाकिस्तान को कूटनीतिक बढ़त मिली। इसके अलावा पाकिस्तान के खाड़ी देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं। इससे उसे सभी पक्षों को साथ लाने में मदद मिली। यानी वह एक ऐसा देश बन गया जो दोनों पक्षों से बात कर सकता था।

आर्थिक दबाव भी बना वजह

पाकिस्तान का युद्धविराम के लिए दबाव सिर्फ राजनीति नहीं था, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी थी।मिडिल ईस्ट से तेल सप्लाई और बाहर से होने वाली कमाई पर निर्भरता के कारण बढ़ती कीमतों ने पाकिस्तान पर भारी दबाव डाला। पाकिस्तान पहले से आर्थिक संकट और अफगानिस्तान के साथ तनाव झेल रहा है। ऐसे में ईरान में अस्थिरता उसके लिए और खतरा बन सकती थी। इसलिए उसने शांति की कोशिश तेज की।

चीन ने भी की बैकचैनल से मदद

पाकिस्तान को चीन का समर्थन भी मिला, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता और मजबूत हुई। इससे उसे मध्यस्थ के रूप में और ताकत मिली। कहा ये भी जा रहा है कि प्लान पूरा ही चीन का था बस इसे एग्जीक्यूट करने के लिए उसने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया। ताकि अच्छा हो तो देर-सवेर वह क्रेडिट ले ही लेगा और गड़बड़ हुई तो पाकिस्तान को बलि बकरा बना देगा। हालांकि युद्धविराम हो गया है, लेकिन यह बेहद नाजुक है। आने वाले दिनों में पता चलेगा कि अमेरिका और ईरान बातचीत को आगे कैसे बढ़ाते हैं।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।



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