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Report: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, अगर क्रूड 100 डॉलर के पार रहा तो रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दरें


वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा रही हैं। विदेशी ब्रोकरेज फर्म एचएसबीसी के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत में खुदरा महंगाई दर छह प्रतिशत के पार जा सकती है। यह स्तर भारतीय रिजर्व बैंक के सहनशीलता बैंड (2 से 6 प्रतिशत) की ऊपरी सीमा से अधिक है, और इसके पार जाने पर आरबीआई को ब्याज दरों में बढ़ोतरी के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

महंगाई और मौद्रिक नीति पर बढ़ता दबाव

मार्च महीने में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 100 डॉलर प्रति बैरल रहने के कारण अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हम वर्तमान में एक बड़े “चौराहे” पर खड़े हैं। अगले बुधवार को आरबीआई की मौद्रिक नीति की घोषणा होने वाली है और बाजार में इस बात को लेकर अटकलें तेज हैं कि क्या आरबीआई रुपये को बचाने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल करेगा। हालांकि, एचएसबीसी की रिपोर्ट ने इस तरह के कदम के जोखिमों के प्रति आगाह किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये के बचाव के लिए ब्याज दरों का उपयोग करना बहुत ‘महंगा’ साबित हो सकता है, क्योंकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के साथ विकास  में आने वाली गिरावट काफी तेजी से बढ़ सकती है।

न्यूट्रल रुख और राजकोषीय सुझाव

एचएसबीसी के अर्थशास्त्रियों ने राजकोषीय और मौद्रिक, दोनों मोर्चों पर फिलहाल तटस्थ रुख अपनाने की सिफारिश की है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि अभी आपूर्ति संबंधी बाधाएं दूर नहीं हुई हैं और ऐसे में मांग को प्रोत्साहित करने से महंगाई और भड़क सकती है। इस न्यूट्रल रणनीति के तहत रिपोर्ट में निम्नलिखित बातें कही गई हैं:


  • राजकोषीय घाटा: राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) के स्तर के करीब ही रखा जाना चाहिए।

  • ईंधन की कीमतें: राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने में मदद करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की जानी चाहिए।

  • लचीलापन: मौद्रिक मोर्चे पर, ‘लचीला’ मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा महंगाई को 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में रहने की अनुमति देता है।

महामारी से सबक और नीतिगत चुनौतियां

रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि आपूर्ति में सुधार होने से पहले मांग को बढ़ाना खतरनाक हो सकता है, जैसा कि कोविड महामारी के दौरान देखा गया था। उस समय इसी गलती के कारण उच्च और स्थिर महंगाई का सामना करना पड़ा था। नीतिकारों के लिए अब सबक स्पष्ट है कि मांग को समय से पहले बढ़ाने से बचना चाहिए। यह एक बेहद नाजुक संतुलन है, क्योंकि नीति निर्माता अर्थव्यवस्था को बहुत अधिक उत्तेजित भी नहीं करना चाहते और न ही इतना सख्त करना चाहते हैं जिससे विकास दर में मंदी और गहरी हो जाए।

आगे का आउटलुक

एचएसबीसी की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर तेल की कीमतों का यह एनर्जी शॉक कुछ और हफ्तों तक बना रहता है, तो विकास में आने वाली गिरावट का प्रभाव, महंगाई के झटके से ज्यादा भारी पड़ने लगेगा। ऐसे में बाजार, निवेशकों और उद्योगों की नजरें अब अगले बुधवार को होने वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्रीय बैंक विकास को बनाए रखने और महंगाई को काबू में करने के बीच कैसे संतुलन स्थापित करता है।



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