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Semaglutide: भारत में सस्ती होंगी वजन कम करने वाली दवाएं, पर क्या हमारी स्वास्थ्य सेवाएं इसके लिए हैं तैयार?


डेनमार्क की दवा निर्माता कंपनी नोवो नॉर्डिस्क की दो बेहद सफल दवाओं, ओजेम्पिक और वेगोवी, में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख अणु ‘सेमाग्लुटाइड’ का पेटेंट जल्द ही समाप्त होने वाला है। यह खबर भारतीय दवा उद्योग के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आई है, क्योंकि इससे देश में इस जीवनशैली दवा के सस्ते जेनेरिक संस्करणों की बाढ़ आने की उम्मीद है। एक समय प्रीमियम लाइफस्टाइल दवा मानी जाने वाली सेमाग्लुटाइड अब आम आदमी की पहुंच में आ सकती है, जो भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र और पूरी फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।

आइए इस पूरे विषय को सवालों के जरिए आसान भाषा में समझते हैं। 

सवाल: पेटेंट खत्म होने का भारतीय फार्मा इंडस्ट्री पर क्या असर होगा?

सेमाग्लुटाइड का पेटेंट समाप्त होते ही घरेलू प्रतिस्पर्धा में भारी इजाफा देखने को मिलेगा।


  • नई लॉन्चिंग: लगभग 40 से अधिक भारतीय फार्मा कंपनियां कुछ ही हफ्तों में सेमाग्लुटाइड के 50 से अधिक ब्रांड लॉन्च करने की तैयारी में हैं। 

  • प्रमुख कंपनियां: इस दौड़ में सन फार्मा, मैनकाइंड फार्मा, डॉ. रेड्डीज, जाइडस, ल्यूपिन और एल्केम जैसी कंपनियां आक्रामक तरीके से बाजार में उतरने वाली हैं।

  • डिलीवरी सिस्टम: सन फार्मा के एमडी कीर्ति गनोरकर के अनुसार, उनकी कंपनी इस उत्पाद को आसानी से उपयोग होने वाले ‘प्रीफिल्ड पेन फॉर्मेट’ में पेश करेगी, जिससे मरीजों को सुविधा होगी। 

  • इंडस्ट्री ग्रोथ: वनसोर्स स्पेशलिटी फार्मा के नीरज शर्मा का मानना है कि सस्ती जेनेरिक दवाओं की एंट्री से बाजार की छिपी हुई भारी मांग सामने आएगी।

सवाल: मरीजों के लिए यह दवा कितनी सस्ती हो जाएगी और बाजार कितना बड़ा है?


कीमतों में भारी कटौती इस पूरे बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। 


  • दाम में गिरावट: रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दवा का मासिक खर्च लगभग 11,000 रुपये से गिरकर शुरुआती चरण में 3,000–5,000 रुपये तक आ सकता है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर कीमतें 1,500 से 2,500 रुपये तक नीचे जा सकती हैं।

  • मार्केट साइज: टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार के अनुसार, भारत का मौजूदा 1,400 करोड़ रुपये का वेट-लॉस (वजन घटाने का) बाजार अगले एक साल के भीतर दोगुना हो सकता है। 

सवाल: पब्लिक हेल्थ और समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?


भारत में डायबिटीज और मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। 


  • आबादी पर असर: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी डायबिटीज आबादी भारत में है और अनुमान है कि 2050 तक 44 करोड़ से अधिक लोग ओवरवेट या मोटापे के शिकार होंगे।

  • पहुंच: विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रांडेड जेनेरिक बाजार में आने से निचले आर्थिक तबके के मरीज भी इस उपचार का लाभ उठा सकेंगे, जिससे यह एक ‘नीश’ थेरेपी से मेनस्ट्रीम दवा बन जाएगी। 

सवाल: आसानी से दवा उपलब्ध होने के क्या संभावित खतरे हैं?


व्यापक पहुंच के साथ ही इस दवा के दुरुपयोग का जोखिम भी बढ़ रहा है।


  • लाइफस्टाइल शॉर्टकट: विश्लेषक मानते हैं कि गिरती कीमतों के कारण फार्मेसियों से सीधी खरीद और इसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक या लाइफस्टाइल के लिए तेजी से बढ़ सकता है।

  • साइड इफेक्ट्स और निगरानी: भारत में फार्मासिस्ट अक्सर बिना प्रिस्क्रिप्शन के दवाएं दे देते हैं। ऐसे में गलत खुराक और साइड इफेक्ट्स को मैनेज न कर पाने जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं, जिसके बाद सरकार को कड़े नियामकीय कदम उठाने पड़ सकते हैं।

अब जब सेमाग्लुटाइड दवा के पेटेंट की अवधि समाप्त हो रही है। यह केवल दवा के दाम कम होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह घटना एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की शुरुआत मानी जा रही है। इससे भारतीय फार्मा उद्योग के लिए बड़े कारोबारी अवसर पैदा होंगे। हालांकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह एक चुनौती भी है। भारत को दवा की आसान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, दवा की गुणवत्ता और वितरण पर सख्त निगरानी भी रखनी होगी। देश को इन दोनों महत्वपूर्ण पहलुओं के बीच सही संतुलन स्थापित करना होगा। यह संतुलन बनाना भारतीय स्वास्थ्य नीति के लिए अहम होगा।





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